सक्षम व्यक्ति बेरोज़गारी का बहाना बनाकर भरण-पोषण से बच नहीं सकता: उत्तराखंड हाईकोर्ट

Update: 2026-04-02 13:55 GMT

उत्तराखंड हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया कि बेरोज़गारी का महज़ बहाना किसी सक्षम और योग्य व्यक्ति को CrPC की धारा 125 के तहत अपने नाबालिग बच्चों के भरण-पोषण की ज़िम्मेदारी से मुक्त नहीं कर सकता। कोर्ट ने इस सिद्धांत को दोहराया कि एक सक्षम व्यक्ति के बारे में यह माना जाता है कि उसमें कमाने की क्षमता है। साथ ही जानबूझकर की गई या बिना सबूत वाली बेरोज़गारी का इस्तेमाल कानूनी ज़िम्मेदारी से बचने के लिए नहीं किया जा सकता।

इस सिद्धांत को लागू करते हुए कोर्ट ने दो नाबालिग बच्चों को दिए गए भरण-पोषण में दखल देने से इनकार किया और पिता की चुनौती और बच्चों की भरण-पोषण की रकम बढ़ाने की अपील, दोनों को खारिज कर दिया।

जस्टिस आलोक मेहरा हरिद्वार फैमिली कोर्ट के आदेश से जुड़े क्रॉस-रिवीजन मामलों की सुनवाई कर रहे थे, जिसमें पिता को निर्देश दिया गया कि वह अपने दो नाबालिग बच्चों में से हर एक को हर महीने ₹6,500 का भुगतान करे।

यह कार्यवाही CrPC की धारा 125 के तहत नाबालिग बच्चों द्वारा अपनी माँ के ज़रिए दायर एक आवेदन से शुरू हुई, जिसमें बच्चों ने पिता पर उपेक्षा का आरोप लगाया और भरण-पोषण की मांग की। फैमिली कोर्ट ने रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री का मूल्यांकन करने के बाद आवेदन को आंशिक रूप से स्वीकार किया और हर बच्चे को हर महीने ₹6,500 का भरण-पोषण देने का आदेश दिया।

इससे असंतुष्ट होकर पिता ने इस आदेश को चुनौती दी और तर्क दिया कि यह उसकी आर्थिक क्षमता से बाहर है, जबकि बच्चों ने भरण-पोषण की रकम बढ़ाने की मांग की।

पिता ने मुख्य रूप से इस आधार पर आदेश को चुनौती देने की कोशिश की कि वह बेरोज़गार है और उसे दी गई भरण-पोषण की रकम का भुगतान करने में आर्थिक रूप से असमर्थ है। उसने तर्क दिया कि फैमिली कोर्ट उसकी आर्थिक स्थिति पर ठीक से विचार करने में विफल रही और उसने माँ की घोषित आय को गलत तरीके से नज़रअंदाज़ कर दिया।

आगे यह भी तर्क दिया गया कि भरण-पोषण की ज़िम्मेदारी दोनों माता-पिता के बीच बांटी जानी चाहिए थी, खासकर माँ की कमाई को देखते हुए। पिता ने आवेदन की तारीख से ही भरण-पोषण दिए जाने पर भी आपत्तियां उठाईं।

नाबालिग बच्चों की ओर से यह तर्क दिया गया कि पिता एक योग्य और सक्षम व्यक्ति है, जिसकी कमाने की क्षमता पर्याप्त है और जिसने जानबूझकर अपनी असली आर्थिक स्थिति छिपाई है। बच्चों की बढ़ती शिक्षा और रहन-सहन के खर्चों पर ज़ोर दिया गया।

आगे यह भी तर्क दिया गया कि सिर्फ़ इस बात से कि माँ कमा रही है, बच्चों के भरण-पोषण की पिता की स्वतंत्र ज़िम्मेदारी कम नहीं हो जाती, खासकर तब जब बच्चे माँ के साथ ही रह रहे हैं और उनके रोज़मर्रा के खर्चों का बोझ माँ ही उठा रही है।

कोर्ट ने शुरुआत में दोहराया कि CrPC की धारा 125 के तहत होने वाली कार्यवाही संक्षिप्त प्रकृति की होती है। इसका मकसद पत्नियों और बच्चों को बेसहारा होने से बचाना होता है, न कि किसी पक्ष को सज़ा देना। यह भी ज़ोर देकर कहा गया कि रिवीज़न में दखल केवल उन मामलों तक सीमित है, जहां कोई गैर-कानूनी काम हुआ हो या कोई विकृति (Perversity) नज़र आई हो।

पिता की बेरोज़गारी की दलील पर कोर्ट ने रिकॉर्ड पर मौजूद सबूतों की जांच की, जिसमें क्रॉस-एग्ज़ामिनेशन के दौरान पिता द्वारा खुद किए गए खुलासे भी शामिल थे। पिता ने माना कि वह टोक्यो स्थित एक कंपनी में काम कर रहा था, जहां उसे एक ऐसा ऑफ़र मिला, जिसमें काफ़ी ज़्यादा मासिक और सालाना CTC (कुल वेतन पैकेज) दिखाया गया। साथ ही उसकी 'टेक-होम सैलरी' (हाथ में आने वाला वेतन) लगभग ₹64,000 प्रति माह थी। इस पृष्ठभूमि में कोर्ट ने फ़ैसला दिया कि बेरोज़गारी की यह दलील नेकनीयत (Bona Fide) नहीं थी।

कोर्ट ने रिवीज़निस्ट-पिता की दलीलों के संबंध में यह बात कही,

"यह कानून का एक स्थापित सिद्धांत है कि बेरोज़गारी की कोरी दलील को आँख मूंदकर स्वीकार नहीं किया जा सकता, खासकर तब जब संबंधित व्यक्ति शारीरिक रूप से सक्षम, योग्य और अनुभवी हो। रिवीज़निस्ट (याचिकाकर्ता-पिता) ने खुद माना कि वह MCA ग्रेजुएट है और उसके पास काम का काफ़ी अनुभव है। ऐसी परिस्थितियों में यह दलील कि वह लंबित मुकदमों के कारण कमाने में असमर्थ है, स्वीकार्य नहीं है। एक शारीरिक रूप से सक्षम व्यक्ति के बारे में यह माना जाता है कि उसमें कमाने की क्षमता है। साथ ही जानबूझकर या अपनी मर्ज़ी से बेरोज़गार रहना, कानूनी ज़िम्मेदारी से बचने का बहाना नहीं हो सकता।"

जहां तक माँ की आय का सवाल है, कोर्ट ने यह पाया कि उनकी कमाई का ब्योरा रिकॉर्ड पर रखा गया और फैमिली कोर्ट ने उस पर विचार किया था। हालांकि, कोर्ट ने इस बात को फिर से दोहराया कि माँ की कमाई होने से पिता अपनी नाबालिग संतानों के भरण-पोषण की अपनी कानूनी और नैतिक ज़िम्मेदारी से मुक्त नहीं हो जाते। पिता की यह ज़िम्मेदारी स्वतंत्र होती है और तब तक बनी रहती है जब तक बच्चे नाबालिग रहते हैं।

कोर्ट ने फ़ैसला सुनाया,

"सिर्फ़ इस बात से कि माँ कमा रही है, पिता अपनी नाबालिग संतानों के भरण-पोषण की अपनी कानूनी और नैतिक ज़िम्मेदारी से मुक्त नहीं हो जाते। अपने बच्चों के भरण-पोषण की पिता की ज़िम्मेदारी स्वतंत्र होती है और तब तक बनी रहती है जब तक बच्चे नाबालिग रहते हैं। न्यायिक मिसालें लगातार यह मानती रही हैं कि भले ही माता-पिता दोनों कमा रहे हों, पिता अपनी ज़िम्मेदारी से बच नहीं सकते, खासकर तब जब बच्चे माँ के साथ रह रहे हों और उनके रोज़मर्रा की देखभाल और परवरिश की मुख्य ज़िम्मेदारी माँ ही उठा रही हो।"

कोर्ट ने आगे इस दलील को भी खारिज कर दिया कि भरण-पोषण की ज़िम्मेदारी को माता-पिता के बीच गणितीय रूप से (बराबर-बराबर) बाँटा जाना चाहिए। साथ ही यह टिप्पणी की कि CrPC की धारा 125 में इस तरह के बँटवारे का कोई प्रावधान नहीं है। कोर्ट ने यह भी पाया कि फैमिली कोर्ट ने दोनों पक्षों की आर्थिक स्थिति और बच्चों की ज़रूरतों पर विचार करने के बाद ही भरण-पोषण की एक उचित राशि तय की थी।

हाईकोर्ट ने यह फ़ैसला सुनाया कि प्रति बच्चा ₹6,500 प्रति माह का भरण-पोषण उचित है और इसमें किसी भी तरह की कोई गैर-कानूनी बात या विसंगति नहीं है।

तदनुसार, पिता द्वारा भरण-पोषण की राशि कम करने के लिए दायर की गई पुनर्विचार याचिका और बच्चों द्वारा राशि बढ़ाने के लिए दायर की गई पुनर्विचार याचिका, दोनों को ही खारिज की और फैमिली कोर्ट का आदेश बरकरार रखा।

Case Name: Dheeraj Kapoor v State of Uttarakhand and Ors with Ridhi Kapoor and Another v Dheeraj Kapoor

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