पार्टियां सिंगल जज के सामने यह मान लेने के बाद कि मामला किसी बाध्यकारी मिसाल के दायरे में आता है, इंट्रा-कोर्ट अपील में उन मुद्दों को दोबारा नहीं उठा सकतीं: पटना हाईकोर्ट
पटना हाईकोर्ट ने यह फैसला दिया कि एक बार जब पार्टियाँ सिंगल जज के सामने यह मान लेती हैं कि कोई मुद्दा किसी बाध्यकारी मिसाल से पहले ही तय हो चुका है तो वे बाद में इंट्रा-कोर्ट अपील में उसी मुद्दे को दोबारा नहीं उठा सकतीं; कोर्ट ने इस बात को दोहराया कि किसी फैसले में दर्ज बयान पार्टियों पर बाध्यकारी होते हैं।
जस्टिस सुधीर सिंह और जस्टिस राजेश कुमार वर्मा की डिवीज़न बेंच CWJC नंबर 14725/2023 में एक सिंगल जज द्वारा 08.04.2024 को पारित आदेश को चुनौती देने वाली लेटर्स पेटेंट अपील पर सुनवाई कर रही थी।
रिट याचिकाकर्ताओं (प्रतिवादी) ने बिहार सरकार के शिक्षा विभाग द्वारा 31.08.2013 को जारी प्रस्ताव संख्या 970 के खंड 6 को चुनौती दी थी। इस प्रस्ताव के तहत गैर-सरकारी मान्यता प्राप्त सहायता प्राप्त संस्कृत स्कूलों और मदरसों के उन शिक्षण और गैर-शिक्षण कर्मचारियों को, जिनकी नियुक्ति 15.02.2011 को या उसके बाद हुई, एक निश्चित वेतन पर रखा गया। सिंगल जज ने पिछली डिवीज़न बेंच के फैसलों पर भरोसा करते हुए रिट याचिका स्वीकार की और प्रस्ताव के संबंधित हिस्सा रद्द करते हुए परिणामी लाभ भी प्रदान किए।
डिवीज़न बेंच के सामने राज्य सरकार ने यह तर्क दिया कि CWJC नंबर 985/2015 में दिए गए पिछले फैसले के खिलाफ पुनर्विचार याचिका (Review Petition) दायर की गई, जिसे सुनवाई में आगे न बढ़ने (Non-Prosecution) के कारण खारिज किया गया और अब उसे बहाल करने (Restoration) का आवेदन लंबित है। यह तर्क दिया गया कि लंबित बहाली आवेदन को देखते हुए सिंगल जज को रिट याचिका पर सुनवाई तब तक के लिए स्थगित (Abeyance) कर देनी चाहिए थी।
इसके विपरीत, प्रतिवादियों ने यह दलील दी कि यह मुद्दा डिवीज़न बेंच के बाध्यकारी फैसलों द्वारा पहले ही पूरी तरह से सुलझाया जा चुका है। सिंगल जज ने केवल स्थापित कानून का पालन किया। यह तर्क दिया गया कि अपीलीय क्षेत्राधिकार में किसी भी हस्तक्षेप की कोई आवश्यकता नहीं थी।
कोर्ट ने इस सीमित मुद्दे को इस प्रकार निर्धारित किया कि क्या विवादित आदेश में—जो कि वकीलों की इस सहमति के आधार पर पारित किया गया कि मुद्दा पहले ही सुलझाया जा चुका है—इंट्रा-कोर्ट अपीलीय क्षेत्राधिकार के तहत कोई हस्तक्षेप किया जा सकता है।
रिकॉर्ड की जांच करने पर कोर्ट ने यह पाया कि सिंगल जज ने विशेष रूप से यह दर्ज किया कि दोनों पक्ष इस बात पर सहमत थे कि यह मुद्दा पिछली डिवीज़न बेंच के फैसलों द्वारा पहले ही सुलझाया जा चुका है। तदनुसार, उसी आधार पर रिट याचिका स्वीकार की गई।
State of Maharashtra v. Ramdas Shrinivas Nayak (1982) 2 SCC 463 पर भरोसा करते हुए न्यायालय ने दोहराया:
“यह भली-भांति स्थापित है कि किसी निर्णय में वकील द्वारा कही गई बात के रूप में जो कुछ भी दर्ज होता है, वह अंतिम और पक्षों पर बाध्यकारी होता है।”
उपर्युक्त सिद्धांत को लागू करते हुए न्यायालय ने यह माना कि ऐसी दर्ज की गई दलील की सत्यता को अपील में फिर से नहीं उठाया जा सकता, विशेष रूप से तब, जब यह दर्शाने के लिए कोई सामग्री उपलब्ध न हो कि वह रिकॉर्डिंग त्रुटिपूर्ण थी।
न्यायालय ने आगे यह भी टिप्पणी की:
“एक बार जब पक्षकारों ने सिंगल जज के समक्ष इस बात पर सहमति व्यक्त कर दी कि विवाद किसी बाध्यकारी नज़ीर (Precedent) द्वारा सुलझाया जा चुका है और उसी आधार पर आदेश पारित कर दिया गया तो अब अपीलकर्ताओं को एक 'इंट्रा-कोर्ट अपील' (न्यायालय के भीतर की अपील) में उसी मुद्दे को फिर से उठाने की अनुमति नहीं दी जा सकती।”
उपर्युक्त बातों के आलोक में न्यायालय को विवादित आदेश में कोई ऐसी अवैधता या त्रुटि नहीं मिली, जिसके लिए उसमें हस्तक्षेप करना आवश्यक हो। अतः न्यायालय ने अपील खारिज की।
Case Title: State of Bihar and Anr v. Sanjay Kumar Tiwari and Ors.