क्लाइंट की स्पष्ट अनुमति के बिना समझौता नहीं कर सकता वकील, केवल पक्षकारों के हस्ताक्षर वाला समझौता ही वैध: सुप्रीम कोर्ट

Praveen Mishra

2 July 2026 3:43 PM IST

  • क्लाइंट की स्पष्ट अनुमति के बिना समझौता नहीं कर सकता वकील, केवल पक्षकारों के हस्ताक्षर वाला समझौता ही वैध: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि मुवक्किल (Client) की स्पष्ट अनुमति के बिना कोई भी अधिवक्ता उसकी ओर से समझौता (Compromise) नहीं कर सकता। अदालत ने कहा कि सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के आदेश 23 नियम 3 के तहत समझौता डिक्री तभी वैध होगी, जब समझौता लिखित हो और उस पर संबंधित पक्षकारों के हस्ताक्षर हों।

    जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमेइकापम कोटिश्वर सिंह की पीठ ने यह टिप्पणी पैतृक संपत्ति के बंटवारे से जुड़े एक मामले में की। मामला 1989 में दायर विभाजन वाद से संबंधित था, जिसमें 1994 में कथित समझौते के आधार पर डिक्री पारित कर दी गई थी।

    करीब 28 वर्ष बाद, एक प्रतिवादी के कानूनी उत्तराधिकारियों ने दावा किया कि उनके पूर्वज ने न तो समझौता पत्र पर हस्ताक्षर किए थे और न ही अपने वकील को उनकी ओर से समझौता करने की अनुमति दी थी। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि वकालतनामा और लिखित बयान जाली थे। ट्रायल कोर्ट ने इन दलीलों को स्वीकार करते हुए समझौता डिक्री रद्द कर दी, जिसे पटना हाईकोर्ट ने भी बरकरार रखा।

    सुप्रीम कोर्ट ने अपील खारिज करते हुए कहा कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई साक्ष्य नहीं है जिससे यह साबित हो कि संबंधित प्रतिवादी ने अपने अधिवक्ता को समझौते के लिए स्पष्ट रूप से अधिकृत (Expressly Authorised) किया था। अदालत ने कहा कि वकील अपने मुवक्किल के निर्देशों के अनुसार कार्य करने के लिए बाध्य हैं और मूल्यवान नागरिक अधिकारों को प्रभावित करने वाले मामलों में अपनी ओर से निर्णय नहीं ले सकते।

    पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि 1976 में CPC में संशोधन के बाद समझौता लिखित होना और पक्षकारों के हस्ताक्षर होना अनिवार्य है। अदालत ने कहा कि समझौता डिक्री के खिलाफ अलग से मुकदमा या अपील दायर नहीं की जा सकती और इसका एकमात्र उपाय उसी अदालत के समक्ष रिकॉल (Recall) आवेदन दाखिल करना है।

    मामले में समझौता डिक्री रद्द होने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अब विभाजन वाद का पूर्ण ट्रायल होगा ताकि उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर पक्षकारों के अधिकारों का विधि अनुसार निर्धारण किया जा सके।

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    प्रवीण मिश्रा Law Graduate हैं और लाइव लॉ हिंदी से जुड़े हैं। वे सुप्रीम कोर्ट, उच्च न्यायालयों, उपभोक्ता आयोगों और अन्य न्यायिक मंचों के महत्वपूर्ण फैसलों एवं कानूनी घटनाक्रमों पर लेखन करते हैं। उनका उद्देश्य जटिल कानूनी विषयों और न्यायिक निर्णयों को सरल, सटीक और तथ्यपरक भाषा में हिंदी पाठकों तक पहुंचाना है।

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