सुप्रीम कोर्ट ने बिहार के 25 साल पुराने कर्मचारियों के बकाया मामले में दिहाड़ी मजदूरों को ₹1 लाख का मुआवज़ा देने का निर्देश दिया
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (28 सितंबर) को बिहार और झारखंड राज्यों को निर्देश दिया कि वे राज्य के स्वामित्व वाले पांच बंद हो चुके निगमों के हर संबंधित दिहाड़ी कर्मचारी/मज़दूर को एकमुश्त ₹1 लाख का भुगतान करें। साथ ही कोर्ट ने देर से दिए जाने वाले EPF बकाया पर सालाना 12% साधारण ब्याज और देर से दिए जाने वाले वेतन/मज़दूरी और अन्य मौद्रिक बकाया पर 6% ब्याज देने का आदेश दिया।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने आदेश दिया,
"...हम बिहार और झारखंड राज्यों को यह निर्देश देना उचित समझते हैं कि वे पहले से तय और भुगतान की गई राशि के अलावा, संबंधित अवधि के दौरान संबंधित निगम द्वारा नियोजित प्रत्येक दिहाड़ी कर्मचारी/मज़दूर को एकमुश्त ₹1,00,000/- का भुगतान करें।"
इस आदेश के साथ ही कोर्ट ने वह विवाद समाप्त किया, जो बिहार पुनर्गठन अधिनियम, 2000 से शुरू हुआ था और झारखंड के गठन के बाद राज्य के स्वामित्व वाले पांच बंद हो चुके निगमों के कर्मचारियों और मज़दूरों के बकाया दायित्वों से जुड़ा था।
यह मामला बिहार पुनर्गठन अधिनियम, 2000 के तहत तत्कालीन बिहार राज्य के पुनर्गठन से उत्पन्न हुआ था, जिसके बाद झारखंड को एक अलग राज्य के रूप में बनाया गया। पुनर्गठन के कारण राज्य के स्वामित्व वाले पांच अंतर-राज्यीय निगमों - बिहार राज्य निर्माण निगम लिमिटेड, बिहार राज्य औद्योगिक विकास निगम लिमिटेड, बिहार राज्य इलेक्ट्रॉनिक विकास निगम लिमिटेड, बिहार राज्य वन विकास निगम लिमिटेड और बिहार राज्य पंचायती राज वित्तीय निगम लिमिटेड - के कर्मचारियों/मज़दूरों के दायित्वों और सेवा-संबंधी दावों के बंटवारे और निपटान को लेकर विवाद पैदा हुए। इस मुकदमे की शुरुआत कपिला हिंगोरानी बनाम बिहार राज्य और अंतर-राज्यीय दायित्वों से संबंधित बाद की कार्यवाहियों से हुई।
सुप्रीम कोर्ट ने 29 मई, 2026 के एक आदेश के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस दिनेश माहेश्वरी की अध्यक्षता वाली समिति की अंतिम रिपोर्ट पर विचार किया और उस आदेश में बताई गई हद तक इसकी सिफारिशों को स्वीकार किया था।
निर्देशों के अनुसार, बिहार और झारखंड ने अगस्त 2026 में अनुपालन हलफनामे (Compliance Affidavits) दाखिल किए। इनमें पहचाने गए और सत्यापित कर्मचारियों/कामगारों को मूल बकाया राशि के भुगतान की जानकारी दी गई, जबकि कुछ दावे लंबित रह गए क्योंकि दावेदार मिल नहीं पाए या ज़रूरी दस्तावेज़ और सत्यापन की प्रक्रियाएँ पूरी नहीं हो पाई थीं।
मौजूदा कार्यवाही 29 मई के आदेश में छोड़े गए तीन मुद्दों से संबंधित थी: बचे हुए कर्मचारियों/कामगारों की पहचान और सत्यापन, दिहाड़ी मज़दूरों और कानूनी उत्तराधिकारियों के अधिकार, और देर से मिलने वाले वेतन, रिटायरमेंट और प्रॉविडेंट फंड के बकाये पर ब्याज।
कोर्ट ने पात्र कामगारों को 1 लाख रुपये और उस पर लागू ब्याज का भुगतान करने का आदेश दिया। साथ ही, कोर्ट ने राज्य का वह हिसाब-किताब खारिज किया, जिसमें 1992 के बाद से कामगारों के बकाये की गणना के लिए 42.50 रुपये प्रति दिन की एक समान दर का इस्तेमाल किया गया।
कोर्ट ने कहा,
"संबंधित कामगारों को दिहाड़ी के आधार पर काम पर रखा गया, यह तथ्य अपने आप में ऐसी गणना को सही नहीं ठहरा सकता जो समय बीतने और उनके काम के दौरान लागू वेतन को नज़रअंदाज़ करती हो।"
कोर्ट ने कहा,
"दिहाड़ी कामगार के तौर पर उनकी स्थिति बेशक उन्हें नियमित कर्मचारियों से अलग करती है, लेकिन यह इस आधार पर उनकी सेवाओं को एक निश्चित और कभी न बदलने वाली मौद्रिक कीमत (Monetary Value) वाला नहीं मान सकती, चाहे सेवाएँ किसी भी समय दी गई हों... 1992 के बाद से लंबे समय तक कामगारों के बकाये की गणना के लिए एक समान आधार के तौर पर 42.50 रुपये की निश्चित दिहाड़ी तय करना, हमारी नज़र में, उनके मौद्रिक अधिकार का उचित और सही पैमाना नहीं हो सकता।"
इसके अलावा, जब कोर्ट को बताया गया कि 2,274 सत्यापित कर्मचारियों/कामगारों में से 2,074 को पूरा बकाया मिल चुका है और लगभग 200 मामले अभी भी लंबित हैं (मुख्य रूप से इसलिए क्योंकि दावेदार मिल नहीं पाए या ज़रूरी दस्तावेज़ उपलब्ध नहीं थे), तो कोर्ट ने सामान्य पहचान और सत्यापन की प्रक्रिया बंद की, लेकिन न मिल पाने वाले कर्मचारियों और कानूनी उत्तराधिकारियों के दावों को सुरक्षित रखा।
ऐसे दावेदारों को फ़ैसले की तारीख़ से 12 महीने का समय दिया गया कि वे ज़रूरी दस्तावेज़ों के साथ संबंधित नोडल ऑफ़िसर से संपर्क करें। जांच के बाद उनके दावों पर कार्रवाई की जाएगी और जो भी रकम बनती है, उसका भुगतान किया जाएगा।
Cause Title: BIHAR STATE ARDH SARKARI ARAJPATI KARAMCHARI MAHA SANGH AND OTHERS VERSUS STATE OF BIHAR AND OTHERS