नेशनल हाईवेज़ अधिग्रहण | पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने बढ़ी हुई मुआवज़े की रकम पर ज़्यादा ब्याज़ देने का फ़ैसला सुनाया

Update: 2026-05-16 03:48 GMT

पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने फ़ैसला सुनाया कि जिन ज़मीन मालिकों की ज़मीन नेशनल हाईवेज़ एक्ट के तहत अधिग्रहित की जाती है, वे 'भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन में उचित मुआवज़े और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम, 2013' के ज़्यादा फ़ायदेमंद प्रावधानों के तहत ब्याज़ पाने के हकदार हैं, न कि सिर्फ़ 1956 के एक्ट के सीमित दायरे के तहत।

ज़मीन मालिकों की तरफ़ से दायर याचिका को मंज़ूर करते हुए जस्टिस हरकेश मनुजा ने "एक आर्बिट्रल अवार्ड में बदलाव करते हुए 2013 के एक्ट की धारा 72 के मुताबिक ज़मीन पर कब्ज़ा लेने की तारीख से बढ़ी हुई मुआवज़े की रकम पर पहले साल के लिए 9% सालाना और उसके बाद 15% सालाना की दर से ब्याज़ देने का आदेश दिया। कोर्ट ने यह भी फ़ैसला सुनाया कि 2013 के एक्ट की धारा 80 के तहत ब्याज़, सक्षम अधिकारी द्वारा तय की गई मूल मुआवज़े की रकम पर ही दिया जाएगा।"

कोर्ट ने आगे कहा,

"आर्बिट्रेशन और सुलह एक्ट, 1996 के तहत दिए गए आर्बिट्रल अवार्ड के ख़िलाफ़ रिट अधिकार क्षेत्र के तहत दखल देने का दायरा बेशक सीमित है, लेकिन यही सिद्धांत नेशनल हाईवेज़ एक्ट, 1956 के तहत की गई आर्बिट्रेशन की कार्यवाही पर उतनी ही सख्ती से लागू नहीं किया जा सकता। बाद वाला एक्ट एक तरह के वैधानिक आर्बिट्रेशन की बात करता है, जिसमें आर्बिट्रेटर की नियुक्ति केंद्र सरकार करती है; यह 1996 के एक्ट की धारा 10 और 11 के तहत होने वाले आपसी सहमति वाले आर्बिट्रेशन से अलग है, जहां आर्बिट्रेटर की नियुक्ति मुख्य रूप से विवाद करने वाले पक्षों की अपनी मर्ज़ी पर आधारित होती है। साथ ही यह देखते हुए कि ऐसे आर्बिट्रेटर खुद केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त किए जाते हैं, किसी तरह के संस्थागत पक्षपात या पूरी तरह से निष्पक्ष न होने की आशंका को पूरी तरह से नकारा नहीं जा सकता।"

ऐसे हालात में कोर्ट ने साफ़ किया,

"भारत के संविधान के अनुच्छेद 226/227 के तहत अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करने वाला एक रिट कोर्ट, पीड़ित ज़मीन मालिक को न्याय, निष्पक्षता और समानता दिलाने के लिए ज़्यादा व्यापक निगरानी करने का अधिकार रखता है।"

याचिकाकर्ताओं ने 27 अक्टूबर, 2025 के आर्बिट्रल अवार्ड को इस सीमित हद तक चुनौती दी थी कि उसने 2013 के एक्ट के तहत वैधानिक योजना को लागू करने के बजाय सिर्फ़ आवेदन जमा करने की तारीख से लेकर मुआवज़े की रकम जमा होने की तारीख तक ही 9% की दर से ब्याज़ दिया था। गुरदासपुर के टिब्बर गांव में उनकी ज़मीन को दिल्ली-अमृतसर-कटरा नेशनल हाईवे प्रोजेक्ट के लिए अधिग्रहित कर लिया गया। हालांकि, आर्बिट्रेटर ने मुआवज़ा बढ़ा दिया था, लेकिन ज़्यादा ब्याज का फ़ायदा देने से मना किया गया।

कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं की दलील में दम पाया, और कहा कि ब्याज "उचित मुआवज़े" का एक ज़रूरी हिस्सा है और नेशनल हाईवे एक्ट के तहत किसी संकीर्ण प्रावधान को लागू करके इसे कम नहीं किया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले यूनियन ऑफ़ इंडिया बनाम तरसेम सिंह पर भरोसा करते हुए कोर्ट ने दोहराया कि अलग-अलग अधिग्रहण कानूनों के तहत ज़मीन मालिकों के साथ मुआवज़े के मामलों में, जिसमें सोलेशियम और ब्याज भी शामिल हैं, असमान व्यवहार नहीं किया जा सकता।

कोर्ट ने आगे कहा कि आर्बिट्रेटर ने "कानून की साफ़-साफ़ ग़लती" की है, क्योंकि उसने उसी गाँव के वैसे ही हालात वाले दूसरे ज़मीन मालिकों से जुड़े पिछले फ़ैसलों से हटकर फ़ैसला दिया, जहां ब्याज की ज़्यादा दरें दी गई थीं। कोर्ट ने कहा कि समानता न देने से एक मनमाना और भेदभावपूर्ण नतीजा निकला, जो संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है।

रिट याचिका की स्वीकार्यता पर उठाई गई आपत्ति खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा कि आर्बिट्रेशन और सुलह एक्ट की धारा 34 के तहत वैकल्पिक उपाय बेअसर होगा, क्योंकि यह सिर्फ़ फ़ैसला रद्द करने की इजाज़त देता है, उसमें बदलाव करने की नहीं। इस मामले में मामले को वापस भेजना सिर्फ़ मुक़दमे को लंबा खींचना होगा, जिसका कोई फ़ायदा नहीं होगा।

कोर्ट ने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि नेशनल हाईवे एक्ट के तहत आर्बिट्रेशन एक तरह का वैधानिक आर्बिट्रेशन है, जहां आर्बिट्रेटर की नियुक्ति सरकार करती है। इसलिए निष्पक्षता और समानता सुनिश्चित करने के लिए न्यायिक समीक्षा का दायरा व्यापक होना चाहिए।

तदनुसार, कोर्ट ने आर्बिट्रेशन के फ़ैसले में बदलाव किया और अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे 2013 के एक्ट की धारा 72 और 80 के अनुसार ब्याज दें। यह फ़ैसला दिया कि याचिकाकर्ता भी वैसे ही फ़ायदों के हकदार हैं जैसे उसी तरह के हालात वाले दूसरे ज़मीन मालिक हैं।

इसलिए इन निर्देशों के साथ याचिका का निपटारा किया गया।

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