आर्टिकल 161 के तहत बनी सज़ा में छूट की पॉलिसी, CrPC के तहत बनी पॉलिसी से ज़्यादा अहम: सुप्रीम कोर्ट

Shahadat

1 July 2026 4:27 PM IST

  • आर्टिकल 161 के तहत बनी सज़ा में छूट की पॉलिसी, CrPC के तहत बनी पॉलिसी से ज़्यादा अहम: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (1 जुलाई) को कहा कि संविधान के आर्टिकल 161 के तहत गवर्नर की संवैधानिक शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए राज्य सरकार द्वारा बनाई गई सज़ा में छूट की पॉलिसी को बाद में कोड ऑफ़ क्रिमिनल प्रोसीजर (CrPC) की धारा 432 और 433 के तहत जारी की गई कानूनी छूट पॉलिसी से बदला या खत्म नहीं किया जा सकता।

    कोर्ट ने माना कि राज्य की 2008 की कानूनी पॉलिसी के बावजूद हरियाणा की 2002 की छूट पॉलिसी लागू रही। साथ ही कोर्ट ने 'स्टेट ऑफ़ हरियाणा बनाम राज कुमार' मामले में अपने 2021 के फ़ैसले को 'पर इनकुरियम' (कानून की अनदेखी करके दिया गया फ़ैसला) करार दिया, क्योंकि यह 'स्टेट ऑफ़ हरियाणा बनाम जगदीश' (2010) 4 SCC 216 मामले में बड़ी बेंच के फ़ैसले के खिलाफ़ था।

    जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमेइकापम कोटिश्वर सिंह की बेंच ने यह फ़ैसला एक उम्रकैद की सज़ा काट रहे कैदी की अपील को मंज़ूरी देते हुए सुनाया। उसकी समय से पहले रिहाई की अर्ज़ी इस आधार पर खारिज कर दी गई कि उस पर हरियाणा की 2008 की छूट पॉलिसी लागू होती थी, न कि ज़्यादा उदार 2002 की पॉलिसी।

    अपीलकर्ता को 2009 में 12 साल के बच्चे की हत्या के लिए दोषी ठहराया गया। 14 साल से ज़्यादा की वास्तविक जेल की सज़ा काटने के बाद उसने 2002 की पॉलिसी के तहत छूट की मांग की। राज्य ने उसकी अर्ज़ी खारिज करते हुए कहा कि चूंकि सज़ा सुनाए जाने की तारीख को 2008 की पॉलिसी लागू थी, इसलिए वह वास्तविक जेल की 20 साल और कुल जेल की 25 साल की सज़ा पूरी करने के बाद ही विचार किए जाने के योग्य होगा।

    इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने राज्य के फ़ैसले को सही ठहराया।

    दोनों पॉलिसी की जांच करने पर सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि 2002 की पॉलिसी में साफ़ तौर पर यह ज़रूरी था कि छूट के मामलों को संविधान के आर्टिकल 161 के तहत आदेश के लिए गवर्नर के सामने रखा जाए, जबकि 2008 की पॉलिसी में खास तौर पर CrPC की धारा 432 और 433 का ज़िक्र था और कानूनी ढांचे के तहत मुख्यमंत्री की मंज़ूरी ज़रूरी थी।

    कोर्ट ने कहा,

    "यह कहने की ज़रूरत नहीं है कि कोई कानूनी पॉलिसी... आर्टिकल 161 के तहत मिली शक्ति के इस्तेमाल को ओवरराइड नहीं कर सकती, क्योंकि वह शक्ति अलग और स्वतंत्र है, किसी दूसरी शक्ति से प्रभावित नहीं होती, और खास तौर पर कानूनी प्रकृति की होती है।"

    बेंच ने माना कि हरियाणा की 2002 की पॉलिसी संवैधानिक आधार पर बनी थी, ठीक वैसे ही जैसे 1993 की सज़ा कम करने (रेमिशन) की पॉलिसी थी, जिसे 'स्टेट ऑफ़ हरियाणा बनाम जगदीश' मामले में तीन जजों की बेंच ने पहले ही आर्टिकल 161 के तहत शक्ति का इस्तेमाल माना। चूंकि 1993 और 2002 दोनों पॉलिसी में सज़ा कम करने के प्रस्तावों को आर्टिकल 161 के तहत आदेश के लिए गवर्नर के सामने रखना ज़रूरी था, इसलिए कोर्ट ने पाया कि संवैधानिक स्रोत के मामले में वे एक जैसी थीं। नतीजतन, CrPC के तहत जारी की गई बाद की 2008 की पॉलिसी, 2002 की पॉलिसी की जगह नहीं ले सकती।

    इसलिए कोर्ट ने माना कि 'स्टेट ऑफ़ हरियाणा बनाम राज कुमार (2021)' मामले में दो जजों की बेंच का उल्टा नज़रिया 'पर इनकुरियम' (कानून की अनदेखी करके लिया गया फ़ैसला) था। राज कुमार मामले में कोर्ट ने माना कि 2002 की पॉलिसी सिर्फ़ CrPC से जुड़ी एक कानूनी पॉलिसी थी, क्योंकि इसमें उस शक्ति के स्रोत का साफ़ तौर पर ज़िक्र नहीं था, जिसके तहत इसे जारी किया गया, इसलिए 2008 की पॉलिसी ने इसकी जगह ले ली थी।

    मौजूदा बेंच ने माना कि 'जगदीश' मामले में तीन जजों की बेंच के बाध्यकारी फ़ैसले को देखते हुए इस तर्क को सही नहीं ठहराया जा सकता। इसने देखा कि जब बड़ी बेंच ने काफ़ी हद तक एक जैसी 1993 की पॉलिसी को आर्टिकल 161 के तहत संवैधानिक शक्ति का इस्तेमाल माना था तो "अनिवार्य निष्कर्ष" यही था कि 2002 की पॉलिसी भी संवैधानिक प्रकृति की थी।

    कोर्ट ने कहा कि राज कुमार मामले में यह निष्कर्ष कि 2002 की पॉलिसी कानूनी थी, "ऊपर बताए गए जगदीश मामले के तर्क के ख़िलाफ़ होगा। इसलिए 'पर इनकुरियम' माना जाएगा।" इसने आगे कहा कि बड़ी बेंच को मामला भेजने की ज़रूरत नहीं थी, क्योंकि यह मुद्दा 'जगदीश' मामले में बड़ी बेंच के बाध्यकारी फ़ैसले से पहले ही तय हो चुका था।

    अपील को मंज़ूरी देते हुए कोर्ट ने हरियाणा सरकार को निर्देश दिया कि वह 2002 की पॉलिसी के तहत अपील करने वाले की सज़ा कम करने की अर्ज़ी पर चार हफ़्ते के भीतर फिर से विचार करे। हालांकि, कोर्ट ने यह साफ़ किया कि यह फ़ैसला भविष्य के मामलों पर लागू होगा और जिन सज़ा में छूट (रेमिशन) की अर्जियों पर पहले ही फ़ैसला हो चुका है, उन्हें दोबारा नहीं खोला जाएगा। कोर्ट ने यह भी कहा कि इस फ़ैसले के बाद हरियाणा में असल में दो अलग-अलग रेमिशन पॉलिसी एक साथ चलेंगी और भविष्य में कैसे आगे बढ़ना है, यह तय करना राज्य सरकार पर निर्भर करेगा।

    Cause Title: PARVEEN KUMAR@ PARVEEN CHAUHAN Versus STATE OF HARYANA AND ORS.

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