S.27 Evidence Act | अलग-अलग आरोपियों के संयुक्त बयान तभी स्वीकार्य, जब उनसे अलग-अलग नई बातें सामने आती हों: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया कि अलग-अलग आरोपियों द्वारा दिए गए संयुक्त या एक साथ दिए गए खुलासे के बयान साक्ष्य अधिनियम की धारा 27 के तहत तभी स्वीकार्य हैं, जब ऐसे बयानों से अपराध से जुड़े अलग और प्रासंगिक तथ्यों का पता चलता हो।
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की खंडपीठ ने यह फैसला कर्नाटक से जुड़े हत्या के मामले में अपनी दोषसिद्धि को चुनौती देने वाले दो दोषियों द्वारा दायर आपराधिक अपीलों पर सुनवाई करते हुए दिया। कोर्ट ने अंततः अपीलकर्ताओं को बरी किया, लेकिन भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 27 के तहत संयुक्त खुलासे के बयानों के साक्ष्य मूल्य पर कानूनी स्थिति स्पष्ट की।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला मार्च 2013 में कर्नाटक में महिला के लापता होने और उसकी हत्या से जुड़ा है। पीड़िता 23 मार्च को लापता हो गई और चार दिन बाद एक वन क्षेत्र में उसके जले हुए कंकाल के अवशेष मिले।
अभियोजन पक्ष के अनुसार, उसके भाई ने उससे बड़ी रकम और सोना उधार लिया था। उसे चुकाने से बचने के लिए उसने तीन अन्य आरोपियों के साथ मिलकर साजिश रची। आरोप था कि आरोपियों ने उसका अपहरण किया, उसकी हत्या की और बाद में सबूत मिटाने के लिए शव को जला दिया।
ट्रायल कोर्ट ने चारों आरोपियों को दोषी ठहराया। हाईकोर्ट ने भी दोषसिद्धि बरकरार रखी। हालांकि, केवल दो अपीलकर्ताओं ने ही सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
मुद्दा यह था कि क्या कई आरोपियों द्वारा एक ही स्थान या वस्तु की ओर इशारा करने को—जिसका पता पहले ही किसी एक आरोपी के माध्यम से चल चुका हो—धारा 27 के तहत एक वैध 'खोज' (Discovery) माना जा सकता है।
अभियोजन पक्ष के अनुसार, चारों आरोपियों ने उस स्थान के बारे में एक संयुक्त बयान दिया, जहां महिला की हत्या की गई थी और जहां शव को जलाया गया था। पुलिस उन सभी को एक वाहन में ले गई। उनमें से एक वाहन से नीचे उतरा और वह स्थान दिखाया जहां पीड़िता की हत्या की गई थी। बाद में अन्य तीन को भी एक-एक करके वहां लाया गया; उन्होंने भी वही स्थान दिखाया और कहा कि शव को वहीं जलाया गया।
कोर्ट ने यह भी गौर किया कि 'पंच गवाह' (स्वतंत्र गवाह) ने अपीलकर्ताओं द्वारा दिए गए विशिष्ट बयान के बारे में कोई गवाही नहीं दी।
संयुक्त बयान अपने आप में अस्वीकार्य नहीं होते; लेकिन इसमें स्पष्टता और विशिष्टता होनी चाहिए
कोर्ट ने State NCT Of Delhi v. Navjot Sandhu (2005) 11 SCC 600 मामले का हवाला देते हुए यह नोट किया कि संयुक्त खुलासे या एक साथ किए गए खुलासे अपने आप में धारा 27 के तहत अस्वीकार्य नहीं हैं। उक्त मिसाल ने ऐसी संयुक्त बयानों में यह पता लगाने में आने वाली व्यावहारिक कठिनाइयों को भी स्वीकार किया कि वास्तव में किसने क्या कहा था। Nagamma @ Nagarathna & Ors. Versus The State of Karnataka मामले में 2025 के फैसले का भी हवाला दिया गया, जिसमें कहा गया कि संयुक्त खुलासों का मूल्यांकन करते समय अधिक सावधानी बरती जानी चाहिए।
कोर्ट ने यह टिप्पणी की कि हाईकोर्ट ने संयुक्त बयान को स्वीकार करने में गलती की। पहली बात तो यह कि पंच गवाह ने प्रत्येक आरोपी द्वारा दिए गए सटीक बयानों को स्पष्ट रूप से नहीं बताया। ऐसा कुछ भी नहीं था, जिससे दूर-दूर तक यह संकेत मिले कि अपीलकर्ताओं के कहने पर किसी ऐसे तथ्य की खोज हुई हो, जो साक्ष्य अधिनियम की धारा 27 के तहत स्वीकार्य हो।
जानकारी विशिष्ट तथ्यों से संबंधित होनी चाहिए
कोर्ट ने कहा कि जानकारी सीधे और स्पष्ट रूप से खोजे गए तथ्यों से संबंधित होनी चाहिए।
संक्षेप में कहें तो कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि किसी तथ्य की "खोज" केवल एक बार ही हो सकती है और कई आरोपियों के खिलाफ बार-बार उस पर भरोसा नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने कहा,
"इसलिए जहां किसी तथ्य की खोज पहले ही हो चुकी हो, वहां उसके संबंध में बाद में दी गई किसी भी जानकारी को उस तथ्य की खोज की ओर ले जाने वाला नहीं कहा जा सकता। किसी तथ्य की दोबारा खोज नहीं हो सकती। जहां खोजे गए कहे जाने वाले तथ्य के संबंध में जानकारी पहले से ही पुलिस के पास मौजूद हो, वहां दोबारा दी गई जानकारी वास्तव में किसी नई खोज की ओर नहीं ले जाती। इसलिए आरोपी द्वारा दी गई जानकारी के परिणामस्वरूप उस तथ्य की दोबारा खोज को साक्ष्य अधिनियम की धारा 27 के तहत सही तौर पर अस्वीकार्य माना गया।"
कोर्ट इस बात से सहमत था कि ऐसी स्थितियां हो सकती हैं, जहां कई आरोपी पुलिस को एक के बाद एक बहुत कम अंतराल पर एक ही जानकारी दें। हालांकि, ऐसे मामले में भी "जब तक कि ऐसे बयानों की सच्चाई और स्वैच्छिक प्रकृति की गारंटी किसी अलग तथ्य की खोज से प्राप्त न हो जाए, तब तक धारा 27 के प्रावधान, किसी भी तरह से, अभियोजन पक्ष की मदद नहीं करेंगे।"
आगे कहा गया,
"उदाहरण के लिए, मान लीजिए कि दो या तीन आरोपी व्यक्ति एक के बाद एक जल्दी-जल्दी बयान देते हैं, जिसमें वे किसी जानकारी या मिलती-जुलती जानकारी के बारे में बताते हैं। फिर अलग-अलग जगहों से अलग-अलग तथ्यों की खोज करते हैं। ऐसे मामले में भले ही उनके द्वारा दिए गए बयानों को 'संयुक्त' माना जाए, फिर भी खोज संयुक्त नहीं होती, क्योंकि यह अलग-अलग जगहों से अलग-अलग तथ्यों की खोज होती है। ऐसी खोजें धारा 27 के तहत परिकल्पित सुरक्षा की गारंटी देती हैं। इसलिए अभियोजन पक्ष के लिए काफी उपयोगी हो सकती हैं।"
अदालत ने कहा कि लछमन सिंह बनाम राज्य (1952) 1 SCC 362 और राज्य बनाम छोटेलाल मोहनलाल AIR 1955 Nag 71 जैसे पूर्व-निर्णयों में, संयुक्त बयानों को "केवल इसलिए स्वीकार किया गया, क्योंकि यह कहा जा सकता था कि प्रत्येक आरोपी द्वारा दिया गया बयान, उन तथ्यों से संबंधित था जिनकी खोज उसके द्वारा 'स्पष्ट रूप से' की गई।"
मौजूदा मामले के संबंध में कोर्ट ने कहा:
“सबूत पूरी तरह से एक ही मानसिक तथ्य की संयुक्त खोज से जुड़े हैं, जिसके बारे में कहा गया कि यह चारों आरोपियों द्वारा एक ही समय पर की गई। इसका नतीजा यह है कि यह कहना मुमकिन नहीं है कि किसी खास आरोपी का कौन सा बयान किसी खास मानसिक तथ्य की खोज से अलग तौर पर जुड़ा है। इस तरह मौजूदा मामले में धारा 27 के तहत सोचे गए सुरक्षा उपाय साफ तौर पर दिखाई नहीं देते हैं। इन सुरक्षा उपायों की गैर-मौजूदगी में, दो खास जगहों—यानी, वह जगह जहां मृतक की हत्या की गई और वह जगह जहां उसके शव को जलाया गया—से जुड़े खोज के सबूतों का इस्तेमाल अपीलकर्ताओं के खिलाफ नहीं किया जा सकता।”
कोर्ट ने गौर किया कि कई आरोपियों के खुलासे वाले बयानों के आधार पर की गई खोजों का इस्तेमाल किसी दूसरे आरोपी के खिलाफ तब नहीं किया जा सकता, जब ऐसे खुलासे वाले बयान अलग-अलग जगहों से अलग-अलग तथ्यों को सामने लाने में नाकाम रहते हैं।
कोर्ट ने यह भी पाया कि अभियोजन पक्ष जिस मुख्य हालात पर निर्भर था, वह यह था कि आरोपियों को मृतक के गायब होने से कुछ ही समय पहले उसके साथ देखा गया। हालांकि, कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि सिर्फ़ यह हालात ही किसी को दोषी ठहराने के लिए काफ़ी नहीं हो सकता।
कोर्ट ने फ़ैसला दिया कि सिर्फ़ 'आखिरी बार साथ देखे जाने' (last seen) के सबूतों के आधार पर बिना किसी अतिरिक्त ऐसे सबूत के जो अपीलकर्ताओं को अपराध से जोड़ता हो, किसी को दोषी मानना “बहुत ज़्यादा जोखिम भरा” होगा।
सबूतों की कड़ी में कमियों और 'आखिरी बार साथ देखे जाने' वाले हालात के अलावा किसी और पुष्टि (Corroboration) की गैर-मौजूदगी को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अपीलें मंज़ूर कीं और अपीलकर्ताओं को दोषी ठहराने का फ़ैसला रद्द किया।
Cause Title: ANAND JAKKAPPA PUJARI @GADDADAR VERSUS THE STATE OF KARNATAKA (with connected case)