'साइबर क्राइम एक लत, इसमें आसानी से पैसे मिलते हैं': सुप्रीम कोर्ट ने ज़मानत देने से किया इनकार
सुप्रीम कोर्ट ने साइबर क्राइम के आरोपी व्यक्ति को ज़मानत देने से इनकार करते हुए कहा कि साइबर क्राइम एक लत की तरह है। कोर्ट ने इस बात पर ध्यान दिया कि याचिकाकर्ता (आरोपी) के खिलाफ़ पहले भी इसी तरह के तीन आपराधिक मामले दर्ज हैं। यह देखते हुए कि पिछले एक साल में सिर्फ़ एक गवाह से पूछताछ हुई है, कोर्ट ने निर्देश दिया कि मुक़दमे की सुनवाई छह महीने के भीतर पूरी की जाए।
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के विनोद चंद्रन की बेंच ने झारखंड हाईकोर्ट के उस आदेश के खिलाफ़ स्पेशल लीव एप्लीकेशन (SLP) पर सुनवाई करते हुए ये टिप्पणियां कीं, जिसमें हाईकोर्ट ने उसकी ज़मानत अर्ज़ी खारिज की थी।
याचिकाकर्ता देवघर में एडिशनल सेशन जज-II कम साइबर क्राइम स्पेशल कोर्ट में चल रहे साइबर क्राइम मामले में आरोपी है। उस पर भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की धाराओं 111(2), 111(3), 111(4), 319(2), 318(4), 338, 336(3), 340(2), 61(2) और इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी एक्ट, 2000 (IT एक्ट) की धाराओं 66B, 66C और 84C के तहत मामला दर्ज किया गया।
याचिकाकर्ता और उसके साथ आरोपी व्यक्ति को सिम कार्ड और मोबाइल फ़ोन के साथ पकड़ा गया। याचिकाकर्ता की ज़मानत अर्ज़ी खारिज करते हुए झारखंड हाईकोर्ट ने कहा कि ज़ब्त किए गए फ़ोन से ऐसी सामग्री मिली है, जो फ़्लिपकार्ट कस्टमर केयर, अमेज़न कस्टमर केयर, एयरटेल पेमेंट बैंक, फ़ोन-पे कस्टमर केयर और पीएम किसान योजना के नाम पर धोखाधड़ी करने से जुड़ी थी, जिससे पता चलता है कि याचिकाकर्ता साइबर क्राइम में शामिल था। इसलिए हाईकोर्ट ने उसकी ज़मानत अर्ज़ी खारिज की। हालांकि, कोर्ट ने यह उम्मीद भी जताई कि आदेश की तारीख (10.07.2026) से छह महीने के भीतर मुक़दमे की सुनवाई पूरी हो जानी चाहिए।
याचिका खारिज करते हुए झारखंड हाईकोर्ट ने कहा:
“5. ऊपर बताई गई बात को ध्यान में रखते हुए मैं याचिकाकर्ता को ज़मानत देने के पक्ष में नहीं हूँ। इसलिए, साइबर क्राइम केस नंबर 160/2025 (जो देवघर साइबर PS केस नंबर 132/2025 से जुड़ा है और देवघर की एडिशनल सेशन जज-II कम साइबर क्राइम स्पेशल कोर्ट में चल रहा है) के सिलसिले में याचिकाकर्ता की ज़मानत की अर्ज़ी खारिज की जाती है।
6. इसलिए, यह ज़मानत अर्ज़ी खारिज की जाती है।
7. उम्मीद है कि ट्रायल छह महीने के अंदर पूरा हो जाएगा।”
हाईकोर्ट के फैसले से नाखुश होकर याचिकाकर्ता सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
सुप्रीम कोर्ट के सामने याचिकाकर्ता ने कहा कि वह पिछले एक साल से हिरासत में है और इस मामले में उसके साथ आरोपी व्यक्ति को हाईकोर्ट ने एक साल तक हिरासत में रहने के आधार पर ज़मानत दी थी। यह भी कहा गया कि याचिकाकर्ता 26 साल का युवा है, उसे एक बच्चे की देखभाल करनी है और उसके पास आय का कोई दूसरा ज़रिया नहीं है। ट्रायल की धीमी गति की ओर इशारा करते हुए याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि “एक साल में सिर्फ़ एक गवाह से पूछताछ हुई है।”
इन तर्कों का जवाब देते हुए प्रतिवादी (राज्य) ने बताया कि याचिकाकर्ता के खिलाफ़ एक जैसे तीन आपराधिक मामले दर्ज हैं।
एक जैसे आपराधिक रिकॉर्ड की बात पर ध्यान देते हुए जस्टिस पारदीवाला ने मौखिक रूप से टिप्पणी की,
“साइबर क्राइम एक लत की तरह है, क्योंकि इसमें आसानी से पैसा मिल जाता है।”
ज़मानत अर्ज़ी खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा:
“ट्रायल चल रहा है। अब तक एक गवाह से पूछताछ हुई है। ट्रायल तेज़ी से आगे बढ़ना चाहिए। हम याचिकाकर्ता की ज़मानत की अर्ज़ी पर विचार कर सकते थे, लेकिन उसके खिलाफ़ एक जैसे तीन आपराधिक मामले दर्ज हैं। ट्रायल को आगे बढ़ने दें और आज से छह महीने के भीतर पूरा करें।”
बेंच द्वारा यह दर्ज किए जाने पर कि याचिकाकर्ता के खिलाफ़ एक जैसे तीन आपराधिक मामले हैं, याचिकाकर्ता के वकील ने बेंच को बताया कि उन्हें ऐसे केवल एक मामले की जानकारी है।
इस प्रकार कोर्ट ने दर्ज किया,
“हालांकि, याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील का कहना है कि उनके मुवक्किल के खिलाफ़ केवल एक मामला है, तीन नहीं।”
ऊपर बताई गई बातों को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने उसे ज़मानत देने से इनकार किया।
Case: Pintu Das @ Pintu Kumar Das v State of Jharkhand (Diary No. 51817/2026)