अनुशासनात्मक अथॉरिटी एक ही आदेश से एक साथ बड़ी और छोटी सज़ा नहीं दे सकती: पटना हाईकोर्ट

Update: 2026-01-15 14:10 GMT

पटना हाईकोर्ट ने कहा कि एक बड़ी सज़ा और एक छोटी सज़ा को एक ही मिले-जुले आदेश में "पैक" करके एक साथ नहीं दिया जा सकता।

जस्टिस संदीप कुमार की सिंगल जज बेंच एक डिप्टी सुपरिटेंडेंट ऑफ पुलिस द्वारा दायर रिट याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें सज़ा के आदेश को चुनौती दी गई। इस आदेश के तहत उन्हें पांच इंक्रीमेंट रोकने की सज़ा दी गई, जिसका असर आगे भी होता, साथ ही प्रमोशन की तय तारीख से पांच साल के लिए प्रमोशन पर रोक भी लगाई गई।

याचिकाकर्ता एक सब-डिविजनल पुलिस ऑफिसर है। उनको एक कथित अवैध खनन मामले में सप्लीमेंट्री जांच का काम सौंपा गया। आरोप है कि अवैध लेन-देन में शामिल अवैध पैसों को ज़ब्त करने के कदम उठाने के बजाय, याचिकाकर्ता ने बैंक खातों को डी-फ्रीज़ करने के लिए 'नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट' (NOC) जारी किया, जिसके परिणामस्वरूप आरोपी व्यक्तियों का पैसा जारी हो गया।

इस वजह से उन पर कर्तव्य में लापरवाही और संदिग्ध आचरण के लिए अनुशासनात्मक कार्यवाही शुरू की गई, जिसके परिणामस्वरूप ऊपर बताई गई बड़ी और छोटी सज़ाएं दी गईं।

याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि पांच इंक्रीमेंट को रोकने की सज़ा, जिसका असर आगे भी होता है, उसे बड़ी सज़ा के रूप में वर्गीकृत किया गया, जबकि प्रमोशन की तय तारीख से पांच साल के लिए प्रमोशन पर रोक बिहार CCA नियम, 2005 के नियम 14 के तहत एक छोटी सज़ा है। इस आधार पर यह तर्क दिया गया कि एक ही आदेश के माध्यम से दोनों सज़ाओं को देना कानून की नज़र में सही नहीं था।

हाईकोर्ट ने यूनियन ऑफ इंडिया और अन्य बनाम एस.सी. पराशर मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर भरोसा करते हुए कहा कि बड़ी और छोटी सज़ाओं को एक साथ मिलाकर एक ही आदेश के माध्यम से नहीं दिया जा सकता।

हाईकोर्ट ने कहा:

“मौजूदा मामले में भी अनुशासनात्मक अथॉरिटी ने विवादित आदेश के ज़रिए बड़ी और छोटी दोनों सज़ाएं एक साथ दी हैं, जो ऊपर बताए गए फैसले के मद्देनज़र गलत और कानून की नज़र में सही नहीं है। यहां तक कि प्रस्तावित सज़ा पर बिहार लोक सेवा आयोग द्वारा दी गई सहमति को देखने पर ऐसा लगता है कि हालांकि आयोग ने बड़ी और छोटी सज़ा का ज़िक्र किया, लेकिन प्रस्तावित सज़ा पर सहमति देने का कोई कारण नहीं बताया है, जो बड़ी और छोटी दोनों सज़ाओं का मिश्रण है।”

इसलिए कोर्ट ने कहा कि विवादित सज़ा का आदेश उस हद तक सही नहीं है, जहां तक उसने एक ही आदेश में बड़ी और छोटी सज़ा को मिला दिया। हालांकि, याचिकाकर्ता पर लगाए गए आरोपों की गंभीरता को देखते हुए कोर्ट ने सज़ा के आदेश में बदलाव किया और पांच इंक्रीमेंट रोकने की बड़ी सज़ा को बरकरार रखा, जिसका असर आगे भी रहेगा। साथ ही कोर्ट ने प्रमोशन की तय तारीख से पांच साल तक प्रमोशन पर रोक की छोटी सज़ा रद्द की।

Case Title: Manoj Kumar Sudhanshu v. State of Bihar & Ors.

Tags:    

Similar News