लोकायुक्त की एसपीई को RTI से बाहर नहीं रखा जा सकता, सुप्रीम कोर्ट ने MP सरकार की अधिसूचना रद्द की
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि मध्य प्रदेश लोकायुक्त संगठन की स्पेशल पुलिस एस्टैब्लिशमेंट (SPE) को सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम से छूट नहीं दी जा सकती। अदालत ने राज्य सरकार की वर्ष 2011 की उस अधिसूचना को रद्द कर दिया, जिसके तहत एसपीई को RTI कानून के दायरे से बाहर रखा गया था।
जस्टिस जे.के. महेश्वरी और जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर की खंडपीठ ने कहा कि एसपीई भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों की जांच करती है और इसे RTI अधिनियम की धारा 24(4) के तहत "खुफिया एवं सुरक्षा संगठन" नहीं माना जा सकता। इसलिए इसे अधिनियम से पूर्ण छूट देना कानून के अनुरूप नहीं है।
मामला कटनी के तत्कालीन टाउन इंस्पेक्टर कमता प्रसाद मिश्रा द्वारा दायर RTI आवेदन से जुड़ा है। मिश्रा वर्ष 2017 में एसपीई द्वारा दर्ज एक भ्रष्टाचार ट्रैप मामले में आरोपी बनाए गए थे। वर्ष 2020 में उनके खिलाफ अभियोजन स्वीकृति मिलने के बाद उन्होंने इस स्वीकृति से संबंधित निर्णय प्रक्रिया और पत्राचार की जानकारी मांगी थी।
हालांकि, संबंधित अधिकारियों और बाद में राज्य सूचना आयोग ने उनकी मांग खारिज कर दी थी। आयोग ने RTI अधिनियम की धारा 8(1)(h) का हवाला देते हुए कहा था कि जानकारी का खुलासा जांच या अभियोजन प्रक्रिया को प्रभावित कर सकता है।
इसके बाद मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने मिश्रा के पक्ष में फैसला सुनाया। अदालत ने कहा कि जांच पूरी हो चुकी है और आरोपपत्र भी दाखिल किया जा चुका है, इसलिए सूचना देने से कोई बाधा उत्पन्न नहीं होगी। हाईकोर्ट ने संबंधित अधिकारियों को मांगी गई जानकारी उपलब्ध कराने का निर्देश दिया था।
हाईकोर्ट के इस आदेश को एसपीई ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। सुनवाई के दौरान एसपीई ने 25 अगस्त 2011 की राज्य सरकार की अधिसूचना का हवाला दिया, जिसके माध्यम से एसपीई और राज्य आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो (SBIEO) को RTI अधिनियम से बाहर रखा गया था।
सुप्रीम कोर्ट ने अधिसूचना की वैधता की जांच करते हुए कहा कि धारा 24(4) के तहत केवल राज्य सरकार द्वारा स्थापित "खुफिया एवं सुरक्षा संगठनों" को ही छूट दी जा सकती है। अदालत ने पाया कि एसपीई का कार्यक्षेत्र केवल भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम और लोक सेवकों से संबंधित कुछ दंडनीय अपराधों की जांच तक सीमित है तथा यह कोई खुफिया या सुरक्षा संबंधी कार्य नहीं करती।
पीठ ने कहा, "एसपीई को RTI अधिनियम, 2005 की धारा 24(4) के उद्देश्य से खुफिया एवं सुरक्षा संगठन नहीं माना जा सकता।"
अदालत ने यह भी कहा कि 2011 की अधिसूचना RTI अधिनियम द्वारा निर्धारित सीमाओं से आगे जाकर छूट प्रदान करती है, इसलिए यह मूल कानून के अनुरूप नहीं है और अतिरेकपूर्ण (excessive) है।
सुप्रीम कोर्ट ने एसपीई की अपील खारिज करते हुए हाईकोर्ट के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें कमता प्रसाद मिश्रा को मांगी गई जानकारी उपलब्ध कराने का निर्देश दिया गया था। हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि उसने आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो (SBIEO) के संबंध में अधिसूचना की वैधता पर कोई निर्णय नहीं दिया है। इसलिए उस संस्था पर अधिसूचना फिलहाल प्रभावी बनी रहेगी।
इस फैसले को पारदर्शिता और जवाबदेही को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है, क्योंकि इससे भ्रष्टाचार की जांच करने वाली एजेंसियों पर भी सूचना के अधिकार कानून के तहत जवाबदेही सुनिश्चित होगी।