सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि SHANTI Act में परमाणु हादसे के लिए मुआवजे की सीमा तय होने के बावजूद, संवैधानिक अदालतों को पीड़ितों के लिए “उचित और न्यायसंगत” मुआवजा तय करने से नहीं रोका जा सकता।

चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की खंडपीठ ने केंद्र सरकार और Atomic Energy Regulatory Board (AERB) से दो मुद्दों पर स्पष्टीकरण मांगा—क्या Act संवैधानिक अदालतों की मुआवजा तय करने की शक्ति को सीमित करता है और धारा 17(4) के तहत AERB सदस्यों की नियुक्ति की व्यवस्था।

SHANTI Act को चुनौती

पीठ EAS Sarma व अन्य की जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें निजी परमाणु ऑपरेटरों और सरकार की देयता सीमित करने वाले प्रावधानों को चुनौती दी गई है।

याचिकाकर्ताओं की ओर से प्रशांत भूषण ने कहा कि सबसे बड़े परमाणु संयंत्र के ऑपरेटर की अधिकतम देयता ₹3,000 करोड़, जबकि केंद्र की residual liability ₹4,500 करोड़ तक सीमित है। उन्होंने चेरनोबिल और फुकुशिमा हादसों का हवाला देते हुए कहा कि वास्तविक नुकसान इससे कई गुना अधिक हो सकता है।

CJI सूर्यकांत ने कहा कि “केवल इसलिए कि संसद ने एक सीमा तय की है, इसका मतलब यह नहीं कि अदालतें उचित मुआवजा नहीं दे सकतीं।”

AERB की स्वतंत्रता पर भी सवाल

भूषण ने AERB की स्वतंत्रता पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि उसके सदस्यों की नियुक्ति में Atomic Energy Commission (AEC) की भूमिका है, जबकि AEC परमाणु संयंत्रों के संचालन से भी जुड़ा है। उन्होंने इसे नियामक स्वतंत्रता के सिद्धांत के विपरीत बताया।

कोर्ट ने इन दोनों सीमित मुद्दों पर केंद्र सरकार और AERB को नोटिस जारी किया और स्पष्टीकरण मांगा।

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