सुप्रीम कोर्ट ने सुझाव दिया कि सरकार कमर्शियल कोर्ट्स एक्ट, 2015 में संशोधन कर सकती है ताकि यह स्पष्ट किया जा सके कि कमर्शियल मुकदमों में निष्पादन की प्रक्रिया 'कमर्शियल कोर्ट रूल्स' के अनुसार होगी, जो 2021 से अधिसूचित (Notified) नहीं किए गए हैं। कोर्ट ने प्रस्ताव दिया कि इन नियमों को एक अनुसूची (Schedule) जोड़कर एक्ट का हिस्सा बनाया जा सकता है।

कमर्शियल कोर्ट रूल्स के ड्राफ्ट को इसलिए अधिसूचित नहीं किया गया, क्योंकि केंद्र सरकार का कहना था कि यह 'कोड ऑफ़ सिविल प्रोसीजर' (CPC) के कुछ प्रावधानों के साथ टकराव पैदा कर सकता है। अब, कोर्ट ने सुझाव दिया है कि 2015 के एक्ट में संशोधन के माध्यम से ड्राफ्ट नियमों को अधिसूचित किया जा सकता है।

जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के विनोद चंद्रन की बेंच देश भर में लंबित निष्पादन याचिकाओं (Execution Petitions) के निपटारे से जुड़े मामले की सुनवाई कर रही है। बता दें, 6 मार्च, 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट्स से देश भर की ज़िला अदालतों में लंबित निष्पादन याचिकाओं का डेटा इकट्ठा करने को कहा। कोर्ट ने इस मामले में सीनियर एडवोकेट गोपाल शंकरनारायणन को 'एमिकस' (न्याय मित्र) नियुक्त किया।

सुप्रीम कोर्ट ने निष्पादन याचिकाओं के निपटारे के लिए छह महीने की समय-सीमा तय की थी।

सुनवाई के दौरान, कोर्ट को बताया गया कि 'कमर्शियल कोर्ट रूल्स, 2021' का ड्राफ्ट, जिसमें सभी ज़िला अदालतों में 'ज़िला निष्पादन सेल' (District Execution Cell) स्थापित करने का प्रस्ताव है, कमर्शियल मुकदमों में तेज़ी से निष्पादन के लिए एक प्रभावी तरीका साबित होगा।

केंद्र सरकार ने तर्क दिया कि इसे अधिसूचित नहीं किया गया क्योंकि यह 'कोड ऑफ़ सिविल प्रोसीजर' के साथ टकराव पैदा करता है।

एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने गुरुवार को कहा कि केंद्र सरकार ड्राफ्ट नियमों को शामिल करने के लिए 'कमर्शियल कोर्ट्स एक्ट, 2015' में संशोधन करने पर विचार कर रही है। इसके साथ ही 'कोड ऑफ़ सिविल प्रोसीजर' में भी संबंधित संशोधन करने होंगे। एक अन्य वकील ने बताया कि 'कमर्शियल कोर्ट्स एक्ट' की धारा 21 में एक 'ओवरराइडिंग प्रावधान' (सर्वोपरि प्रावधान) है, इसलिए CPC के साथ टकराव की स्थिति पैदा नहीं होनी चाहिए, और कमर्शियल मुकदमों के लिए ड्राफ्ट नियमों को अधिसूचित किया जा सकता है।

इस पर जस्टिस पारदीवाला ने सुझाव दिया:

"आप सभी एक्ट में ही यह कह सकते हैं कि निष्पादन अनुसूची (Schedule) के अनुसार होगा और आप एक ऐसी अनुसूची ला सकते हैं जो एक्ट का हिस्सा बन जाए। लेकिन आपको ऐसा करना होगा।"

शंकरनारायणन ने उन मामलों से निपटने के लिए कुछ सुझाव भी दिए जिनमें मुकदमे अभी लंबित हैं। उन्होंने कहा कि लंबित मुकदमों में पक्षकार खुद अपनी संपत्ति की जानकारी दे सकते हैं।

हालांकि, इस पर जस्टिस चंद्रन ने टिप्पणी की कि यह तरीका शायद काम न करे, क्योंकि जब तक मुकदमे में कोई डिक्री (अदालत का अंतिम आदेश) नहीं आ जाती, तब तक पक्षकारों से उनकी संपत्ति का विवरण नहीं मांगा जा सकता।

जस्टिस पारदीवाला ने भी कहा कि फिलहाल बेंच इस पहलू पर विचार नहीं करेगी।

आखिरकार, कोर्ट ने कोई आदेश पारित नहीं किया, क्योंकि उसने कहा कि 7 अक्टूबर को उसे हाईकोर्ट से पिछले 6 महीनों में लंबित निष्पादन याचिकाओं (Execution Petitions) पर हुई प्रगति के संशोधित आंकड़े प्राप्त होंगे। हालांकि, कोर्ट ने यह भी कहा कि हर 6 महीने में आंकड़े मंगाने से समस्या का समाधान नहीं होगा और निष्पादन याचिकाओं का तेजी से निपटारा करने के लिए हाईकोर्ट स्तर पर एक व्यवस्था बनानी होगी।

Case Details: PERIYAMMAL (DEAD THR. LRS.) AND ORS Versus V. RAJAMANI AND ANR. ETC|MA 1889-1891/2025 in C.A. No. 3640-3642/2025 Diary No. 59338 / 2025

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