Art. 311(2) | पक्की नौकरी वाले सरकारी कर्मचारी को बिना जांच के गैर-कानूनी नियुक्ति के आरोप पर नौकरी से नहीं निकाला जा सकता: सुप्रीम कोर्ट

Update: 2026-07-27 11:30 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि जिस सरकारी कर्मचारी की नौकरी पक्की (कन्फर्म) हो चुकी है, उसे सिर्फ़ इसलिए नौकरी से नहीं निकाला जा सकता कि उसकी नियुक्ति में कथित तौर पर कोई गड़बड़ी थी। कोर्ट ने कहा कि विभागीय जांच किए बिना नौकरी से निकालना संविधान के अनुच्छेद 311(2) का उल्लंघन होगा।

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने कहा,

"नौकरी पक्की होना कोई मामूली प्रशासनिक औपचारिकता नहीं है, बल्कि यह कर्मचारी को एक ठोस दर्जा देता है, जिससे उसे नौकरी की बेहतर सुरक्षा और सिविल सेवक को मिलने वाले संवैधानिक सुरक्षा उपाय मिलते हैं। एक बार जब अपील करने वाले कर्मचारी पक्के कर्मचारी का दर्जा पा लेते हैं तो उनकी नियुक्ति की वैधता से जुड़े आरोपों के आधार पर सिर्फ़ प्रशासनिक आदेश से उनकी सेवा समाप्त नहीं की जा सकती थी। क्या नियुक्ति में कोई गड़बड़ी थी, क्या इसमें अपील करने वालों की कोई भूमिका थी और क्या ऐसी गड़बड़ी के लिए नौकरी से निकालना सही था - ये सभी मामले अनुच्छेद 311(2) में बताई गई प्रक्रिया के अनुसार तय किए जाने चाहिए।"

बेंच ने यह टिप्पणी जगतसिंहपुर, ओडिशा में डिस्ट्रिक्ट एंड सेशंस जज के कार्यालय में कॉपीइस्ट की सेवा बहाल करते हुए की, जिसे संविधान के अनुच्छेद 311(2) का उल्लंघन करके नौकरी से निकाल दिया गया।

सरकारी कर्मचारी को नौकरी से निकालने के बारे में संविधान का अनुच्छेद 311(2) क्या कहता है?

अनुच्छेद 311 का क्लॉज़ (2) स्पष्ट रूप से कहता है कि किसी भी व्यक्ति को तब तक बर्खास्त, हटाया या उसका पद कम (रैंक में कमी) नहीं किया जाएगा, जब तक कि जांच न हो जाए, जिसमें उसे उसके खिलाफ आरोपों के बारे में बताया गया हो और अपनी बात रखने का उचित मौका दिया गया हो। हालांकि, संविधान इस आवश्यकता के कुछ सीमित अपवाद भी मानता है।

अनुच्छेद 311(2) का दूसरा प्रावधान (प्रोविज़ो) तीन ऐसी स्थितियों की बात करता है जिनमें जांच न करने का फैसला लिया जा सकता है:

"पहला, जहां बर्खास्तगी, हटाने या पद कम करने का आधार ऐसा आचरण हो जिसके कारण आपराधिक दोषसिद्धि (कनविक्शन) हुई हो।

दूसरा, जहां सक्षम अधिकारी लिखित रूप में यह दर्ज करे कि ऐसी जांच करना उचित रूप से व्यावहारिक नहीं है।

तीसरा, जहां राष्ट्रपति या राज्यपाल, जैसा भी मामला हो, इस बात से संतुष्ट हों कि राज्य की सुरक्षा के हित में जांच करना उचित नहीं है।"

मामले की पृष्ठभूमि

अपील करने वालों को जगतसिंहपुर के डिस्ट्रिक्ट एंड सेशंस जज के ऑफिस में जूनियर क्लर्क-कम-कॉपीराइस्ट के पद पर नियुक्त किया गया। बाद में उनकी सर्विस पक्की कर दी गई।

जब वे अपनी सर्विस कर रहे थे तो उन्हें एक 'शो-कॉज़ नोटिस' (कारण बताओ नोटिस) जारी किया गया, जिसमें उनसे यह बताने को कहा गया कि उनकी सर्विस क्यों न खत्म कर दी जाए। नोटिस में आरोप लगाया गया कि उनकी नियुक्तियां गैर-कानूनी और अनियमित थीं, क्योंकि उन्हें भर्ती नोटिफिकेशन के तहत विज्ञापित वैकेंसी से ज़्यादा पदों पर नियुक्त किया गया।

इसके बाद अपील करने वालों की सर्विस इस आधार पर खत्म की गई कि उन्हें ऐसे पदों पर नियुक्त किया गया, जो असल में थे ही नहीं, इसलिए उनकी नियुक्तियां न केवल अनियमित थीं, बल्कि शुरू से ही अमान्य (void ab initio) थीं।

सर्विस खत्म किए जाने के खिलाफ अपील करने वालों ने हाईकोर्ट की 'सबऑर्डिनेट कोर्ट्स के लिए अपील कमिटी' के सामने अपील की, जिसमें हाई कोर्ट के तीन मौजूदा जज शामिल थे। हालांकि, अपील खारिज होने के बाद उन्होंने संविधान के आर्टिकल 226 के तहत हाई कोर्ट के 'रिट जूरिस्डिक्शन' (रिट अधिकार क्षेत्र) का इस्तेमाल किया।

अपनी रिट याचिका खारिज होने से नाराज़ होकर अपीलकर्ता सुप्रीम कोर्ट चले गए।

Cause Title: DEBASHISH MOHAPATRA & ORS. VS. DISTRICT AND SESSION JUDGE, JAGATSINGHPUR & ORS.

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