498A की शिकायत करना अपने आप में क्रूरता नहीं, तलाक का आधार भी नहीं: तेलंगाना हाईकोर्ट
तेलंगाना हाईकोर्ट ने अहम फैसला सुनाते हुए कहा कि पति और उसके परिवार के खिलाफ दहेज उत्पीड़न और क्रूरता के आरोप में शिकायत दर्ज कराना अपने आप में पत्नी की ओर से क्रूरता नहीं माना जा सकता। केवल इस आधार पर तलाक नहीं दिया जा सकता भले ही बाद में आपराधिक मामले में पति और उसके परिवार को बरी कर दिया गया हो।
जस्टिस के. लक्ष्मण और जस्टिस के. सुजाना की खंडपीठ ने कहा कि यदि पति हिंदू विवाह अधिनियम के तहत क्रूरता के आधार पर तलाक मांगता है तो क्रूरता के आरोपों को ठोस और विश्वसनीय साक्ष्यों से साबित करने की जिम्मेदारी उसी की है। केवल खुद गवाही देना और आरोप लगा देना पर्याप्त नहीं है।
अदालत ने स्पष्ट कहा,
“पति और उसके परिवार के खिलाफ धारा 498ए और दहेज निषेध अधिनियम की धाराओं 3 और 4 के तहत शिकायत दर्ज कराना मात्र क्रूरता नहीं है।”
मामले में पति-पत्नी का विवाह फरवरी 2009 में हुआ था और नवंबर 2009 में उनकी बेटी का जन्म हुआ। दोनों अगस्त 2010 से अलग रह रहे है। पति ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13(1)(ia) के तहत क्रूरता के आधार पर तलाक की याचिका दायर की थी। इसके बाद पत्नी ने वैवाहिक जीवन बहाल करने की मांग को लेकर धारा 9 के तहत याचिका दाखिल की।
फैमिली कोर्ट ने पति की याचिका स्वीकार करते हुए तलाक दे दिया था और पत्नी की वैवाहिक जीवन बहाल करने की याचिका खारिज कर दी थी। इसके खिलाफ पत्नी ने हाईकोर्ट का रुख किया।
पति ने आरोप लगाया था कि पत्नी उसे और उसकी मां को प्रताड़ित करती थी, बार-बार मायके चली जाती थी, अलग घर में रहने का दबाव बनाती थी और उसके साथ मारपीट भी करती थी। उसने पत्नी पर मानसिक बीमारी से पीड़ित होने और शादी से पहले यह बात छिपाने का भी आरोप लगाया। पति ने यह भी कहा कि पत्नी ने उसके परिवार को झूठे आपराधिक मामलों में फंसाने की धमकी दी थी।
हाईकोर्ट ने इन आरोपों पर गौर करते हुए पाया कि मानसिक बीमारी से जुड़ा आरोप साबित करने के लिए पति ने न तो कोई दस्तावेज पेश किया और न ही किसी अन्य गवाह को अदालत में पेश किया। पत्नी या उसके पिता की जिरह से भी ऐसा कोई तथ्य सामने नहीं आया, जिससे पति का आरोप साबित हो सके। अदालत ने इस आरोप को गलत पाया।
खंडपीठ ने यह भी कहा कि पति ने पत्नी के खिलाफ कई गंभीर आरोप लगाए लेकिन अपने माता-पिता, पंचायत के बुजुर्गों या किसी अन्य व्यक्ति को गवाह नहीं बनाया। वह केवल खुद अदालत में पेश हुआ और अपने आरोपों के समर्थन में कोई स्वतंत्र साक्ष्य नहीं दे सका।
अदालत ने कहा कि कानून में क्रूरता की कोई निश्चित परिभाषा नहीं है। यह तय करते समय पूरे मामले के तथ्यों, परिस्थितियों और पति-पत्नी के व्यवहार को देखा जाना जरूरी है। किसी एक मामले में जो व्यवहार क्रूरता माना जाए, जरूरी नहीं कि दूसरे मामले में भी वही व्यवहार क्रूरता हो।
हाईकोर्ट ने यह भी माना कि केवल इसलिए पत्नी की ओर से क्रूरता साबित नहीं हो जाती, क्योंकि उसके द्वारा दर्ज आपराधिक मामले में बाद में पति और उसके परिवार को बरी कर दिया गया।
परिवार अदालत के फैसले का महत्वपूर्ण आधार यह है कि पति-पत्नी अगस्त 2010 से अलग रह रहे थे और इतने लंबे समय में उनके बीच वैवाहिक संबंध बहाल होने की कोई संभावना नहीं बची। परिवार अदालत ने इसे विवाह के पूरी तरह टूट जाने का मामला मानते हुए तलाक दे दिया।
इस पर हाईकोर्ट ने साफ किया कि विवाह का पूरी तरह टूट जाना अपने आप में तलाक का वैधानिक आधार नहीं है। हाईकोर्ट ने कहा कि न तो फैमिली कोर्ट और न ही हाईकोर्ट केवल 'विवाह के अपूरणीय रूप से टूट जाने' के आधार पर तलाक की डिक्री दे सकता है।
चूंकि पति क्रूरता के आरोपों को ठोस साक्ष्यों से साबित नहीं कर सका और परिवार अदालत ने ऐसा आधार अपनाया, जो कानून में तलाक का वैधानिक आधार नहीं है, इसलिए हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट का आदेश रद्द कर दिया।
हाईकोर्ट ने पत्नी की तलाक संबंधी अपील स्वीकार करते हुए तलाक की डिक्री समाप्त की। वहीं, वैवाहिक जीवन बहाल करने की उसकी याचिका पर अदालत ने इस तथ्य को देखते हुए कार्यवाही समाप्त की कि मूल याचिका 2013 में दाखिल हुई और दोनों वर्ष 2010 से अलग रह रहे हैं। पत्नी को वैवाहिक जीवन बहाल करने के लिए नई याचिका दाखिल करने की स्वतंत्रता दी गई।