सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को संभल हिंसा मामले में आरोपी मुल्ला अफरोज की राष्ट्रीय सुरक्षा कानून, 1980 (NSA) के तहत की गई निवारक हिरासत रद्द की। कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फैसले को भी निरस्त किया, जिसमें हिरासत आदेश बरकरार रखा गया था।

जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की खंडपीठ ने कहा कि उत्तर प्रदेश सरकार पुलिस हिरासत में कथित तौर पर दिए गए कबूलनामे के आधार पर निवारक हिरासत का आदेश पारित नहीं कर सकती थी। कोर्ट ने हिरासत का आदेश गैरकानूनी पाए जाने पर उत्तर प्रदेश सरकार पर 10 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया।

फैसला सुनाते समय जस्टिस दीपांकर दत्ता ने अपने उस कानून सहायक को श्रद्धांजलि दी, जिसकी 27 वर्ष की आयु पूरी होने से पहले मृत्यु हो गई।

जस्टिस दत्ता ने यह फैसला उनकी स्मृति को समर्पित किया।

मुल्ला अफरोज पर 2024 में संभल में शाही जामा मस्जिद के अदालत के आदेश पर किए गए सर्वे के बाद हुई हिंसा में शामिल होने का आरोप है। इस हिंसा में चार लोगों की मौत हुई थी। अफरोज को घटना के करीब 54 दिन बाद गिरफ्तार किया गया। आरोप है कि उसकी गिरफ्तारी पुलिस हिरासत में दिए गए एक कथित कबूलनामे के आधार पर हुई।

बाद में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उन्हें जमानत दी थी। इसके बावजूद 13 अक्टूबर 2025 को NSA के तहत उसके खिलाफ निवारक हिरासत का आदेश जारी किया गया। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस आदेश को बरकरार रखा, जिसके बाद अफरोज ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।

सुप्रीम कोर्ट में अफरोज की ओर से दलील दी गई कि उसकी गिरफ्तारी पुलिस हिरासत में कथित रूप से दिए गए कबूलनामे पर आधारित है, जिसे कानून के तहत स्वीकार नहीं किया जा सकता। यह भी कहा गया कि केवल कई आपराधिक मामलों का मौजूद होना अपने आप में निवारक हिरासत का आधार नहीं बन सकता। इसके लिए पर्याप्त सामग्री के आधार पर वास्तविक और सूचित संतुष्टि आवश्यक है।

याचिकाकर्ता की ओर से यह भी दलील दी गई कि हिंसा के दौरान पुलिस द्वारा कथित रूप से की गई गोलीबारी की निष्पक्ष जांच नहीं हुई। उसने इस संबंध में विरोध याचिका दाखिल करने की अनुमति देने की मांग भी की।

सुनवाई के दौरान खंडपीठ ने कथित पुलिस हिरासत में दिए गए कबूलनामे की प्रासंगिकता और प्रमाणिकता पर सवाल उठाए। 8 सितंबर को फैसला सुरक्षित रखते समय कोर्ट ने विशेष रूप से यह जानना चाहा था कि ऐसा कबूलनामा निवारक हिरासत के आदेश के लिए आवश्यक 'व्यक्तिपरक संतुष्टि' का आधार बन सकता है या नहीं।

उत्तर प्रदेश सरकार ने हिरासत के आदेश का बचाव करते हुए दलील दी कि उपलब्ध सामग्री से यह आशंका सामने आती है कि अफरोज दोबारा हिंसा कर सकता है या सार्वजनिक व्यवस्था को प्रभावित कर सकता है। सरकार का कहना था कि ऐसी संभावना दर्शाने वाली सामग्री निवारक हिरासत को उचित ठहराने के लिए पर्याप्त हो सकती है।

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने निवारक हिरासत आदेश रद्द किया और उत्तर प्रदेश सरकार पर 10 लाख रुपये का जुर्माना लगाया।

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