लंबित आपराधिक मामला मात्र से अयोग्यता नहीं, विज्ञापन की शर्तों का कड़ाई से पालन अनिवार्य: पटना हाईकोर्ट

Update: 2026-02-24 07:30 GMT

पटना हाइकोर्ट ने महत्वपूर्ण निर्णय में कहा कि यदि किसी अभ्यर्थी के विरुद्ध आपराधिक मामला लंबित है लेकिन आवेदन की तिथि तक उसमें आरोप तय नहीं हुए हैं तो मात्र इस आधार पर उसे पेट्रोलियम डीलरशिप के लिए अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता जब तक कि विज्ञापन में स्पष्ट रूप से ऐसी अयोग्यता का प्रावधान न हो।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि चयन प्रक्रिया का संचालन विज्ञापन से होता है। आवेदन प्रपत्र के आधार पर उसमें विस्तार या संशोधन नहीं किया जा सकता।

यह निर्णय जस्टिस संगम कुमार साहू और जस्टिस आलोक कुमार सिन्हा की खंडपीठ ने विनोद कुमार मिश्रा द्वारा दायर लेटर्स पेटेंट अपील पर सुनाया।

अपील 13.12.2024 के उस आदेश के विरुद्ध थी, जिसमें एकलपीठ ने उनकी याचिका खारिज कर दी थी।

याचिका में ब्रह्मपुर, जिला बक्सर में एसकेओ/एलडीओ डीलरशिप के लिए IOCL द्वारा की गई चयन प्रक्रिया को चुनौती दी गई।

चयन सूची में प्रतिवादी नम्बर 10 पहले स्थान पर और अपीलकर्ता दूसरे स्थान पर थे। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर पुनर्विचार के बाद भी 25.07.2008 की सूची में प्रतिवादी संख्या 10 को ही प्रथम स्थान दिया गया।

अपीलकर्ता का कहना था कि प्रतिवादी नंबर 10 ने आवेदन और शपथपत्र दाखिल करते समय अपने विरुद्ध लंबित आपराधिक मामले की जानकारी छिपाई।

उनका तर्क था कि विज्ञापन की धारा 4 और आवेदन पत्र के प्रावधानों के अनुसार लंबित आपराधिक मामलों, आरोप तय होने या दोषसिद्धि की जानकारी देना अनिवार्य था और गलत घोषणा पर अभ्यर्थिता निरस्त की जा सकती थी।

उन्होंने कहा कि बक्सर टाउन थाना कांड संख्या 197/1989 लंबित था और संज्ञान लिया जा चुका था। इसलिए जानकारी छिपाना चयन को अवैध बनाता है।

वहीं, प्रतिवादियों ने दलील दी कि विज्ञापन और चयन पुस्तिका के अनुसार अयोग्यता तभी उत्पन्न होती है, जब अभ्यर्थी दोषसिद्ध हो या सक्षम न्यायालय द्वारा आरोप तय किए गए हों।

आवेदन की तिथि और 2008 में पुनर्विचार के समय प्रतिवादी संख्या 10 के विरुद्ध आरोप तय नहीं हुए थे और न ही उन्हें दोषी ठहराया गया।

बाद में 05.07.2018 को आरोप तय हुए और 06.03.2020 को उन्हें दोषमुक्त कर दिया गया। इसलिए उस समय कोई तथ्य छिपाया नहीं गया था।

खंडपीठ ने कहा,

“अयोग्यता संबंधी शर्तों की व्याख्या करते समय किसी एक शब्द को उसके संदर्भ से अलग करके नहीं पढ़ा जा सकता।”

अदालत ने स्पष्ट किया,

“यदि धारा 4 में यह स्पष्ट रूप से नहीं कहा गया कि केवल प्राथमिकी दर्ज होना या आरोप तय होने से पूर्व लंबित मामला स्वतः अयोग्यता पैदा करेगा तो न्यायालय ऐसे शब्द जोड़ नहीं सकता।”

अदालत ने यह भी कहा,

“सार्वजनिक चयन की प्रक्रिया में विज्ञापन ही अधिकारों और दायित्वों का मूल दस्तावेज होता है।”

आवेदन प्रपत्र को केवल सहायक दस्तावेज बताते हुए कहा गया,

“विज्ञापन को किसी बाद के दस्तावेज द्वारा न तो कमजोर किया जा सकता है और न ही उसका दायरा बढ़ाया जा सकता है जब तक कि ऐसा संशोधन सभी अभ्यर्थियों के लिए समान रूप से अधिसूचित न हो।”

विलंब और निवेश के प्रश्न पर हाइकोर्ट ने कहा कि डीलरशिप लंबे समय से संचालित है और प्रतिवादी संख्या 10 ने भूमि विकास, अधोसंरचना, उपकरण और अन्य वैधानिक अनुपालनों पर भारी निवेश किया है।

अदालत ने माना कि ऐसे मामलों में न्यायालय लंबे समय से चले आ रहे व्यवस्थागत ढांचे को तब तक नहीं उलटते, जब तक कोई स्पष्ट और मूलभूत अवैधता सिद्ध न हो।

अंत में अपीलकर्ता द्वारा अपीलीय स्तर पर उठाए गए नए आधार को अदालत ने अस्वीकार कर दिया।

हाइकोर्ट ने कहा कि जो मुद्दा पहले नहीं उठाया गया उसे बाद में नहीं जोड़ा जा सकता। खंडपीठ ने एकलपीठ के आदेश में हस्तक्षेप से इनकार करते हुए अपील खारिज की।

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