केवल धोखाधड़ी का आरोप काफी नहीं, GPA को लोन सुरक्षा बताने का सबूत देना होगा: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति यह दावा करता है कि जनरल पावर ऑफ अटॉर्नी (GPA) के जरिए किए गए संपत्ति लेनदेन वास्तव में बिक्री नहीं बल्कि केवल लोन की सुरक्षा के लिए थे, तो इसे साबित करने की जिम्मेदारी उसी पर होगी। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल धोखाधड़ी या विश्वास के दुरुपयोग के आरोप पर्याप्त नहीं माने जा सकते।
जस्टिस उज्जल भुइयां और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की खंडपीठ ने तमिलनाडु के एक संपत्ति विवाद में अपील खारिज करते हुए यह टिप्पणी की। अदालत ने मद्रास हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा, जिसमें ट्रायल कोर्ट के उस आदेश को पलट दिया गया था, जो वादी के पक्ष में गया था।
मामला कोयंबटूर स्थित दो एकड़ से अधिक कृषि भूमि से जुड़ा था, जिसे अपीलकर्ता ने 1996 में खरीदा था। महिला का दावा था कि उसने 1997 और 1998 में दो भाइयों से 2 लाख और 5 लाख रुपये उधार लिए और ऋण की सुरक्षा के तौर पर उनके पक्ष में पंजीकृत GPA बनाए। उसने कहा कि बाद में GPA का दुरुपयोग कर उसकी जमीन रिश्तेदारों के नाम बेच दी गई।
वहीं प्रतिवादियों ने कहा कि यह वास्तविक बिक्री थी, पूरी रकम अदा की गई और जमीन का कब्जा भी सौंप दिया गया।
ट्रायल कोर्ट ने महिला के पक्ष में फैसला देते हुए बिक्री विलेखों को अमान्य घोषित किया था। हालांकि प्रथम अपीलीय अदालत ने यह फैसला पलटते हुए कहा कि महिला यह साबित नहीं कर सकी कि ऋण चुकाया गया या GPA केवल सुरक्षा के लिए बनाए गए। बाद में मद्रास हाईकोर्ट ने भी हस्तक्षेप से इनकार कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट में महिला की ओर से दलील दी गई कि GPA धारक विश्वास की स्थिति में थे, इसलिए लेनदेन की वैधता साबित करने का भार प्रतिवादियों पर होना चाहिए।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट अदालत ने कहा,
“जब तक धोखाधड़ी या विश्वास के दुरुपयोग से जुड़े प्रारंभिक तथ्य साबित नहीं किए जाते, तब तक सबूत का भार प्रतिवादियों पर नहीं डाला जा सकता।”
अदालत ने पाया कि महिला कथित ऋण, ब्याज भुगतान या मूल रकम चुकाने से जुड़े कोई दस्तावेज पेश नहीं कर सकी। यहां तक कि ट्रायल कोर्ट ने भी माना था कि ऋण वापसी साबित नहीं हुई।
खंडपीठ ने इस बात को भी महत्वपूर्ण माना कि महिला ने खुद गवाही नहीं दी, जबकि उसने धोखाधड़ी, जालसाजी और खाली कागजों पर हस्ताक्षर के दुरुपयोग जैसे गंभीर आरोप लगाए। अदालत ने निचली अदालतों द्वारा लगाए गए प्रतिकूल अनुमान को सही ठहराया।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि महिला ने लगभग 10 वर्ष बाद अदालत का दरवाजा खटखटाया, जबकि बिक्री विलेख 1998 में ही निष्पादित हो चुके थे और राजस्व रिकॉर्ड में भी खरीदारों के नाम दर्ज थे।
अदालत ने कहा,
“ऐसा व्यवहार उस व्यक्ति के सामान्य आचरण के अनुरूप नहीं है, जो अपनी संपत्ति के धोखाधड़ीपूर्ण हस्तांतरण का आरोप लगा रहा हो।”
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल राजस्व रिकॉर्ड से स्वामित्व तय नहीं होता, लेकिन लंबे समय तक बिना चुनौती के बने रिकॉर्ड और पंजीकृत दस्तावेज कब्जे और पक्षकारों के आचरण का महत्वपूर्ण संकेत होते हैं।
इन्हीं टिप्पणियों के साथ सुप्रीम कोर्ट ने अपील खारिज की।