सार्वजनिक जगह पर अपमान साबित हुए बिना केवल जातिसूचक शब्द बोलना SC/ST Act के तहत अपराध नहीं: पटना हाईकोर्ट

Update: 2026-05-18 12:01 GMT

पटना हाईकोर्ट ने अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम (SC/ST Act) और भारतीय दंड संहिता (IPC) के तहत दर्ज आपराधिक कार्यवाही को रद्द करते हुए कहा कि केवल जातिसूचक शब्द बोल देना या सामान्य गाली-गलौज करना, यदि वह सार्वजनिक दृष्टि में न हो तो अपने आप SC/ST Act के तहत अपराध नहीं माना जा सकता।

जस्टिस अनिल कुमार सिन्हा की सिंगल बेंच उस याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें 27 सितंबर 2023 को विशेष जज, SC/ST Act, सारण, छपरा द्वारा संज्ञान लेने के आदेश को चुनौती दी गई थी।

मामले में आरोपियों के खिलाफ IPC की विभिन्न धाराओं के साथ-साथ SC/ST Act की धाराएं 3(आर), 3(एस), 3(डब्ल्यू) और 3(2)(वीए) के तहत मामला दर्ज किया गया था।

FIR के अनुसार शिकायतकर्ता कलावती देवी दिवंगत रामजी सिंह के घर में रहकर उनकी कृषि भूमि की देखभाल करती थीं। आरोप था कि जून 2019 में रामजी सिंह के बेटे मनीष कुमार की शादी शालिनी शर्मा से होने के बाद आरोपियों ने शिकायतकर्ता को जातिसूचक शब्दों से अपमानित करना शुरू कर दिया और घर खाली करने की धमकी दी।

FIR में यह भी आरोप लगाया गया कि 29 जून 2020 को आरोपियों ने शिकायतकर्ता के साथ मारपीट की, बाल पकड़कर सड़क पर घसीटा, साड़ी फाड़ दी और उनके पति के साथ भी मारपीट की। साथ ही बंदूक दिखाकर घर खाली करने की धमकी दी गई।

हाईकोर्ट में आरोपियों की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट ने दलील दी कि यह मामला दुर्भावनापूर्ण तरीके से दर्ज कराया गया और यह केवल प्रतिशोध की कार्रवाई है। उन्होंने कहा कि आरोपी शालिनी शर्मा ने इससे पहले 20 जनवरी 2020 को जयपुर महिला थाने में अपने पति और ससुराल पक्ष के खिलाफ दहेज उत्पीड़न का मामला दर्ज कराया था।

याचिकाकर्ताओं ने अदालत के समक्ष सीसीटीवी फुटेज, बायोमेट्रिक उपस्थिति रिकॉर्ड, राशन कार्ड, ईएसआई रिकॉर्ड और शैक्षणिक प्रमाणपत्र पेश कर यह दिखाने का प्रयास किया कि घटना के समय सभी आरोपी जयपुर, राजस्थान में मौजूद थे और लंबे समय से वहीं रह रहे हैं।

हाईकोर्ट ने पाया कि वैवाहिक विवाद और दहेज उत्पीड़न की शिकायत पहले दर्ज हुई, जबकि वर्तमान FIR बाद में दर्ज कराई गई।

अदालत ने कहा,

“FIR प्रतिशोध की कार्रवाई प्रतीत होती है और आरोपियों को परेशान करने के लिए झूठे एवं दुर्भावनापूर्ण अभियोजन का माध्यम बनाई गई।”

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि FIR से यह स्पष्ट नहीं होता कि कथित जातिसूचक टिप्पणियां शिकायतकर्ता को सार्वजनिक रूप से अपमानित करने के उद्देश्य से सार्वजनिक दृष्टि में की गईं।

अदालत ने कहा,

“केवल जाति का नाम लेना या सामान्य गाली देना, खासकर जब वह सार्वजनिक दृष्टि में न हो, SC/ST Act की धारा 3(आर) और 3(एस) के तहत स्वतः अपराध नहीं बनता।”

अदालत ने रिकॉर्ड पर मौजूद इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों, जैसे सीसीटीवी फुटेज और बायोमेट्रिक रिकॉर्ड, को निर्विवाद दस्तावेज मानते हुए महत्वपूर्ण माना। अदालत ने यह भी नोट किया कि एक आरोपी पक्षाघात से पीड़ित था और पूरा परिवार लगातार जयपुर में रह रहा था।

जांच पर टिप्पणी करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि आरोपपत्र अत्यंत संक्षिप्त और औपचारिक था, जिसमें केवल धाराएं दोहरा दी गईं लेकिन आरोपों के समर्थन में ठोस तथ्य और साक्ष्य नहीं दिए गए।

अदालत ने यह भी कहा कि कथित घटना देशव्यापी कोविड लॉकडाउन के दौरान हुई, जब यात्रा पर कड़े प्रतिबंध लागू थे। ऐसे में जयपुर से 1000 किलोमीटर दूर बिहार के सारण पहुंचकर घटना करने का आरोप और भी संदिग्ध लगता है।

हाईकोर्ट ने कहा,

“यह कल्पना से परे है कि आरोपी जयपुर से बिहार के सारण तक यात्रा कर कथित घटना को अंजाम देंगे।”

अंत में अदालत ने कहा कि इस आपराधिक कार्यवाही को जारी रखना अदालत की प्रक्रिया का दुरुपयोग और निजी प्रतिशोध को बढ़ावा देना होगा। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने संज्ञान आदेश और गड़खा थाना कांड संख्या 298/2020 से जुड़ी पूरी आपराधिक कार्यवाही रद्द की।

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