देश का पेट भरने वाले किसान को आपदा में अकेला नहीं छोड़ा जा सकता: पटना हाईकोर्ट
पटना हाईकोर्ट ने कहा कि प्राकृतिक आपदा से फसल बर्बाद होने वाले किसानों को केवल प्रक्रियात्मक कारणों के आधार पर मुआवजे से वंचित नहीं किया जा सकता।
अदालत ने टिप्पणी की कि देश का पेट भरने वाले किसान को संकट के समय अपने हाल पर नहीं छोड़ा जा सकता।
चीफ जस्टिस संगम कुमार साहू और जस्टिस हरीश कुमार की खंडपीठ फसल क्षति से जुड़े मुआवजे के मामले पर सुनवाई कर रही थी।
सुनवाई के दौरान बिहार कृषि विभाग के निदेशक, मुजफ्फरपुर के जिलाधिकारी, जिला कृषि पदाधिकारी और साहेबगंज के प्रखंड विकास पदाधिकारी वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए अदालत के समक्ष उपस्थित हुए।
अदालत को बताया गया कि मुजफ्फरपुर के जिलाधिकारी ने पहले फसल नुकसान का आकलन कर अंतरिम मुआवजे की रिपोर्ट सौंपी थी लेकिन कृषि विभाग ने यह कहते हुए आगे कार्रवाई नहीं की कि रबी सीजन शुरू हो चुका है।
कृषि विभाग के निदेशक ने अदालत को बताया कि मुआवजा वितरण की प्रक्रिया प्रत्यक्ष लाभ अंतरण प्रणाली के माध्यम से संचालित की गई थी। योजना के तहत आवेदन पोर्टल 2 दिसंबर 2025 तक खुला था और तय समय सीमा में आवेदन करने वाले पात्र किसानों को मुआवजा दिया जा चुका है।
अदालत के समक्ष बताया गया कि अब तक कुल 1 लाख 11 हजार 861 किसानों को फसल नुकसान के लिए 33 करोड़ 25 लाख रुपये से अधिक की राशि वितरित की गई।
जागरूकता कार्यक्रमों को लेकर पूछे गए सवाल पर कृषि विभाग ने कहा कि गांव स्तर पर कर्मचारियों और किसान सलाहकारों के जरिए अभियान चलाए गए। साथ ही 15 नवंबर 2025 को स्थानीय समाचार पत्रों में भी सार्वजनिक सूचना प्रकाशित की गई।
हाईकोर्ट ने यह भी नोट किया कि कृषि विभाग ने अब तीन सदस्यीय समिति गठित की, जो प्रभावित पंचायतों में जाकर उन किसानों की पहचान करेगी जिनके दावे अब तक लंबित या अनदेखे रह गए। समिति को मौके पर जांच कर फसल नुकसान का आकलन करने और 15 दिनों के भीतर समेकित रिपोर्ट देने का निर्देश दिया गया।
अदालत ने कहा कि यदि जांच में ऐसे किसान पात्र पाए जाते हैं, जिन्हें अब तक मुआवजा नहीं मिला है, तो उन्हें शीघ्र भुगतान सुनिश्चित किया जाए। साथ ही प्रशासन को निर्देश दिया गया कि व्यापक जागरूकता अभियान चलाकर प्रभावित किसानों को समिति के समक्ष उपस्थित होने की जानकारी दी जाए।
पटना हाईकोर्ट ने कहा,
“यह कहना आवश्यक है कि पूरे देश का पेट भरने वाले किसान को तब अपने हाल पर नहीं छोड़ा जा सकता, जब प्राकृतिक आपदा उसकी फसल को तबाह कर दे।”
अदालत ने आगे कहा कि फसल नुकसान का आकलन होने के बावजूद राहत न देना किसानों के आजीविका के अधिकार का उल्लंघन है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि कोई भी वास्तविक और पात्र किसान केवल प्रक्रियात्मक अड़चनों के कारण मुआवजे से वंचित नहीं रहना चाहिए।
मामले की अगली सुनवाई 24 जून 2026 को होगी। अदालत ने बिहार कृषि विभाग के निदेशक को निर्देश दिया कि वह अगली तारीख तक लंबित मामलों, फसल नुकसान की स्थिति और पात्र किसानों को वितरित मुआवजे का विस्तृत हलफनामा दाखिल करें।