S. 307 IPC | चोट की गंभीरता ही हत्या के प्रयास के लिए दोषी ठहराने के लिए काफी नहीं, जब तक कि जान लेने के इरादे का सबूत न हो: सुप्रीम कोर्ट

Update: 2026-05-25 10:40 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब तक जान लेने का आपराधिक इरादा (mens rea) साबित नहीं हो जाता, तब तक हत्या के प्रयास के लिए किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता, भले ही घायल व्यक्ति को कितनी भी गंभीर चोट क्यों न लगी हो।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा,

"...चोट की गंभीरता अपने आप में IPC की धारा 307 के तहत अपराध को तय करने का आधार नहीं हो सकती, जब तक कि अभियोजन पक्ष उस धारा के तहत ज़रूरी आपराधिक इरादा (mens rea) को साबित न कर दे।"

जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमीकापम कोटिश्वर सिंह की बेंच ने यह टिप्पणी करते हुए पंजाब एंड हरियाणा हाई कोर्ट का फैसला रद्द किया, जिसमें ट्रायल कोर्ट ने अपीलकर्ता को IPC की धारा 307 के तहत हत्या के प्रयास का दोषी ठहराया था। सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि निचली अदालतों ने इस बात पर ज़रूरत से ज़्यादा ज़ोर दिया था कि चोट जानलेवा थी, जबकि इस अहम बात को पूरी तरह नज़रअंदाज़ कर दिया था कि अपीलकर्ता के पास हत्या करने का ज़रूरी इरादा या जानकारी नहीं थी।

कोर्ट ने कहा कि IPC की धारा 307 के अनुसार, हत्या के प्रयास का अपराध साबित करने के लिए दो ज़रूरी बातें साबित होनी चाहिए: (i) हत्या करने का इरादा या जानकारी, और (ii) हत्या करने की कोशिश का असल काम।

आगे कहा गया,

"सिर्फ़ इसलिए यह नहीं मान लिया जा सकता कि हत्या करने का इरादा था, क्योंकि चोटें आखिरकार जानलेवा पाई गईं। अगर पहले से कोई मकसद, सोची-समझी योजना, जानलेवा हथियारों से बार-बार जानबूझकर किए गए वार, या जान लेने की पक्की कोशिश दिखाने वाला कोई भी काम साबित न हो तो यह कोर्ट यह नहीं मान सकता कि अपीलकर्ताओं के पास IPC की धारा 307 के तहत दोषी ठहराने के लिए ज़रूरी इरादा या जानकारी थी..."

कोर्ट ने आगे कहा,

"हत्या के प्रयास के अपराध का सबसे ज़रूरी हिस्सा जान लेने का इरादा है। ऐसा इरादा असल कोशिश से पहले मौजूद होता है और इसे उस काम या आपराधिक कृत्य (actus reus) से अलग से साबित किया जाना चाहिए। एक बार जब हत्या करने का ज़रूरी इरादा साबित हो जाता है तो कोशिश का नतीजा क्या निकला, यह बात बेमानी हो जाती है, सिवाय तब जब कोशिश में जान चली जाए; ऐसे में अपराध IPC की धारा 300 के तहत आएगा। अगर इरादे का सबूत न हो तो इस धारा के तहत किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।"

कोर्ट ने यह पाया कि घायल व्यक्ति को जो चोट लगी थी, जो अपीलकर्ता और किसी तीसरे पक्ष के बीच हो रही कहा-सुनी में दखल देकर उसे रोकने की कोशिश कर रहा था—सिर्फ़ उस चोट के आधार पर अपीलकर्ता को 'हत्या के प्रयास' के अपराध के लिए ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। इसकी वजह यह है कि अपीलकर्ता के पास न तो कोई पहले से तय मकसद था और न ही किसी की जान लेने का ज़रूरी इरादा।

कोर्ट ने आगे टिप्पणी की,

“अपीलकर्ताओं और घायल व्यक्ति के बीच पहले से किसी तरह की दुश्मनी का कोई इतिहास नहीं मिलता। अभियोजन पक्ष भी ऐसा कोई सबूत पेश करने में नाकाम रहा है, जिससे यह लगे कि अपीलकर्ताओं ने अमर सिंह (PW3) की जान लेने के लिए पहले से कोई योजना बनाई थी, कोई तैयारी की थी, या उनका कोई साझा इरादा था। इसके विपरीत, सबूतों से यह पता चलता है कि यह घटना अचानक तब हुई, जब घायल व्यक्ति ने जीप के ड्राइवर से जुड़ी एक कहा-सुनी में दखल दिया। इसलिए ऐसा लगता है कि यह हमला उस समय के अचानक आए आवेश में और उस दखल पर एक स्वाभाविक प्रतिक्रिया के तौर पर किया गया था, न कि शिकायतकर्ता को खत्म करने के किसी पहले से सोचे-समझे इरादे के तहत।”

संक्षेप में मामला

जस्टिस कोटिश्वर सिंह द्वारा लिखे गए इस फ़ैसले में यह कहा गया कि चूंकि अपीलकर्ता के पास चोट पहुँचाने का ज़रूरी 'मेंस रिया' (अपराधिक मनःस्थिति) या कोई पूर्व-नियोजित इरादा नहीं था, इसलिए 'हत्या के प्रयास' के अपराध के लिए उसे दोषी ठहराना सही नहीं माना जा सकता।

उपरोक्त कारणों से अपील स्वीकार की गई और दोषसिद्धि (Conviction) रद्द की गई और अपीलकर्ता को बरी कर दिया गया।

Cause Title: ROSHAN LAL VERSUS THE STATE OF HARYANA & ANR

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