योजना का क्रियान्वयन मॉडल बदलने पर आउटसोर्स लैब तकनीशियनों को बनाए रखना सरकार की बाध्यता नहीं: राजस्थान हाईकोर्ट
राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि जब किसी सरकारी योजना को नई योजना से प्रतिस्थापित कर उसके क्रियान्वयन का तरीका बदल दिया जाए तो राज्य सरकार को यह बाध्य नहीं किया जा सकता कि वह आउटसोर्सिंग एजेंसी के माध्यम से कार्यरत कर्मचारियों की सेवाएं जारी रखे।
जस्टिस मुन्नुरी लक्ष्मण की पीठ ने स्पष्ट किया कि पूर्व के कई मामलों में अदालत ने आउटसोर्सिंग एजेंसी के माध्यम से कार्यरत कर्मचारियों के हितों की रक्षा की, लेकिन वह संरक्षण केवल उन परिस्थितियों में दिया गया था जब मात्र एजेंसी बदलने के कारण एक समूह के कर्मचारियों को हटाकर दूसरे समूह को लाया जा रहा था।
अदालत ने कहा कि वर्तमान मामला भिन्न है, क्योंकि यहां केवल आउटसोर्सिंग एजेंसी नहीं बदली गई, बल्कि नई योजना में ही अलग से मैनपावर एजेंसी से सेवाएं लेने की व्यवस्था समाप्त की गई।
पीठ ने कहा,
“यदि याचिकाकर्ताओं की मांग स्वीकार की जाती है तो यह सरकार की नीतिगत निर्णय प्रक्रिया में हस्तक्षेप होगा और राज्य को पुरानी व्यवस्था जारी रखने के लिए बाध्य करना होगा, जिससे नई योजना का उद्देश्य ही विफल हो जाएगा।”
मामले में याचिकाकर्ता लैब तकनीशियन के रूप में कार्यरत थे। पुरानी योजना के तहत लैब का आधारभूत ढांचा सरकार उपलब्ध कराती थी, जबकि तकनीशियनों की सेवाएं आउटसोर्सिंग एजेंसी के माध्यम से ली जाती थीं।
बाद में इस योजना को नई व्यवस्था से बदल दिया गया, जिसके तहत चयनित निजी लैब को ही लैब का ढांचा और आवश्यक मैनपावर दोनों उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी सौंप दी गई। इसके चलते पुरानी योजना के तहत कार्यरत आउटसोर्स कर्मचारियों की सेवाएं समाप्त कर दी गईं।
याचिकाकर्ताओं ने दलील दी कि चूंकि उनकी नियुक्ति योजना के स्वीकृत पदों पर हुई थी, इसलिए योजना के क्रियान्वयन का तरीका बदलने के बावजूद उनकी सेवाएं जारी रहनी चाहिए थीं।
हालांकि, हाईकोर्ट ने यह तर्क स्वीकार नहीं किया और कहा कि यहां किसी नई आउटसोर्सिंग एजेंसी द्वारा पुराने कर्मचारियों को प्रतिस्थापित नहीं किया जा रहा, बल्कि पूरी व्यवस्था ही बदल दी गई।
इसी आधार पर अदालत ने सभी याचिकाएं खारिज कीं।