पंचनामा रिपोर्ट में नाम न होना आरोपी की बेगुनाही का प्रमाण नहीं: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि केवल पंचनामा रिपोर्ट में आरोपी का नाम दर्ज न होने के आधार पर उसे जमानत नहीं दी जा सकती, यदि जांच में अन्य ऐसे साक्ष्य मौजूद हों, जो प्रथम दृष्टया उसके अपराध में शामिल होने की ओर संकेत करते हों।
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमेकापम कोटिश्वर सिंह की खंडपीठ ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द किया, जिसमें हत्या के आरोपी को इस आधार पर जमानत दी गई थी कि पंचनामा कार्यवाही के दौरान उसका नाम सामने नहीं आया।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि गंभीर अपराधों में अदालतों को जमानत देते समय न्यायिक विवेक का बेहद सावधानी से इस्तेमाल करना चाहिए। अदालत ने स्पष्ट किया कि पंचनामा रिपोर्ट में नाम न होना तब महत्वहीन हो जाता है, जब जांच में अन्य पुष्टिकारक सामग्री उपलब्ध हो।
खंडपीठ ने कहा कि आरोपपत्र, पोस्टमार्टम रिपोर्ट, आरोपी की निशानदेही पर कथित हथियार की बरामदगी और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 180 के तहत दर्ज गवाहों के बयान ऐसे महत्वपूर्ण तथ्य थे, जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता था।
अदालत ने कहा,
“ऐसी पुष्टिकारक सामग्री, जो प्रथम दृष्टया आरोपी की संलिप्तता दिखाती हो, उसे केवल पंचनामा कार्यवाही में नाम न आने के आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता।”
मामला हत्या के एक मुकदमे से जुड़ा था, जिसमें FIR दर्ज होने के बाद पंचनामा कार्यवाही की गई। हालांकि पंचनामा रिपोर्ट में आरोपी का नाम नहीं था, लेकिन पोस्टमार्टम रिपोर्ट, अपराध की गंभीरता और आरोपी की निशानदेही पर हथियार बरामद होने जैसे तथ्यों के आधार पर सेशन कोर्ट ने जमानत देने से इनकार कर दिया था।
इसके बाद आरोपी ने हाईकोर्ट का रुख किया, जहां अदालत ने यह कहते हुए जमानत दी कि पंचनामा के दौरान आरोपी का नाम न आना अभियोजन के मामले पर संदेह पैदा करता है।
इस आदेश को चुनौती देते हुए शिकायतकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका दायर की थी।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पंचनामा कार्यवाही का उद्देश्य केवल मौत के कारणों की प्रारंभिक जानकारी जुटाना होता है। यह विस्तृत जांच या अपराधी की पहचान तय करने की प्रक्रिया नहीं है।
अदालत ने कहा,
“पंचनामा रिपोर्ट में अपराध करने वाले व्यक्ति का नाम न होना अपने आप में आरोपी की संलिप्तता पर संदेह करने का आधार नहीं बन सकता।”
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि हाईकोर्ट ने केवल पंचनामा रिपोर्ट में नाम न होने के आधार पर अभियोजन के खिलाफ प्रतिकूल अनुमान लगाकर गलती की।
इन्हीं टिप्पणियों के साथ सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का आदेश रद्द करते हुए आरोपी को आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया।