सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अधिकारी सिर्फ़ आरोपी के कबूलनामे के आधार पर प्रिवेंटिव डिटेंशन (एहतियाती हिरासत) का आदेश जारी नहीं कर सकते। कोर्ट ने नेशनल सिक्योरिटी एक्ट, 1980 के तहत मुल्ला अफ़रोज़ की हिरासत रद्द की, जिस पर 2024 की संभल हिंसा का मास्टरमाइंड होने का आरोप है।

"इसलिए हमारी राय है कि पुलिस अधिकारी के सामने दिया गया कबूलनामा, अकेले और किसी स्वतंत्र सबूत के समर्थन के बिना प्रिवेंटिव डिटेंशन के आदेश को बनाए रखने के लिए ज़रूरी 'व्यक्तिगत संतुष्टि' (Subjective Satisfaction) का आधार नहीं बन सकता। ऐसा करने की इजाज़त देने का मतलब होगा कि हिरासत का आदेश ऐसी बुनियाद पर टिका हो, जिसे कानून खुद शक की नज़र से देखता है और सबूत के तौर पर विचार करने से बाहर रखता है।"

इस मामले में हिंसा भड़कने के 54 दिन बाद आरोपी को गिरफ़्तार किया गया। कस्टडी के दौरान, पुलिस ने उसका कबूलनामा दर्ज किया, जिसके आधार पर कथित तौर पर 0.32 बोर की पिस्तौल बरामद की गई।

उसकी गैर-कानूनी हिरासत रद्द करते हुए जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की बेंच ने कहा कि चूंकि कबूलनामा ही हिरासत में लेने वाले अधिकारी की 'व्यक्तिगत संतुष्टि' का एकमात्र आधार था, इसलिए कानून की नज़र में यह टिक नहीं सकता।

बेंच ने माना कि पूरी कार्यवाही के दौरान, अपीलकर्ता ने आरोप लगाया कि उसे टॉर्चर किया गया और जान से मारने की धमकी दी गई और उसने मजबूरी में कबूलनामा दिया। हालांकि, राज्य ने इन आरोपों का खंडन नहीं किया। ऐसी स्थिति में किसी भी तरह से यह नहीं माना जा सकता कि उसने अपनी मर्ज़ी से यह बयान दिया।

बेंच ने कहा कि जब आपराधिक मामलों में अपराध साबित करने के मकसद से 'एक्स्ट्रा-ज्यूडिशियल कन्फेशन' (न्यायालय के बाहर किया गया कबूलनामा) को स्वीकार्य नहीं माना जाता है तो यह स्पष्ट रूप से उस 'व्यक्तिगत संतुष्टि' का आधार नहीं बन सकता, जिस तक हिरासत का आदेश जारी करते समय हिरासत में लेने वाले अधिकारी को पहुंचना होता है। इसके विपरीत कुछ भी मानना ​​आर्टिकल 22(5) के तहत मिली सुरक्षा के मूल सिद्धांत के खिलाफ़ है।

आगे कहा गया,

"सवाल यह उठता है कि क्या कोई ऐसा बयान, जिसे कानून अपराध साबित करने के लिए गैर-ज़रूरी मानता है। फिर भी 'प्रिवेंटिव डिटेंशन' (एहतियाती हिरासत) के आदेश को सही ठहराने के लिए ज़रूरी 'व्यक्तिगत संतुष्टि' का आधार बन सकता है? हमारा मानना ​​है कि ऐसा नहीं हो सकता!"

बेंच ने चर्चा की कि संविधान का अनुच्छेद 22 हिरासत में लिए गए व्यक्ति को दो महत्वपूर्ण अधिकार देता है: हिरासत के आधार बताए जाना और अपनी बात रखने (रिप्रेजेंटेशन) का जल्द से जल्द मौका मिलना। इन दोनों अधिकारों का सही इस्तेमाल तभी हो सकता है जब हिरासत के आधार प्रासंगिक (relevant), स्पष्ट और ऐसे हों जिनका प्रभावी ढंग से जवाब दिया जा सके।

बेंच ने कहा,

"किसी गैर-ज़रूरी आधार को शामिल करना, अस्पष्ट या धुंधले आधार को शामिल करने की तरह ही अनुच्छेद 22(5) द्वारा दी गई सुरक्षा की जड़ पर प्रहार करता है। इसलिए हिरासत में लिए गए व्यक्ति से उन आरोपों के खिलाफ प्रभावी ढंग से अपनी बात रखने की उम्मीद नहीं की जा सकती, जो कानून की नज़र में हिरासत को ही सही ठहराने में सक्षम नहीं हैं। जब हिरासत का आदेश देने वाले अधिकारी की 'व्यक्तिगत संतुष्टि' पूरी तरह या आंशिक रूप से ऐसी सामग्री पर आधारित होती है, जो कानूनी रूप से गैर-ज़रूरी है तो संवैधानिक सुरक्षा कमज़ोर हो जाती है। ऐसे गैर-ज़रूरी आरोपों पर आधारित 'प्रिवेंटिव डिटेंशन' के आदेश को, केवल इसी कारण से, टिकने लायक नहीं माना जाना चाहिए।"

इकबालिया बयानों पर कब भरोसा किया जा सकता है?

इसमें कहा गया कि क्या पुलिस के सामने दिया गया इकबालिया बयान 'प्रिवेंटिव डिटेंशन' आदेश का आधार बन सकता है या नहीं, इसकी जांच भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 (BSA) की धारा 23 और संविधान की धारा 20(3) - जो खुद के खिलाफ गवाही देने से सुरक्षा की गारंटी देती है - दोनों के आधार पर की जानी चाहिए।

इसके आधार पर जस्टिस दत्ता के लिखे फ़ैसले में कहा गया कि अगर क्रिमिनल ट्रायल के मकसद से क्रिमिनल कानून में 'एक्स्ट्रा-ज्यूडिशियल कन्फेशन' (कोर्ट के बाहर किया गया कबूलनामा) को हमेशा "शक्की" और "भरोसे के लायक नहीं" माना जाता है तो यह 'प्रिवेंटिव डिटेंशन' (एहतियाती हिरासत) का ठोस आधार कैसे बन सकता है?

फैसले में आगे कहा,

"पुलिस अफ़सर के सामने किए गए कबूलनामे को शक की नज़र से देखा जाता है और माना जाता है कि उस पर ज़बरदस्ती, धमकी, लालच या वादे का असर हो सकता है। BSA की धारा 23 साफ़ तौर पर इस सिद्धांत को मानती है और कहती है कि पुलिस अफ़सर के सामने किए गए किसी भी कबूलनामे को आरोपी के ख़िलाफ़ सबूत के तौर पर पेश नहीं किया जा सकता। इस प्रावधान में सिर्फ़ दो सीमित अपवाद हैं: या तो कानून के मुताबिक मजिस्ट्रेट के सामने कबूलनामा किया गया हो, या फिर उससे किसी तथ्य का पता चले (कानून की सीमा के भीतर)। इसलिए कानून का निर्देश साफ़ है: पुलिस के सामने दिए गए कबूलनामे वाले बयान को भरोसेमंद सबूत नहीं माना जाता और आम तौर पर इसे बयान देने वाले व्यक्ति के ख़िलाफ़ विचार में शामिल नहीं किया जाता है।"

बेंच ने अरुणा कुमारी बनाम आंध्र प्रदेश सरकार (1988) और सेंथामिलसेल्वी बनाम तमिलनाडु राज्य व अन्य (2006) जैसे पुराने मामलों पर भी गौर किया। उत्तर प्रदेश राज्य ने इन मामलों का हवाला देते हुए तर्क दिया कि कबूलनामे वाला बयान डिटेंशन ऑर्डर का आधार बन सकता है। हालांकि, कोर्ट ने कहा कि दोनों ही मामलों में डिटेंशन को इस आधार पर चुनौती नहीं दी गई कि वह कबूलनामे वाले बयानों पर आधारित है। इसके अलावा, कोर्ट ने पाया कि इन दोनों मामलों में यह टिप्पणी कि कबूलनामा डिटेंशन ऑर्डर का आधार बन सकता है, महज़ 'ओबिटर डिक्टा' (मामले के फ़ैसले के लिए ज़रूरी न होने वाली टिप्पणी) है।

Case: Mulla Afroz v. Union of India & Ors. | SLP(Crl) No. 012534 / 2026

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