मात्र नाबालिग पीड़िता के केस आगे न बढ़ाने की इच्छा पर ही POCSO केस रद्द नहीं किया जा सकता: राजस्थान हाईकोर्ट
राजस्थान हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का आदेश रद्द किया, जिसमें पुलिस की 'नेगेटिव फ़ाइनल रिपोर्ट' स्वीकार की थी। यह रिपोर्ट नाबालिग पीड़िता की सहमति के आधार पर दी गई, जिसमें उसने कहा कि वह आरोपियों के ख़िलाफ़ कार्यवाही आगे नहीं बढ़ाना चाहती।
जस्टिस अनूप कुमार ढंड की बेंच ने कहा कि POCSO के तहत आरोपियों पर चल रहे मुक़दमे को सिर्फ़ इस आधार पर रद्द नहीं किया जा सकता कि पीड़िता ने बाद में कार्यवाही आगे न बढ़ाने पर सहमति दी थी।
आगे कहा गया,
"जब आरोपी के ख़िलाफ़ अपराध बनता है - चाहे पीड़िता की सहमति हो या न हो - तो मुक़दमे को सिर्फ़ इस आधार पर रद्द नहीं किया जा सकता कि पीड़िता ने बाद में आरोपियों के ख़िलाफ़ कार्यवाही आगे न बढ़ाने पर सहमति दी है। जब अपराध दर्ज करने के लिए नाबालिग पीड़िता की सहमति मायने नहीं रखती तो ऐसी सहमति सभी चरणों में व्यावहारिक उद्देश्यों के लिए भी मायने नहीं रखेगी।"
कोर्ट ने यह भी कहा कि कानून नाबालिगों को कमज़ोर मानता है और यह भी मानता है कि उनमें अपने अपरिपक्व फ़ैसलों के नतीजों और उनके असर को समझने की क्षमता नहीं होती।
बता दें, आरोपियों के ख़िलाफ़ FIR दर्ज की गई, जिसमें एक नाबालिग लड़की ने रेप और यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया। पीड़िता ने CrPC की धारा 164 के तहत बयान देते समय भी ऐसे आरोप लगाए। पुलिस की जांच के आधार पर एक 'नेगेटिव फ़ाइनल रिपोर्ट' सौंपी गई।
ट्रायल कोर्ट ने नेगेटिव रिपोर्ट के संबंध में पीड़िता को नोटिस भेजा, जिस पर उसने आरोपियों के ख़िलाफ़ कोई भी कार्यवाही आगे न बढ़ाने पर सहमति दी। इस सहमति के आधार पर ट्रायल कोर्ट ने पुलिस द्वारा सौंपी गई नेगेटिव फ़ाइनल रिपोर्ट स्वीकार की और कार्यवाही रद्द की। इस आदेश के ख़िलाफ़ यह याचिका दायर की गई।
यह तर्क दिया गया कि याचिकाकर्ता एक नाबालिग लड़की थी, जिसकी सहमति की कानून की नज़र में कोई अहमियत नहीं थी, इसलिए ऐसी सहमति के आधार पर कार्यवाही बंद नहीं की जानी चाहिए।
तर्कों को सुनने के बाद कोर्ट ने याचिकाकर्ता की ओर से दिए गए तर्कों को स्वीकार कर लिया।
आगे कहा गया,
“कानून की नज़र में नाबालिग की सहमति, सहमति नहीं मानी जाती है। इसलिए इन हालात में POCSO मामलों के स्पेशल जज का नाबालिग याचिकाकर्ता को बुलाने का तरीका सही नहीं था। पीड़ित को बुलाने के बजाय जज उसके माता-पिता/अभिभावक को बुला सकते थे ताकि वे नाबालिग याचिकाकर्ता द्वारा दर्ज FIR में पुलिस की फाइनल रिपोर्ट (नेगेटिव) के खिलाफ अपनी आपत्तियां पेश कर सकें।”
कोर्ट ने कहा कि रेप महिला के शरीर के खिलाफ एक अपराध है और किसी समझौते या सेटलमेंट से महिला की इज़्ज़त को खतरे में नहीं डाला जा सकता।
यह भी देखा गया कि अगर पीड़िता की तरफ से केस बंद करने का कोई बयान दिया गया तो कोर्ट को उसकी बारीकी से जांच करनी चाहिए थी और पीड़िता को उसके हितों की रक्षा के लिए DSLA के ज़रिए काबिल और पर्याप्त कानूनी मदद दी जानी चाहिए थी।
“2012 के एक्ट की धारा 40 के तहत हर नाबालिग बच्चे का कानूनी वकील की मदद पाने का अधिकार है, लेकिन इस मामले में FR (फाइनल रिपोर्ट) को मंज़ूरी देने वाला आदेश पारित करने से पहले याचिकाकर्ता को कानूनी मदद नहीं दी गई।”
इसलिए आदेश रद्द कर दिया गया और मामले को ट्रायल कोर्ट में वापस भेज दिया गया ताकि नाबालिग पीड़िता के माता-पिता/अभिभावकों को बुलाकर उचित आदेश पारित किए जा सकें और अगर उनका कोई वकील नहीं है तो उन्हें कानूनी मदद भी दी जा सके।
इसी के साथ याचिका का निपटारा किया गया।
Title: Victim v State of Rajasthan & Ors.