रिमिशन योजनाएं कैदियों को अच्छे व्यवहार के लिए प्रेरित करती हैं: पटना हाईकोर्ट, आजीवन कारावासियों की याचिका पर पुनर्विचार का निर्देश

Update: 2026-03-17 08:12 GMT

सुधारात्मक उद्देश्य के लिए जरूरी हैं रिमिशन योजनाएं, बिहार हाईकोर्ट ने दो आजीवन कारावास भुगत रहे दोषियों की याचिका पर पुनर्विचार का निर्देश दिया।

पटना हाईकोर्ट ने कहा है कि रिमिशन (सजा में छूट) योजनाएं आपराधिक न्याय प्रणाली के सुधारात्मक पहलू का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं और यह कैदियों को अच्छा आचरण बनाए रखने के लिए प्रेरित करती हैं। अदालत ने इस आधार पर बिहार राज्य सजा माफी समीक्षा बोर्ड (State Sentence Remission Review Board) को दो दोषियों की रिमिशन याचिका पर पुनर्विचार करने का निर्देश दिया।

जस्टिस जितेंद्र कुमार की एकल पीठ ने यह आदेश उन याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए दिया, जिनमें 5 मार्च 2020 के उस आदेश को चुनौती दी गई थी, जिसके जरिए बोर्ड ने याचिकाकर्ताओं की रिमिशन की मांग खारिज कर दी थी।

पुरा मामला

याचिकाकर्ता मो. सुल्तान और तबस्सुम अरा को बेगूसराय के फास्ट ट्रैक कोर्ट ने वर्ष 2005 में बच्चों के अपहरण और फिरौती के मामले में दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। बाद में हाईकोर्ट ने भी उनकी सजा को बरकरार रखा था।

दोनों दोषी 22 अक्टूबर 2002 से जेल में हैं और अब तक 23 वर्ष से अधिक की सजा काट चुके हैं। जेल अधीक्षक ने उनके सुधरे हुए आचरण के आधार पर रिमिशन की सिफारिश की थी, लेकिन पुलिस अधीक्षक, प्रोबेशन अधिकारी और ट्रायल कोर्ट ने अपराध की गंभीरता का हवाला देकर इसका विरोध किया।

याचिकाकर्ताओं की दलील

याचिकाकर्ताओं ने कहा कि बोर्ड का निर्णय मनमाना (arbitrary) है, क्योंकि जेल अधीक्षक ही कैदी के व्यवहार का सही आकलन कर सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि उनकी उम्र क्रमशः 75 और 70 वर्ष हो चुकी है और इतने लंबे समय तक कारावास के बाद उन्हें रिहाई का लाभ मिलना चाहिए।

राज्य का पक्ष

राज्य सरकार ने दलील दी कि अपराध अत्यंत गंभीर था—दोषियों ने चार बच्चों का अपहरण कर उन्हें पांच महीने तक सुरंग में बंद रखा। इसलिए उन्हें रिमिशन नहीं दिया जा सकता और उनका मामला उन गंभीर अपराधों जैसा है जहां रिमिशन निषिद्ध है।

अदालत की टिप्पणी

हाईकोर्ट ने कहा कि रिमिशन का उद्देश्य केवल सजा कम करना नहीं, बल्कि कैदियों के सुधार और पुनर्वास को बढ़ावा देना है। अदालत ने कहा:

जेल सुधारात्मक और पुनर्वास केंद्र हैं, न कि केवल दंड देने के स्थान

रिमिशन योजनाएं कैदियों को बेहतर व्यवहार और आत्म-सुधार के लिए प्रेरित करती हैं

सुधारित कैदियों को समाज में उपयोगी सदस्य के रूप में वापस लाना ही इसका उद्देश्य है

अदालत ने पाया कि रिमिशन बोर्ड ने केवल अपराध की गंभीरता पर जोर दिया और उन महत्वपूर्ण कारकों पर विचार नहीं किया, जैसे—

भविष्य में अपराध दोहराने की संभावना

कैदी के सुधार का स्तर

समाज में पुनर्वास की संभावना

परिवार की सामाजिक-आर्थिक स्थिति

कोर्ट ने यह भी कहा कि उपलब्ध रिकॉर्ड में ऐसा कोई ठोस आधार नहीं है जिससे यह साबित हो कि याचिकाकर्ता भविष्य में अपराध करेंगे।

निर्णय

हाईकोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता अब उम्रदराज हो चुके हैं और अपराध करने की क्षमता खो चुके हैं, इसलिए उन्हें जेल में और रखने का कोई सार्थक उद्देश्य नहीं है।

अदालत ने 5 मार्च 2020 के रिमिशन बोर्ड के आदेश को रद्द कर दिया और निर्देश दिया कि बोर्ड याचिकाकर्ताओं की रिमिशन याचिका पर 15 मई 2026 तक पुनर्विचार कर कानून के अनुसार निर्णय ले।

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