सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में कहा कि जहां मजिस्ट्रेट ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) के लागू होने के बाद ही न्यायिक विवेक का इस्तेमाल किया और प्रथम दृष्टया मामला पाया तो उस तारीख को ही संज्ञान लिया हुआ माना जाएगा। इसलिए आरोपी की बात पहले सुनी जानी चाहिए थी, जैसा कि BNSS की धारा 223 के प्रावधान में ज़रूरी है।

जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के विनोद चंद्रन की बेंच ने स्पेशल जज का वह आदेश रद्द किया, जिसमें प्रथम दृष्टया मामला पाया गया और संज्ञान लिया गया।

कोर्ट ने इस मुद्दे को इस तरह तय किया:

"क्या 01.07.2024 से लागू हुई भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) से पहले या बाद में, दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC) की धारा 200 के तहत दायर प्रोटेस्ट याचिका पर 'संज्ञान' लिया गया।"

07.06.2022 को FIR दर्ज की गई। पुलिस ने 06.08.2022 को क्लोजर रिपोर्ट दायर की। 14.10.2022 को प्रोटेस्ट याचिका दायर की गई और 29.11.2022 को दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC, अब BNSS 2023 की धारा 193(9)) की धारा 173(8) के तहत आगे की जांच का आदेश दिया गया। 14.02.2023 को दूसरी क्लोजर रिपोर्ट और 28.04.2023 को एक और प्रोटेस्ट याचिका दायर की गई।

शिकायत पर 11.10.2023 को विचार किया गया। शिकायतकर्ता और अन्य गवाहों के बयान 06.03.2024 को दर्ज किए गए। कोर्ट ने कहा कि "मामला 03.06.2026 तक अधर में लटका रहा", जब आज़मगढ़ के स्पेशल जज (अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम) ने प्रथम दृष्टया अपराध होने की बात मानी और आरोपी के खिलाफ़ कार्रवाई शुरू करने का आदेश दिया।

सुप्रीम कोर्ट में आरोपी की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट शोएब आलम ने तर्क दिया कि 03.06.2026 का आदेश वह आदेश था, जिसके तहत BNSS लागू होने के बाद मामले का संज्ञान लिया गया। परविंदर सिंह बनाम डायरेक्टरेट ऑफ़ एनफोर्समेंट मामले का हवाला देते हुए कहा गया कि संज्ञान "केवल आरोपी को अपनी बात रखने का मौका देने के बाद ही लिया जा सकता है, जैसा कि BNSS की धारा 223 के प्रावधान में कानूनी रूप से अनिवार्य है"।

इसके विपरीत, प्रतिवादी ने तर्क दिया कि संज्ञान BNSS के लागू होने से पहले ही ले लिया गया।

सीनियर एडवोकेट सैयद वसीम कादरी ने शिकायतकर्ता की ओर से तर्क दिया कि यह दिखाने के लिए कि संज्ञान लिया गया, किसी औपचारिक आदेश की आवश्यकता नहीं है। CREF फाइनेंस लिमिटेड बनाम श्री शांति होम्स (P) लिमिटेड और जुनैद बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य मामलों का हवाला देते हुए तर्क दिया गया कि संज्ञान लेना 'प्रक्रिया शुरू करने' (issue of process) से अलग है और यह "उसी क्षण ले लिया गया, जब शिकायत को कोर्ट की फाइलों में स्वीकार किया गया"।

सुप्रीम कोर्ट ने CREF फाइनेंस मामले का सारांश प्रस्तुत किया, जिसमें यह माना गया कि संज्ञान अपराध का लिया जाता है, न कि अपराधी का। एक बार जब कोर्ट इस बात से संतुष्ट हो जाता है कि मामले में अपराध का पता चलता है और वह आगे बढ़ता है तो यह माना जाना चाहिए कि उसने संज्ञान ले लिया है। कोर्ट ने यह भी कहा कि संज्ञान एक ऐसा शब्द है "जिसका अर्थ निश्चित नहीं है और यह कानूनी आवश्यकताओं पर निर्भर करता है"।

जुनैद मामले के संबंध में बेंच ने दर्ज किया कि धारा 173 के तहत पुलिस रिपोर्ट मिलने पर मजिस्ट्रेट के पास तीन विकल्प होते हैं। हो सकता है कि वह कोई कार्रवाई न करे, या पुलिस के निष्कर्ष से बंधे बिना मामले का संज्ञान ले और समन जारी करे, या फिर मूल शिकायत पर CrPC की धारा 190(1)(a) (अब BNSS की धारा 210(1)(a)) के तहत संज्ञान ले और CrPC की धारा 200 (अब BNSS की धारा 223) के तहत शिकायतकर्ता और गवाहों के बयान शपथ पर दर्ज करे।

अदालत ने यह भी कहा कि परविंदर सिंह मामले में यह माना गया,

"BNSS के तहत संज्ञान लेना असल में न्यायिक विवेक का इस्तेमाल करना है और जब तक न्यायिक विवेक का इस्तेमाल नहीं किया जाता, तब तक यह नहीं माना जा सकता कि जांच शुरू हो गई।"

अदालत ने कहा कि CrPC के तहत भी यही स्थिति है। हालांकि, BNSS के तहत न्यायिक विवेक का इस्तेमाल करने से पहले आरोपी की बात सुनना भी ज़रूरी है।

मामले के तथ्यों पर आते हुए अदालत ने कहा कि यह इस बात पर निर्भर करेगा कि अदालत ने पुलिस द्वारा दायर रिपोर्ट या विरोध शिकायत (Protest Complaint) पर किस तरह से कार्रवाई की। अदालत ने विरोध याचिका पर दिए गए पिछले आदेश की समीक्षा की, जिसमें अदालत ने खुद जांच करना सही समझा था और शिकायतकर्ता को CrPC की धारा 200 के तहत सबूत पेश करने का निर्देश दिया।

अदालत ने कहा,

"इसलिए अदालत ने उस चरण पर संज्ञान नहीं लिया और शिकायतकर्ता के सबूत की ज़रूरत थी, जो 06.03.2024 को दर्ज किए गए।"

कोर्ट ने यह भी नोट किया कि शिकायतकर्ता का बयान PW1 के तौर पर उसके पति का PW2 के तौर पर और एक डॉक्टर का PW3 के तौर पर दर्ज किया गया। इसके बाद कोर्ट ने देखा कि कोई आदेश जारी नहीं किया गया और मामला लगभग दो साल तक पेंडिंग रहा।

दोनों आदेशों की तुलना करने के बाद बेंच ने यह निष्कर्ष निकाला कि 03.06.2026 को जारी दूसरा आदेश ही वह आदेश था, जिसमें न्यायिक दिमाग का इस्तेमाल किया गया, क्योंकि प्रथम दृष्टया मामला पाया गया और संज्ञान लिया गया माना गया; यही कारण है कि कोर्ट को आरोपी को समन जारी करना था और संज्ञान लेने से पहले उसकी बात सुननी थी।

कोर्ट ने 03.06.2026 के आदेश को "उस हद तक रद्द कर दिया, जहां प्रथम दृष्टया मामला पाया गया और संज्ञान लिया गया"। इसे केवल "सिर्फ समन जारी करने" तक सीमित कर दिया।

आरोपी को एक महीने के भीतर ट्रायल कोर्ट के सामने पेश होने का निर्देश दिया गया।

कोर्ट ने कहा,

"ऊपर बताई गई परिस्थितियों में हम Annexure P26 के आदेश को उस हद तक रद्द करते हैं, जहां 'प्रथम दृष्टया मामला पाया गया और संज्ञान लिया गया' और इसे केवल 'सिर्फ समन जारी करने' तक सीमित करते हैं। अपीलकर्ता आरोपी को एक महीने के भीतर कोर्ट के सामने पेश होना होगा और उस दिन, या किसी अन्य दिन यदि शिकायतकर्ता या उसका वकील मौजूद नहीं है तो मामले की सुनवाई की जाएगी और उचित आदेश पारित किए जाएंगे।"

इस प्रकार, मामले के गुण-दोष पर कोई असर डाले बिना अपील स्वीकार कर ली गई।

Case: Umar and Anr v State of Uttar Pradesh & Anr

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