20 लाख रुपये गुजारा भत्ता और आपसी सहमति से तलाक के बाद भी दहेज मामला जारी रखना कानून का दुरुपयोग: राजस्थान हाईकोर्ट

Update: 2026-06-12 08:31 GMT

राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि एक महिला द्वारा 20 लाख रुपये स्थायी गुजारा भत्ता प्राप्त करने और आपसी सहमति से तलाक लेने के बाद भी पूर्व पति और उसके परिवार के खिलाफ दहेज उत्पीड़न के मुकदमे को जारी रखना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग है।

जस्टिस अनुप कुमार ढांड की पीठ ने कहा कि यह मामला एक चिंताजनक प्रवृत्ति को दर्शाता है जहां समझौता, गुजारा भत्ता और तलाक प्राप्त करने के बावजूद शिकायतकर्ता मुकदमे को जारी रखकर याचिकाकर्ताओं को लंबी कानूनी प्रक्रिया और आर्थिक बोझ झेलने के लिए मजबूर कर रही है।

अदालत दहेज मांग और उत्पीड़न से जुड़े एक मामले में कार्यवाही रद्द करने की याचिका पर सुनवाई कर रही थी। इस मामले में वर्ष 2018 में पति और उसके परिजनों के खिलाफ आरोप तय किए गए।

सुनवाई के दौरान बताया गया कि मुकदमे के लंबित रहने के दौरान पति ने तलाक की अर्जी दायर की, जिसे निचली अदालत ने स्वीकार कर लिया था।

इस फैसले को पत्नी ने चुनौती दी थी। बाद में दोनों पक्षों के बीच समझौता हुआ, जिसके तहत पत्नी को 20 लाख रुपये एकमुश्त स्थायी गुजारा भत्ता दिया गया और आपसी सहमति से तलाक का आदेश पारित हुआ।

याचिकाकर्ताओं का कहना था कि समझौते और गुजारा भत्ता प्राप्त करने के बावजूद महिला ने आपराधिक मुकदमा वापस नहीं लिया। साथ ही वर्ष 2018 से न तो वह स्वयं और न ही उसके परिवार का कोई सदस्य गवाही देने के लिए अदालत में उपस्थित हुआ।

अदालत ने कहा कि आरोप तय होने के बाद आठ वर्ष से अधिक समय बीत चुका है और परिस्थितियां यह संकेत देती हैं कि विवाह समाप्त होने तथा 20 लाख रुपये प्राप्त करने के बाद भी शिकायतकर्ता का एकमात्र उद्देश्य याचिकाकर्ताओं को परेशान करना है।

अदालत ने पाया कि दोनों पक्षों के बीच हुए समझौते में न केवल आपसी सहमति से तलाक बल्कि आपराधिक कार्यवाही समाप्त करने का भी प्रावधान है।

हाईकोर्ट ने कहा कि समझौते के आधार पर तलाक का लाभ लेने के बाद शिकायतकर्ता अपने घोषित रुख से पीछे नहीं हट सकती। समझौते का पालन करने से इनकार करना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग है, जिसे स्वीकार नहीं किया जा सकता।

अदालत ने कहा,

"अदालती कार्यवाही को किसी व्यक्ति को प्रताड़ित करने या परेशान करने का हथियार बनने की अनुमति नहीं दी जा सकती। न्याय का उद्देश्य केवल कानून के अक्षरशः पालन तक सीमित नहीं है, बल्कि वास्तविक न्याय सुनिश्चित करना उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है।"

इन परिस्थितियों को देखते हुए हाइकोर्ट ने पति और उसके परिवार के खिलाफ लंबित समस्त आपराधिक कार्यवाही रद्द की।

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