स्वतंत्र प्रैक्टिस करने वाली वकील को सिर्फ पेशे के आधार पर भरणपोषण से वंचित नहीं किया जा सकता: तेलंगाना हाईकोर्ट
तेलंगाना हाईकोर्ट ने कहा है कि सिर्फ अधिवक्ता के रूप में नामांकित होने और स्वतंत्र रूप से वकालत करने से यह साबित नहीं होता कि पत्नी की पर्याप्त स्वतंत्र आय है और उसे हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 24 के तहत भरणपोषण नहीं दिया जाना चाहिए।
जस्टिस वाकिति रामकृष्ण रेड्डी ने पत्नी की रिव्यू याचिका मंजूर करते हुए हाईकोर्ट के अक्टूबर 2024 के उस आदेश को वापस ले लिया, जिसमें फैमिली कोर्ट द्वारा पत्नी को दिए गए ₹20,000 प्रतिमाह अंतरिम भरणपोषण को रद्द कर दिया गया था।
मामला हैदराबाद की I Additional Family Court में वर्ष 2010 से लंबित वैवाहिक विवाद से जुड़ा है। वर्ष 2013 में फैमिली कोर्ट ने पत्नी को ₹20,000 और दोनों बेटियों को ₹15,000-₹15,000 प्रतिमाह अंतरिम भरणपोषण देने का आदेश दिया था।
पति ने इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। अक्टूबर 2024 में हाईकोर्ट ने पत्नी का भरणपोषण रद्द कर दिया, जबकि बेटियों के लिए भरणपोषण को उनकी बालिग होने तक बरकरार रखा। इसके बाद पत्नी ने रिव्यू याचिका दाखिल की।
पत्नी ने बताया कि वह किसी नौकरी में नहीं थी बल्कि स्वतंत्र रूप से वकालत करती थी, जिससे होने वाली आय नियमित या निश्चित नहीं थी। कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार करते हुए कहा कि नौकरी से मिलने वाली निश्चित आय और स्वतंत्र प्रैक्टिस से होने वाली अनियमित आय में महत्वपूर्ण अंतर है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि धारा 24 के तहत मुख्य सवाल यह है कि वास्तव में उपलब्ध आय पत्नी के भरणपोषण और मुकदमे के खर्च के लिए पर्याप्त है या नहीं। केवल शैक्षणिक योग्यता, पेशेवर स्थिति या कमाने की क्षमता के आधार पर भरणपोषण से इनकार नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के Chaturbhuj v. Sita Bai, Shailja v. Khobbanna और Manish Jain v. Akanksha Jain के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि कमाने की क्षमता या कुछ आय होना अपने आप में भरणपोषण से वंचित करने का आधार नहीं है।
कोर्ट ने पाया कि उसके पिछले आदेश में पत्नी की वास्तविक आय, उसकी पर्याप्तता और पति की आय एवं आर्थिक क्षमता पर कोई ठोस निष्कर्ष नहीं था। इसके अलावा, Rajnesh v. Neha में सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित भरणपोषण संबंधी दिशानिर्देशों पर भी उचित विचार नहीं किया गया था।
कोर्ट ने यह भी कहा कि रिवीजनल क्षेत्राधिकार में हाईकोर्ट फैमिली कोर्ट के तथ्यों का नए सिरे से मूल्यांकन नहीं कर सकता, जब तक उसके निष्कर्षों में कोई विकृति या क्षेत्राधिकार संबंधी त्रुटि न हो।
हाईकोर्ट ने रिव्यू याचिका मंजूर करते हुए अक्टूबर 2024 का आदेश वापस ले लिया और पति की सिविल रिवीजन याचिका खारिज कर दी। इसके साथ ही 2013 के फैमिली कोर्ट के अंतरिम भरणपोषण आदेश को उसके मूल रूप में बहाल कर दिया गया।
पति को बकाया भरणपोषण की गणना, पहले किए गए भुगतानों और शेष राशि का विवरण तथा Rajnesh v. Neha के अनुसार संपत्ति और देनदारियों का हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया गया। निर्धारित बकाया राशि का भुगतान 8 सप्ताह के भीतर करने का आदेश दिया गया।