नए क्रिमिनल लॉ के तहत शुरुआती 15 दिनों के बाद भी पुलिस कस्टडी मिल सकती है: सुप्रीम कोर्ट ने BNSS की धारा 187(2) समझाई

Update: 2026-07-27 15:34 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (27 जुलाई) को कहा कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 के तहत पुलिस कस्टडी सिर्फ़ रिमांड के शुरुआती 15 दिनों तक सीमित नहीं है और इसे कानूनी समय-सीमा के भीतर अलग-अलग हिस्सों में भी मांगा जा सकता है। कोर्ट ने आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट की उस शर्त को रद्द किया, जिसमें आरोपी की पुलिस कस्टडी को रिमांड के शुरुआती 15 दिनों से आगे बढ़ाने पर रोक लगाई गई।

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने कहा,

"BNSS की धारा 187(2) और (3), पुराने क्रिमिनल प्रोसीजर कोड (CrPC), 1973 की धारा 167 के विपरीत उस समय-सीमा को बढ़ाती है जिसके दौरान जांच एजेंसी पुलिस कस्टडी (कुल मिलाकर 15 दिनों से ज़्यादा नहीं) मांग सकती है। यह कस्टडी हिरासत की कुल मंज़ूर समय-सीमा के शुरुआती 40 या 60 दिनों के दौरान अलग-अलग हिस्सों में मिल सकती है, न कि सिर्फ़ रिमांड के शुरुआती 15 दिनों तक सीमित रहती है।"

यह मामला गाडे साईं कृष्णा की कथित कस्टडी में मौत से जुड़ा है, जिन्हें पुलिस ने 6 मई, 2026 को पकड़ा और कथित तौर पर विजयवाड़ा के कृष्णा लंका पुलिस स्टेशन ले गई। अभियोजन पक्ष के अनुसार, पीड़ित को कभी मजिस्ट्रेट के सामने पेश नहीं किया गया और बाद में वह लापता हो गया। उसका शव अभी तक नहीं मिला है।

पीड़ित की माँ की शिकायत और स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (SIT) के गठन के बाद आरोपी पुलिस अधिकारी को 23 जून, 2026 को गिरफ़्तार किया गया और न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया। अभियोजन पक्ष ने आगे की जांच के लिए 12 दिनों की पुलिस कस्टडी की मांग की थी।

पुलिस कस्टडी मंज़ूर करते हुए मजिस्ट्रेट ने 15 कड़ी शर्तें लगाईं, जिनमें पूछताछ को सेंट्रल जेल तक सीमित रखना, लगातार वीडियोग्राफी करवाना, पूछताछ के दौरान वकील की मौजूदगी की इजाज़त देना और पुलिस कस्टडी की एक ऐसी अधिकतम समय-सीमा तय करना जिसे बढ़ाया न जा सके, शामिल था। आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट ने मामूली बदलावों के साथ इनमें से ज़्यादातर सुरक्षा उपायों को बरकरार रखा। पुलिस कस्टडी की इजाज़त सिर्फ़ आठ दिनों के लिए दी गई।

राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में इन शर्तों को चुनौती दी और कहा कि इनसे जांच में गंभीर बाधा आ रही है।

जस्टिस संदीप मेहता के लिखे फ़ैसले में अपील करने वाले राज्य की इस आशंका को सही माना गया कि लगाई गई शर्तों से आरोपी से कस्टडी में पूछताछ करने में रुकावट आएगी।

कोर्ट ने कहा,

"हमें लगता है कि जांच एजेंसी ने कस्टडी में प्रभावी पूछताछ में आने वाली रुकावटों और उससे पूरी प्रक्रिया के बेकार हो जाने को लेकर जो आशंका जताई है, वह वास्तविक और सही है।"

कस्टडी में पूछताछ की अवधि को सीमित करने वाली शर्त पर कोर्ट ने कहा कि यह BNSS की धारा 187(2) के प्रावधानों के खिलाफ है। कोर्ट ने देखा कि CrPC की पुरानी धारा 167 के विपरीत नया प्रावधान जांच एजेंसी को तय कानूनी समय-सीमा के भीतर टुकड़ों में 15 दिन की पुलिस कस्टडी की मांग करने की इजाज़त देता है। कोर्ट ने कहा कि इस कानूनी बदलाव का मकसद यह पक्का करना है कि अगर जांच के दौरान नए तथ्य, खोज या ऐसे खुलासे वाले बयान सामने आते हैं, जिनसे दोषी ठहराने वाले सबूत मिलते हैं तो जांच करने वाले अधिकारी प्रभावी ढंग से कस्टडी में पूछताछ कर सकें।

इस मामले के तथ्यों पर इस सिद्धांत को लागू करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने देखा कि कथित अपराध उस जगह से लगभग 160 किलोमीटर दूर हुआ था जहां आरोपी कस्टडी में था। कोर्ट ने गौर किया कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 की धारा 23 के तहत आरोपी के खुलासे वाले बयानों के आधार पर जांच में नई जानकारियां, खोज और बरामदगी हो सकती है, जिससे जांच को प्रभावी ढंग से आगे बढ़ाने के लिए कस्टडी में और पूछताछ ज़रूरी हो जाती है।

कोर्ट ने कहा,

“…कानून में बदलाव का मकसद ठीक ऐसी ही स्थितियों से निपटना था, जैसी अभी है—यानी जब जांच के दौरान नए तथ्य, जानकारियां या सुराग सामने आएं और उनसे कस्टडी में और पूछताछ की ज़रूरत पड़े। ऐसे में मजिस्ट्रेट या अपनी निगरानी की शक्ति का इस्तेमाल करते हुए कोर्ट द्वारा उस कानूनी गुंजाइश को बहुत सख्ती से या समय से पहले खत्म कर देना, इस प्रावधान के मकसद के खिलाफ होगा।”

कोर्ट ने कहा,

“इसलिए हम शर्त 28.15 को बरकरार नहीं रख सकते, जो कस्टडी की एक पक्की और न बढ़ाई जा सकने वाली अधिकतम सीमा तय करती है। ऐसी सीमा BNSS की धारा 187(2) के तहत कार्रवाई करने का रास्ता बंद कर देती है, भले ही जांच में आगे कुछ भी पता चले।”

कोर्ट ने पूछताछ के दौरान वकील की मौजूदगी अनिवार्य करने वाली दूसरी शर्त को भी रद्द किया, क्योंकि यह BNSS की धारा 38 के खिलाफ थी। पूछताछ सिर्फ़ सेंट्रल जेल में ही करने की शर्त को अव्यावहारिक मानते हुए उसमें बदलाव किया गया और SIT को अपनी पसंद की किसी भी तय पुलिस सुविधा में उससे पूछताछ करने की छूट दी गई। हालांकि, कोर्ट ने पूछताछ की वीडियोग्राफी की शर्त को बरकरार रखा, लेकिन यह स्पष्ट किया कि आरोपी को लाने-ले जाने (ट्रांजिट) के दौरान भी लगातार वीडियोग्राफी करने की ज़रूरत नहीं है। SIT को यह भी निर्देश दिया गया कि वह कस्टडी के दौरान आरोपी की सुरक्षा और शारीरिक सेहत का ध्यान रखे।

Cause Title: THE STATE OF ANDHRA PRADESH VERSUS SUDA SURESH VEERA VENKATA NAGA RAJU

Tags:    

Similar News