हिंदू विवाह अधिनियम | धारा 13B में 'अलग रहना' का मतलब सिर्फ अलग घर में रहना नहीं, बल्कि पति-पत्नी के रिश्ते खत्म होना: पटना हाईकोर्ट
पटना हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि Hindu Marriage Act, 1955 की धारा 13B के तहत “अलग रहना” (living separately) का अर्थ केवल शारीरिक दूरी नहीं, बल्कि वैवाहिक दायित्वों का पूर्ण रूप से समाप्त होना है। कोर्ट ने उस मामले में आपसी सहमति से तलाक की याचिका खारिज करने के फैसले को बरकरार रखा, जिसमें पक्षकारों ने वैधानिक अवधि के भीतर वैवाहिक संबंध फिर से स्थापित कर लिए थे।
जस्टिस नानी तागिया और जस्टिस आलोक कुमार पांडेय की खंडपीठ यह अपील सुन रही थी, जो 6 जून 2023 को शियोहर फैमिली कोर्ट द्वारा पारित आदेश के खिलाफ दायर की गई थी।
मामले के अनुसार, पक्षकारों का विवाह 28 अप्रैल 2021 को हुआ था और उनके एक बच्ची का जन्म 19 मार्च 2022 को हुआ। वैवाहिक विवाद के चलते मार्च 2022 से दोनों अलग रहने लगे और आपसी सहमति से तलाक का निर्णय लिया। इसके तहत 11 मई 2023 को धारा 13B के तहत संयुक्त याचिका दायर की गई, जिसमें पति द्वारा ₹20 लाख स्थायी भरण-पोषण और ₹2 लाख बच्चे के लिए देने पर सहमति बनी।
हालांकि, कार्यवाही के दौरान पति ने स्वीकार किया कि उसने 15 मार्च 2023 को पत्नी के साथ वैवाहिक संबंध स्थापित किए थे, जो याचिका दाखिल करने से दो महीने पहले की बात थी। इस आधार पर फैमिली कोर्ट ने माना कि एक वर्ष तक लगातार अलग रहने की वैधानिक शर्त पूरी नहीं हुई और याचिका खारिज कर दी।
हाईकोर्ट ने कहा कि “अलग रहना” का अर्थ है पति-पत्नी के रूप में न रहना, चाहे वे एक ही घर में हों या अलग-अलग स्थानों पर। इसके लिए जरूरी है कि वैवाहिक संबंध पूरी तरह समाप्त हो चुके हों और पुनः साथ रहने का इरादा न हो।
कोर्ट ने पाया कि पति द्वारा वैवाहिक संबंध पुनः स्थापित करने की स्वीकारोक्ति धारा 13B की आवश्यक शर्त के विपरीत है और इससे यह स्पष्ट होता है कि वैवाहिक संबंध जारी थे। इसलिए फैमिली कोर्ट का फैसला सही ठहराया गया और अपील खारिज कर दी गई।
हालांकि, अपील के दौरान 17 फरवरी 2026 को दायर संयुक्त समझौता याचिका को ध्यान में रखते हुए कोर्ट ने पक्षकारों को चार सप्ताह के भीतर नई याचिका दायर करने की अनुमति दी और फैमिली कोर्ट को निर्देश दिया कि वह इसे कानून के अनुसार नए सिरे से विचार करे।