सुप्रीम कोर्ट वीकली राउंड अप : सुप्रीम कोर्ट के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र

Update: 2026-07-04 14:45 GMT

सुप्रीम कोर्ट में पिछले सप्ताह (29 जून, 2026 से 03 जुलाई, 2026 तक) तक क्या कुछ हुआ, जानने के लिए देखते हैं सुप्रीम कोर्ट वीकली राउंड अप। पिछले सप्ताह सुप्रीम कोर्ट के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र।

Motor Accident Claims | सुप्रीम कोर्ट ने पीड़ित की आय का आकलन करने के लिए ITR के इस्तेमाल पर नियम तय किए

मोटर दुर्घटना मुआवज़े के दावों के लिए मृतक की सालाना आय की गणना के तरीके में एकरूपता लाने के मकसद से सुप्रीम कोर्ट ने मोटर दुर्घटना मुआवज़े के मामलों में पीड़ितों की सालाना आय का आकलन करने के लिए विस्तृत गाइडलाइंस तय कीं। इसमें सैलरी पाने वाले कर्मचारियों और खुद का काम करने वाले (सेल्फ-एम्प्लॉयड) लोगों के बीच स्पष्ट अंतर किया गया।

जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमेइकापम कोटिश्वर सिंह की बेंच ने कहा कि सैलरी पाने वाले व्यक्तियों के मामले में आम तौर पर ठीक पिछले असेसमेंट ईयर के इनकम टैक्स रिटर्न (ITR) पर विचार किया जाना चाहिए। वहीं, खुद का काम करने वाले लोगों या कारोबारियों के मामले में, ट्रिब्यूनल को आम तौर पर पिछले तीन सालों के ITR में दिखाई गई औसत आय को आधार बनाना चाहिए, हालांकि हर मामले की परिस्थितियों को भी ध्यान में रखा जाएगा।

Cause Title: RASHMIREKHA TRIPATHY AND ANR. VERSUS THE BRANCH MANAGER (LEGAL CLAIMS), SRIRAM GENERAL INSURANCE COMPANY LIMITED AND ORS.

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क्लाइंट की स्पष्ट अनुमति के बिना समझौता नहीं कर सकता वकील, केवल पक्षकारों के हस्ताक्षर वाला समझौता ही वैध: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि मुवक्किल (Client) की स्पष्ट अनुमति के बिना कोई भी अधिवक्ता उसकी ओर से समझौता (Compromise) नहीं कर सकता। अदालत ने कहा कि सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के आदेश 23 नियम 3 के तहत समझौता डिक्री तभी वैध होगी, जब समझौता लिखित हो और उस पर संबंधित पक्षकारों के हस्ताक्षर हों।

जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमेइकापम कोटिश्वर सिंह की पीठ ने यह टिप्पणी पैतृक संपत्ति के बंटवारे से जुड़े एक मामले में की। मामला 1989 में दायर विभाजन वाद से संबंधित था, जिसमें 1994 में कथित समझौते के आधार पर डिक्री पारित कर दी गई थी।

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नगर निकाय चुनावों पर 'जन प्रतिनिधित्व अधिनियम' लागू नहीं होता: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 'जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951' (RPA) के तहत सज़ा वाले प्रावधान नगर निकाय चुनावों पर लागू नहीं होते। कोर्ट ने साफ़ किया कि अगर स्थानीय निकाय चुनावों में उम्मीदवार झूठा हलफ़नामा (affidavit) दाखिल करने के आरोपी हैं, तो उन पर 'भारतीय दंड संहिता' (IPC) के तहत मुक़दमा चलाया जा सकता है, बशर्ते संबंधित नगर निकाय क़ानून में सज़ा का कोई प्रावधान न हो।

जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमेइकापम कोटिश्वर सिंह की बेंच ने चंद्रिकाबेन किशोर डाफडा की अपील पर फ़ैसला सुनाते हुए यह बात कही। उन्होंने उन आपराधिक कार्यवाही को चुनौती दी थी, जिसमें आरोप लगाया गया कि 2015 में गुजरात में नगर निकाय चुनाव लड़ते समय उन्होंने अपने पति की अचल संपत्ति (immovable properties) की जानकारी छिपाई थी।

Cause Title: CHANDRIKABEN KISHOR DAFDA VERSUS STATE OF GUJARAT & ANR.

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जिन मामलों की सुनवाई सिर्फ़ सेशंस कोर्ट में हो सकती है, उनमें मजिस्ट्रेट को प्रॉसिक्यूशन के सबूत रिकॉर्ड करने की ज़रूरत नहीं: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (1 जुलाई) को कहा कि अगर किसी शिकायत वाले मामले में ऐसा अपराध शामिल है, जिसकी सुनवाई सिर्फ़ सेशंस कोर्ट में हो सकती है तो मजिस्ट्रेट को उस मामले को सेशंस कोर्ट भेजने से पहले CrPC, 1973 की धारा 244 के तहत आरोप तय होने से पहले के सबूत (pre-charge evidence) रिकॉर्ड करने की ज़रूरत नहीं है। कोर्ट ने पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट का फ़ैसला रद्द किया, जिसमें ऐसा करने का निर्देश दिया गया।

Cause Title: NEERAJ GUPTA Versus PARDEEP KUMAR BANSAL & ORS.

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आर्टिकल 161 के तहत बनी सज़ा में छूट की पॉलिसी, CrPC के तहत बनी पॉलिसी से ज़्यादा अहम: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (1 जुलाई) को कहा कि संविधान के आर्टिकल 161 के तहत गवर्नर की संवैधानिक शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए राज्य सरकार द्वारा बनाई गई सज़ा में छूट की पॉलिसी को बाद में कोड ऑफ़ क्रिमिनल प्रोसीजर (CrPC) की धारा 432 और 433 के तहत जारी की गई कानूनी छूट पॉलिसी से बदला या खत्म नहीं किया जा सकता।

कोर्ट ने माना कि राज्य की 2008 की कानूनी पॉलिसी के बावजूद हरियाणा की 2002 की छूट पॉलिसी लागू रही। साथ ही कोर्ट ने 'स्टेट ऑफ़ हरियाणा बनाम राज कुमार' मामले में अपने 2021 के फ़ैसले को 'पर इनकुरियम' (कानून की अनदेखी करके दिया गया फ़ैसला) करार दिया, क्योंकि यह 'स्टेट ऑफ़ हरियाणा बनाम जगदीश' (2010) 4 SCC 216 मामले में बड़ी बेंच के फ़ैसले के खिलाफ़ था।

Cause Title: PARVEEN KUMAR@ PARVEEN CHAUHAN Versus STATE OF HARYANA AND ORS.

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S. 187(3) BNSS | आरोपी को चार्जशीट न देना डिफ़ॉल्ट ज़मानत का आधार नहीं: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (1 जुलाई) को कहा कि आरोपी को चार्जशीट की कॉपी न देना, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 187(3) के तहत डिफ़ॉल्ट ज़मानत का आधार नहीं हो सकता।

जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमेइकापम कोटिश्वर सिंह की बेंच ने बॉम्बे हाईकोर्ट के उस फ़ैसले को सही ठहराया, जिसमें आरोपी की डिफ़ॉल्ट ज़मानत की अर्ज़ी को इस आधार पर खारिज कर दिया गया कि उसे चार्जशीट की कॉपी नहीं दी गई।

Cause Title: SHAURYA SUNIL KUMAR SINGH Versus CENTRAL BUREAU OF INVESTIGATION

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