S. 138 NI Act | चेक बाउंस होने पर ड्रॉअर के पते पर भेजा गया नोटिस, परिवार के सदस्य को मिलने पर भी वैध माना जाएगा: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (30 सितंबर) को कहा कि नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट, 1881 (NI Act) के तहत कानूनी डिमांड नोटिस को सिर्फ़ इसलिए अमान्य नहीं माना जा सकता कि वह ड्रॉअर के परिवार के किसी सदस्य को मिला था, जबकि नोटिस ड्रॉअर के सही पते पर रजिस्टर्ड पोस्ट से भेजा गया।
जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस मनमोहन की बेंच ने केरल हाईकोर्ट का वह फ़ैसला पलट दिया, जिसमें ड्रॉअर की सज़ा को सिर्फ़ इस आधार पर रद्द कर दिया गया कि कानूनी डिमांड नोटिस उसे व्यक्तिगत रूप से नहीं, बल्कि उसकी माँ को मिला था, जो ड्रॉअर द्वारा दिए गए पते पर रहती हैं।
कोर्ट ने कहा कि एक बार जब डिमांड नोटिस सही पते पर रजिस्टर्ड पोस्ट से भेज दिया जाता है तो नोटिस मिलने की एक ऐसी धारणा (Presumption) बनती है जिसे गलत साबित किया जा सकता है (Rebuttable Presumption)। इसके बाद यह साबित करने की ज़िम्मेदारी ड्रॉअर पर आ जाती है कि यह धारणा गलत है; उदाहरण के लिए, यह साबित करके कि पता गलत था, उसे नोटिस के बारे में कोई जानकारी नहीं थी, या पोस्टल एंडोर्समेंट गलत था।
कोर्ट ने कहा,
"...सही पते पर नोटिस भेजे जाने के बाद 'नोटिस देने' की ज़रूरत पूरी हो जाती है। इसके बाद ड्रॉअर की ज़िम्मेदारी है कि वह इस धारणा को गलत साबित करे, या तो यह बताकर कि उसे अपने पते पर नोटिस आने की कोई जानकारी नहीं थी, या यह बताकर कि नोटिस सही पते पर नहीं भेजा गया, या यह बताकर कि पोस्टल एंडोर्समेंट गलत है।"
यह मामला NI Act की धारा 138 के तहत एक शिकायत से जुड़ा है, जो अपीलकर्ता द्वारा प्रतिवादी नंबर 2 को दिए गए 3 लाख रुपये के लोन से संबंधित था। प्रतिवादी द्वारा जारी किया गया चेक बाउंस हो गया।
इसके बाद शिकायतकर्ता ने 31 अगस्त 2016 को प्रतिवादी के सही पते पर रजिस्टर्ड पोस्ट से कानूनी डिमांड नोटिस भेजा। यह नोटिस उसकी माँ अमीना को मिला।
कोई भुगतान नहीं किया गया और प्रतिवादी ने नोटिस का कोई जवाब नहीं दिया।
ट्रायल कोर्ट ने 10 जुलाई 2019 को उसे दोषी ठहराया और छह महीने की साधारण कैद और 3 लाख रुपये के जुर्माने की सज़ा सुनाई। अपीलीय अदालत ने 16 फरवरी, 2023 को दोषसिद्धि (Conviction) को बरकरार रखा।
हालांकि, केरल हाईकोर्ट ने CrPC की धारा 397 के तहत अपने रिविजनल अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करते हुए दोषसिद्धि रद्द की। कोर्ट ने माना कि धारा 138 के प्रोविज़ो (b) के तहत कानूनी ज़रूरत का पालन नहीं किया गया, क्योंकि नोटिस प्रतिवादी (Respondent) को खुद मिलने के बजाय उसकी माँ को मिला।
इससे असंतुष्ट होकर शिकायतकर्ता सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
अपील मंज़ूरी करते हुए जस्टिस मनमोहन के फ़ैसले में दोहराया गया कि एक बार कानूनी अनुमान (Statutory Presumption) लागू हो जाने के बाद शिकायतकर्ता के लिए यह साबित करना ज़रूरी नहीं है कि ड्रॉअर (चेक जारी करने वाले) को असल में नोटिस मिला था या उसने जान-बूझकर नोटिस लेने से इनकार किया।
कोर्ट के अनुसार, कानून के तहत शिकायतकर्ता को ड्रॉअर के सही पते पर नोटिस भेजना होता है और शिकायतकर्ता के नियंत्रण से बाहर की परिस्थितियों के कारण नोटिस मिलने के अनुमान (Presumption of Service) को गलत नहीं ठहराया जा सकता।
इसके अलावा, कोर्ट ने पाया कि एम.डी. थॉमस बनाम पी.एस. जलील (2009) मामले में हाईकोर्ट का अपने ही पुराने फ़ैसले पर भरोसा करना कानूनी रूप से गलत है, क्योंकि वह फ़ैसला सी.सी. अलावी हाजी बनाम पलापेट्टी मुहम्मद (2007) मामले में तीन जजों की बेंच के फ़ैसले को नज़रअंदाज़ करके दिया गया।
मौजूदा मामले की तरह ही एमडी थॉमस मामले में भी दो जजों की बेंच ने सज़ा रद्द की थी। उन्होंने पाया था कि कानूनी नोटिस ड्रॉअर (चेक जारी करने वाले) को खुद देने के बजाय उसकी पत्नी को दिया गया। हालांकि, एमडी थॉमस मामले में सीसी अलावी हाजी मामले में तय किए गए सिद्धांत पर विचार नहीं किया गया। उस सिद्धांत के अनुसार, जब रजिस्टर्ड पोस्ट से सही पते पर नोटिस भेजा जाता है तो धारा 138 के प्रोविज़ो (b) के तहत "नोटिस देने" की ज़रूरत पूरी हो जाती है, बशर्ते ड्रॉअर के पास उस धारणा को गलत साबित करने का अधिकार हो।
कोर्ट ने कहा,
"...एक बार जब नोटिस सही पते पर भेज दिया गया तो सीसी अलावी हाजी (ऊपर ज़िक्र किया गया) मामले के फ़ैसले के आधार पर यह धारणा बन गई कि नोटिस पहुंच गया। अब यह ड्रॉअर/आरोपी की ज़िम्मेदारी थी कि वह या तो यह साबित करे कि पता गलत था या उसे इस बात की जानकारी नहीं थी कि उसके पते पर कोई नोटिस आया है।"
कोर्ट ने एमडी थॉमस मामले के फ़ैसले को 'per incuriam' (कानून की अनदेखी करके दिया गया फ़ैसला) माना।
इन सिद्धांतों को लागू करते हुए कोर्ट ने पाया कि ऐसे ठोस सबूत मौजूद हैं, जिनसे पता चलता है कि कानूनी नोटिस प्रतिवादी (Respondent) के सही पते पर भेजा गया।
इसके बाद उसी पते पर भेजे गए समन के जवाब में प्रतिवादी कोर्ट में पेश हुआ। उसकी वकालतनामा, अपील और रिविज़न याचिकाओं में भी वही पता लिखा था। इसके अलावा, धारा 313 CrPC के तहत अपने बयान में प्रतिवादी ने कभी भी पते की सही होने पर कोई सवाल नहीं उठाया।
महत्वपूर्ण बात यह भी है कि ऐसा कोई मामला नहीं है, जिससे यह पता चले कि प्रतिवादी और उसकी माँ अलग-अलग रह रहे हैं, या उनके रिश्ते ऐसे हैं कि माँ को नोटिस मिलने पर भी प्रतिवादी को उसकी जानकारी न मिल पाती। इन सभी बातों को ध्यान में रखते हुए कोर्ट ने कहा कि रेस्पॉन्डेंट उस धारणा को गलत साबित करने में नाकाम रहा, जो कानूनी डिमांड नोटिस के साथ जुड़ी होती है, खासकर तब जब नोटिस ड्रॉअर के सही पते पर भेजा गया हो।
नतीजतन, अपील मंज़ूरी की गई और इस तरह रेस्पॉन्डेंट की सज़ा बहाल कर दी गई।
Case Title : SAINABA VERSUS STATE OF KERALA & ANR.