सिर्फ शराब की गंध से नशे में गाड़ी चलाना साबित नहीं होता, रक्त या ब्रेथ एनालाइज़र जांच जरूरी: उत्तराखंड हाईकोर्ट

Update: 2026-07-13 07:33 GMT

उत्तराखंड हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि किसी चालक के मुंह से केवल शराब की गंध आने मात्र से यह नहीं माना जा सकता कि वह नशे की हालत में वाहन चला रहा था। अदालत ने स्पष्ट किया कि रक्त जांच या ब्रेथ एनालाइज़र जांच के जरिए यह साबित होना आवश्यक है कि शरीर में शराब की मात्रा मोटर वाहन अधिनियम, 1988 में निर्धारित सीमा से अधिक थी। ऐसी वैज्ञानिक जांच के अभाव में केवल शराब की गंध के आधार पर नशे में वाहन चलाने का आरोप या भारतीय न्याय संहिता की धारा 105 के तहत आरोप तय नहीं किया जा सकता।

यह फैसला जस्टिस आलोक महरा ने आपराधिक पुनरीक्षण याचिका पर सुनाया। अदालत ने सेशन कोर्ट का आदेश आंशिक रूप से रद्द किया, जिसमें याचिकाकर्ता के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 105, 125(क), 125(ख) और 281 के तहत आरोप तय किए गए।

मामला एक सड़क दुर्घटना से जुड़ा था। याचिकाकर्ता बद्रीनाथ धाम से चमोली की ओर जीप चला रहा था। आरोप है कि वाहन से नियंत्रण खोने के बाद जीप पलट गई, जिससे कई यात्री घायल हो गए और एक यात्री की मौत हो गई। दुर्घटना के बाद चिकित्सकीय परीक्षण में डॉक्टरों ने चालक के मुंह से शराब की गंध आने का उल्लेख किया, लेकिन उसके रक्त का नमूना नहीं लिया गया और न ही ब्रेथ एनालाइज़र जांच कराई गई।

याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि मोटर वाहन अधिनियम (MV Act) की धारा 185 के अनुसार किसी व्यक्ति को तभी नशे की हालत में वाहन चलाने वाला माना जा सकता है, जब वैज्ञानिक जांच से यह सिद्ध हो कि उसके रक्त में प्रति 100 मिलीलीटर रक्त में 30 मिलीग्राम से अधिक शराब मौजूद थी। साथ ही यह भी कहा गया कि दुर्घटना चालक की लापरवाही से नहीं, बल्कि वाहन के अगले बाएं टायर के फट जाने के कारण हुई थी।

हाईकोर्ट ने तकनीकी जांच रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि दुर्घटना का कारण वाहन के अगले बाएं टायर का फटना बताया गया। अदालत ने यह भी पाया कि प्रत्यक्षदर्शियों के बयानों में कहीं भी यह संकेत नहीं मिलता कि चालक तेज, लापरवाहीपूर्ण या नशे की हालत में वाहन चला रहा था।

अदालत ने कहा,

"यद्यपि मेडिकल टेस्ट में चालक के मुंह से शराब की गंध आने का उल्लेख है, लेकिन यह साबित करने के लिए कि उसके शरीर में शराब की मात्रा मोटर वाहन अधिनियम की धारा 185 में निर्धारित सीमा से अधिक थी, न तो रक्त का नमूना लिया गया और न ही कोई अन्य वैज्ञानिक जांच कराई गई।"

हाईकोर्ट ने माना कि जांच के दौरान जुटाए गए साक्ष्यों से प्रथम दृष्टया BNS की धारा 105 के तहत आरोप तय करने के लिए आवश्यक तत्व साबित नहीं होते। इसलिए अदालत ने इस धारा के तहत तय आरोप रद्द किया।

हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि BNS की धारा 125(क), 125(ख) और 281 के तहत तय किए गए आरोप यथावत बने रहेंगे।

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