फरार आरोपी जिसे 'घोषित अपराधी' करार दिया गया, वह पावर ऑफ़ अटॉर्नी के ज़रिए केस रद्द करने की याचिका दायर नहीं कर सकता: उत्तराखंड हाईकोर्ट
उत्तराखंड हाईकोर्ट ने कहा कि जिस आरोपी को 'घोषित अपराधी' (proclaimed offender) करार दिया गया और जिसके खिलाफ 'लुकआउट सर्कुलर' जारी किया गया, वह पावर ऑफ़ अटॉर्नी होल्डर के ज़रिए CrPC की धारा 482 के तहत याचिका दायर नहीं कर सकता। कोर्ट ने कहा कि वह ऐसे व्यक्ति के पक्ष में अपने विशेष या अंतर्निहित अधिकार क्षेत्र (inherent jurisdiction) का इस्तेमाल नहीं करेगा, जो जानबूझकर कानूनी प्रक्रिया से बच रहा है और फरार है।
जस्टिस राकेश थपलियाल, राकेश मेहरा द्वारा उनके पावर ऑफ़ अटॉर्नी होल्डर के ज़रिए दायर याचिका पर सुनवाई कर रहे थे। इस याचिका में 2022 में दर्ज FIR से जुड़ी कार्यवाही रद्द करने की मांग की गई। यह मामला मेहरा और दिव्या फार्मेसी/पतंजलि आयुर्वेद लिमिटेड की कंपनियों के बीच व्यावसायिक लेन-देन से जुड़ा था।
कोर्ट ने गौर किया कि CrPC की धारा 41A के तहत नोटिस मिलने के बावजूद मेहरा जांच में शामिल नहीं हुए, उनके खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी किए गए, उन्हें घोषित अपराधी करार दिया गया और लुकआउट सर्कुलर भी जारी किया गया।
कोर्ट ने कहा कि जब कानून आरोपी की उपस्थिति की मांग करता है तो उसकी जगह पावर ऑफ़ अटॉर्नी होल्डर का पेश होना नियमों का पालन नहीं माना जाएगा। कोर्ट ने कहा कि जिस आरोपी को घोषित अपराधी करार दिया गया, वह सरेंडर किए बिना आपराधिक कार्यवाही रद्द करने की मांग नहीं कर सकता। साथ ही ऐसा आरोपी CrPC की धारा 482 के तहत हाईकोर्ट के अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करने के लिए किसी व्यक्ति के पक्ष में पावर ऑफ़ अटॉर्नी भी नहीं बना सकता।
कोर्ट ने कहा,
"...कोर्ट ऐसे व्यक्ति के पक्ष में अपने विशेष या अंतर्निहित अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल नहीं करेगा, जो जानबूझकर कानूनी प्रक्रिया से बच रहा है और फरार है, या जिसे घोषित अपराधी करार दिया गया है। ऐसा आरोपी व्यक्ति CrPC की धारा 482 के तहत हाई कोर्ट के अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करने के लिए पावर ऑफ़ अटॉर्नी होल्डर के पक्ष में पावर ऑफ़ अटॉर्नी नहीं बना सकता।"
कोर्ट ने यह भी गौर किया कि न तो लुकआउट सर्कुलर और न ही घोषित अपराधी करार दिए जाने के फैसले को चुनौती दी गई। कोर्ट ने यह भी देखा कि ट्रायल कार्यवाही में शामिल होने की अनुमति देने वाले पिछले आदेश के बावजूद, मेहरा ट्रायल कोर्ट के सामने पेश नहीं हुए। हांगकांग में उनके द्वारा शपथ-पत्र (Affidavit) देकर कमी को दूर करने के तर्क को खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा कि ऐसा शपथ-पत्र याचिका के स्वीकार्य होने (Maintainability) के मुद्दे को हल नहीं कर सकता।
कोर्ट ने यह भी पाया कि जांच में ऐसे दस्तावेज़ी सबूत मिले हैं - जिनमें ऑडिट रिपोर्ट और अन्य दस्तावेज़ शामिल हैं - जो मुक़दमा चलाने के लिए काफ़ी हैं। कोर्ट ने कहा कि कमर्शियल संबंध या कॉन्ट्रैक्ट के तहत किए गए समझौते होने से ही आपराधिक ज़िम्मेदारी से छुटकारा नहीं मिल जाता और आर्टिकल 226 या CrPC की धारा 482 के तहत कार्यवाही में सबूतों की बारीकी से जांच या उनके महत्व पर फ़ैसला नहीं किया जा सकता।
इसलिए याचिकाओं में कोई दम न पाते हुए कोर्ट ने दोनों याचिकाओं को खारिज कर दिया और ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया कि वह कानून के अनुसार मुक़दमे की कार्यवाही आगे बढ़ाए।
Case Title: Rakesh Mehra v. State of Uttarakhand & Ors. [Criminal Misc. Application No. 135 of 2024]