BNSS की धारा 129 के तहत चल रही कार्यवाही के दौरान निवारक हिरासत वैध होने के लिए सख्त कानूनी मानकों को पूरा करना अनिवार्य: जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट
जम्मू-कश्मीर एंड लद्दाख हाईकोर्ट ने यह फैसला दिया कि यद्यपि पब्लिक सेफ्टी एक्ट (PSA) के तहत निवारक हिरासत का इस्तेमाल तब भी किया जा सकता है, जब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 129 के तहत कार्यवाही चल रही हो, लेकिन ऐसी हिरासत को सख्त कानूनी मानकों को पूरा करना अनिवार्य है। ऐसा न होने पर उसे अवैध माना जाएगा।
कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि समानांतर निवारक कार्यवाही के अस्तित्व से, हिरासत में लेने वाले प्राधिकारी द्वारा स्वतंत्र रूप से अपने विवेक का इस्तेमाल करने की आवश्यकता कम नहीं हो जाती है।
कोर्ट एक बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) याचिका पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें निवारक हिरासत कानूनों के तहत पारित एक हिरासत आदेश को चुनौती दी गई। यह आदेश नशीले पदार्थों से संबंधित गतिविधियों में कथित संलिप्तता के आधार पर जारी किया गया, जबकि हिरासत में लिए गए व्यक्ति के खिलाफ हिरासत से ठीक पहले ही BNSS की धारा 129 के तहत कार्यवाही शुरू हो चुकी थी।
जस्टिस राजेश सेखरी की अध्यक्षता वाली पीठ ने यह टिप्पणी की,
"यद्यपि PSA के तहत निवारक हिरासत का इस्तेमाल कानूनी रूप से तब भी किया जा सकता है, जब BNSS की धारा 129 के तहत कार्यवाही चल रही हो, लेकिन इसे अवैध घोषित होने से बचने के लिए सख्त कानूनी मानकों को पूरा करना अनिवार्य है।"
विवादित हिरासत आदेश सीनियर पुलिस अधीक्षक द्वारा प्रस्तुत डोजियर के आधार पर पारित किया गया, जिसमें आरोप लगाया गया कि हिरासत में लिया गया व्यक्ति बार-बार नशीले पदार्थों की तस्करी में शामिल था और उससे सार्वजनिक व्यवस्था को खतरा था। रिकॉर्ड से यह पता चला कि हिरासत में लिए गए व्यक्ति के खिलाफ कई FIR दर्ज थीं और हिरासत आदेश से ठीक पहले ही BNSS की धारा 129 के तहत निवारक कार्यवाही भी शुरू की गई।
यह बात सामने आई कि BNSS कार्यवाही के दौरान हिरासत में लिए गए व्यक्ति को न्यायिक हिरासत में भेजा गया और हिरासत आदेश पारित होने से ठीक पहले ही उसे जमानत पर रिहा कर दिया गया। याचिकाकर्ता ने इस आधार पर हिरासत को चुनौती दी कि जब सामान्य कानूनी प्रक्रियाएं पहले से ही लागू थीं, तब निवारक हिरासत का इस्तेमाल करने के लिए कोई भी बाध्यकारी परिस्थितियां मौजूद नहीं थीं।
हाईकोर्ट ने निवारक हिरासत और निवारक सुरक्षा कार्यवाही को नियंत्रित करने वाली वैधानिक व्यवस्था की जांच की और यह टिप्पणी की कि BNSS धारा 129 आपराधिक न्याय प्रणाली के भीतर एक नियामक तंत्र है, जिसे व्यक्तियों से अच्छे आचरण के लिए मुचलके (Bonds) भरवाकर बार-बार होने वाले आपराधिक कृत्यों को रोकने के उद्देश्य से तैयार किया गया। कोर्ट ने यह भी कहा कि ऐसी कार्यवाहियां न्यायिक समीक्षा के अधीन होती हैं और इनका उद्देश्य संरचित कानूनी सुरक्षा उपायों के माध्यम से सामुदायिक सुरक्षा सुनिश्चित करना होता है।
इसकी तुलना पब्लिक सेफ्टी एक्ट के तहत निवारक हिरासत से करते हुए कोर्ट ने यह फैसला दिया कि ऐसी हिरासत एक असाधारण कार्यकारी उपाय है, जो सामान्य आपराधिक कार्यवाहियों से बिल्कुल अलग है। यह मानते हुए कि ये दोनों उपाय साथ-साथ चल सकते हैं, कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि निवारक हिरासत (Preventive Detention) का इस्तेमाल मशीनी तरीके से, या आम कानूनी उपायों के विकल्प के तौर पर नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने कहा,
"जब कोई व्यक्ति पहले से ही हिरासत में हो या BNSS की धारा 129 के तहत कानूनी कार्रवाई का सामना कर रहा हो तो हिरासत में लेने वाले अधिकारी की यह ज़िम्मेदारी है कि वह खास तौर पर 'मजबूत कारणों' को दिखाए। साथ ही यह भी दिखाए कि उसने स्वतंत्र रूप से अपने विवेक का इस्तेमाल किया और यह रिकॉर्ड किया कि BNSS की धारा 129 के तहत सुरक्षा कार्रवाई उसे सार्वजनिक व्यवस्था के लिए नुकसानदायक गतिविधियों में शामिल होने से रोकने के लिए क्यों काफी नहीं थी।"
कोर्ट ने पाया कि इस मामले में न तो सिफारिश करने वाले अधिकारी ने और न ही हिरासत में लेने वाले अधिकारी ने ऐसे कोई कारण रिकॉर्ड किए, और न ही स्वतंत्र रूप से अपने विवेक का इस्तेमाल दिखाया। कोर्ट ने आगे यह भी कहा कि हिरासत का आदेश आने से कुछ ही दिन पहले BNSS की कार्रवाई के तहत हिरासत में लिए गए व्यक्ति को ज़मानत पर रिहा किया गया। फिर भी हिरासत के कारणों में इस कार्रवाई के असर या नतीजों के बारे में कोई ज़िक्र नहीं था—जिसमें यह बात भी शामिल है कि क्या कोई बॉन्ड भरा गया, या उसका उल्लंघन हुआ। कोर्ट के अनुसार, यह चूक इस बात को दिखाती है कि संबंधित सामग्री पर ठीक से विचार नहीं किया गया।
इसके अलावा, यह कहते हुए कि "कानून की स्थापित स्थिति पर कोई भी आपत्ति नहीं उठा सकता कि राज्य की सुरक्षा और सार्वजनिक शांति व व्यवस्था बनाए रखना प्रशासन का विशेष अधिकार क्षेत्र है," अदालत ने फिर भी आगाह किया कि "यह कानून का शासन ही है जो हिरासत में लेने वाले अधिकारियों को इस तरह से कार्य करने के लिए प्रेरित करे जो निष्पक्ष और उचित हो, और जिसमें भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 में निहित जीवन और स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार की अवधारणा का उचित ध्यान रखा गया हो।"
अदालत ने आगे यह भी जोड़ा,
"किसी नागरिक की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को कार्यपालिका के केवल मनगढ़ंत दावों के आधार पर सीमित नहीं किया जा सकता।"
अदालत ने इस बात पर भी ज़ोर दिया,
"कार्यपालिका को किसी व्यक्ति के पंख कतरने के लिए 'निवारक हिरासत' (Preventive Detention) का इस्तेमाल लापरवाही भरे ढंग से करने की अनुमति नहीं दी जा सकती, जब तक कि कोई ऐसी आपातकालीन स्थिति न हो जिसे सामान्य कानूनों के तहत हल न किया जा सकता हो।"
साथ ही, अदालत ने इस बात को भी रेखांकित किया,
"यह प्रशासन का केवल मनमाना आदेश (ipse dixit) नहीं हो सकता।"
हाईकोर्ट ने यह निष्कर्ष निकाला कि हिरासत का आदेश, ठोस कारणों के अभाव और स्वतंत्र रूप से विवेक का इस्तेमाल न किए जाने के कारण दोषपूर्ण था; विशेष रूप से, BNSS धारा 129 के तहत चल रही कार्यवाही के संदर्भ में।
तदनुसार, हिरासत का आदेश रद्द किया गया और याचिकाकर्ता को तत्काल हिरासत से रिहा करने का निर्देश दिया गया।
Case Title: Mohd. Kabir v. Union Territory of J&K & Ors.