बोली की वैधता खत्म होने के बाद टेंडर से अयोग्यता को चुनौती देने का अधिकार लागू नहीं रहता: पटना हाईकोर्ट
पटना हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि किसी टेंडर की बोली की वैधता अवधि समाप्त हो जाने के बाद बोलीदाता को तकनीकी अयोग्यता के खिलाफ कोई प्रभावी राहत नहीं दी जा सकती। अदालत ने कहा कि ऐसी स्थिति में अयोग्यता को चुनौती देने का विवाद व्यावहारिक रूप से केवल शैक्षणिक मुद्दा बनकर रह जाता है।
जस्टिस सुधीर सिंह और जस्टिस शैलेन्द्र सिंह की खंडपीठ रिट याचिका पर सुनवाई कर रही थी। यह याचिका पटना डिवीजन में ऑप्टिकल फाइबर केबल बिछाने और उससे जुड़े कार्यों के लिए जारी टेंडर में तकनीकी रूप से अयोग्य घोषित किए जाने के खिलाफ दायर की गई।
अदालत ने कहा,
“बोली की वैधता अवधि वही समय सीमा तय करती है, जिसके दौरान बोली स्वीकार किए जाने योग्य और कानूनी रूप से प्रभावी रहती है। इस अवधि के समाप्त होते ही बोली अपनी कानूनी मान्यता खो देती है और बोलीदाता के पक्ष में कोई लागू करने योग्य अधिकार शेष नहीं रहता।”
याचिकाकर्ता कंपनी का कहना था कि उसने अनुभव प्रमाणपत्र, अनुबंध और कार्यादेश सहित सभी जरूरी दस्तावेज जमा किए। कंपनी ने आरोप लगाया कि केवल सहायक कार्यादेश प्रस्तुत न करने के आधार पर उसे अयोग्य ठहराना मनमाना निर्णय था और अधिकारियों ने बिना उचित विचार के फैसला लिया।
इसके समर्थन में कंपनी ने जगदीश मंडल बनाम उड़ीसा राज्य और पोडार स्टील कॉरपोरेशन बनाम गणेश इंजीनियरिंग वर्क्स मामलों का हवाला दिया।
वहीं प्रतिवादी पक्ष ने अदालत को बताया कि याचिकाकर्ता ने निर्धारित समय सीमा के भीतर अनुभव प्रमाणपत्रों से संबंधित अनिवार्य कार्यादेश अपलोड नहीं किए। साथ ही यह भी कहा गया कि 21 फरवरी 2025 से शुरू हुई 150 दिनों की बोली वैधता अवधि जुलाई 2025 में समाप्त हो चुकी है, इसलिए याचिका अब निष्प्रभावी हो गई।
रिकॉर्ड का अवलोकन करने के बाद हाईकोर्ट ने पाया कि निविदा सूचना में स्पष्ट रूप से कहा गया था कि प्रत्येक वित्तीय वर्ष के लिए अनुभव प्रमाणपत्रों के साथ संबंधित अनुबंध और कार्यादेश जमा करना अनिवार्य होगा। अदालत ने माना कि याचिकाकर्ता ने कुछ समझौते और प्रमाणपत्र तो जमा किए, लेकिन उनसे संबंधित आवश्यक कार्यादेश समय पर प्रस्तुत नहीं किए।
खंडपीठ ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता की आपत्तियों पर विभाग ने विचार किया और संबंधित अधिकारियों से रिपोर्ट मंगाने के बाद ही बोली को अनिवार्य शर्तों के अनुरूप न मानने का फैसला लिया गया। इसलिए निर्णय प्रक्रिया में किसी तरह की मनमानी या लापरवाही नहीं पाई गई।
अदालत ने जोर देकर कहा कि बोली की वैधता अवधि समाप्त होने के बाद टेंडर अपनी प्रभावशीलता खो चुका है। ऐसे में यदि याचिकाकर्ता की दलीलों में कुछ दम भी मान लिया जाए, तब भी अब कोई व्यावहारिक राहत नहीं दी जा सकती।
हाईकोर्ट ने कहा कि इस चरण में बोली पर दोबारा विचार करने या याचिकाकर्ता को फिर से टेंडर प्रक्रिया में शामिल करने का निर्देश देना “व्यावहारिक और कानूनी रूप से असंभव” होगा।
इन्हीं टिप्पणियों के साथ अदालत ने रिट याचिका खारिज की।