'FIR में नाम आने पर सरकारी नौकरी से मना करने का एक जैसा तरीका निष्पक्षता के खिलाफ': पटना हाईकोर्ट

Update: 2026-04-01 15:31 GMT

पटना हाईकोर्ट ने फैसला दिया कि सिर्फ़ FIR पेंडिंग होने के आधार पर 'सील्ड कवर प्रक्रिया' (Sealed Cover Procedure) का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने दोहराया कि बिना जाँचे-परखे आरोपों के आधार पर नियुक्ति से मना करना संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 के तहत तय संवैधानिक सिद्धांतों का उल्लंघन है।

जस्टिस आलोक कुमार सिन्हा की सिंगल जज बेंच उन उम्मीदवारों की एक रिट याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिन्होंने बिहार लोक सेवा आयोग (BPSC) द्वारा प्राथमिक और माध्यमिक स्कूलों में शिक्षकों की नियुक्ति के लिए जारी विज्ञापन संख्या 22/2024 (दिनांक 07.02.2024) के तहत आवेदन किया।

याचिकाकर्ताओं ने बताया कि उन्होंने चयन प्रक्रिया में हिस्सा लिया था, 19.07.2024 और 20.07.2024 को हुई दोबारा परीक्षा में बैठे थे, और तय कट-ऑफ से ज़्यादा नंबर हासिल किए। इसके बावजूद, आयोग ने उनके नामों के आगे एक "स्टार मार्क" लगा दिया और 'आर्थिक अपराध थाना केस संख्या 06/2024' में उनके शामिल होने की वजह से उनके नतीजों को रोक दिया। यह तर्क दिया गया कि ऐसा करना 'सील्ड कवर प्रक्रिया' का गलत इस्तेमाल था। सिर्फ़ किसी आपराधिक मामले का पेंडिंग होना—खासकर जब कोई गलत काम साबित न हुआ हो—नियुक्ति से मना करने का आधार नहीं हो सकता।

दूसरी ओर, बिहार लोक सेवा आयोग ने दलील दी कि नतीजों को रोके रखना एक प्रशासनिक कदम था, जो परीक्षा का पेपर लीक होने के मामले में याचिकाकर्ताओं के शामिल होने की वजह से उठाया गया। आयोग ने बताया कि इस मामले में शामिल कई उम्मीदवार दोबारा परीक्षा में बैठे थे। साथ ही कानूनी सलाह के बाद आयोग ने भर्ती प्रक्रिया की पवित्रता बनाए रखने के लिए ऐसे उम्मीदवारों के नतीजों को टालने का फैसला किया था।

आयोग ने यह भी बताया कि याचिकाकर्ताओं पर अब गंभीर धाराओं—जिनमें IPC की धारा 420, 467, 468, 471, 120-B और 34 शामिल हैं—के तहत चार्जशीट दायर की जा चुकी है। साथ ही उन पर 'बिहार परीक्षा संचालन अधिनियम' और 'सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम' के प्रावधान भी लागू होते हैं।

शुरुआत में कोर्ट ने 'सील्ड कवर प्रक्रिया' का इस्तेमाल करने की वैधता की जाँच की। इसने दोहराया कि इस सिद्धांत को यांत्रिक रूप से लागू नहीं किया जाना चाहिए और इसे केवल तभी लागू किया जा सकता है, जब विभागीय कार्यवाही में कोई आरोप-पत्र (Charge Memo) या किसी आपराधिक मामले में आरोप-पत्र (Charge Sheet) औपचारिक रूप से जारी किया गया हो।

न्यायालय ने गौर किया कि संबंधित तिथि, यानी 15.11.2024 को, जब परिणाम प्रकाशित किया गया और रोक दिया गया, तब तक किसी सक्षम न्यायालय द्वारा कोई आरोप तय नहीं किया गया। साथ ही आरोप-पत्र केवल बाद में 18.02.2025 को दायर किया गया।

FIR में केवल नाम आने और औपचारिक अभियोजन के बीच के अंतर पर जोर देते हुए न्यायालय ने टिप्पणी की:

“एक ओर, FIR या जांच में केवल नाम आने और दूसरी ओर, आरोप-पत्र दायर करके तथा न्यायालय द्वारा संज्ञान लेकर/आरोप तय करके औपचारिक रूप से अभियोजन शुरू करने के बीच का अंतर केवल प्रक्रियात्मक नहीं है, बल्कि यह मामले की जड़ तक जाता है। 'सीलबंद लिफाफा' (Sealed Cover) सिद्धांत इस आधार पर टिका है कि एक ऐसी स्थिति मौजूद हो, जहां आरोप औपचारिक आरोपों में बदल चुके हों, जिनकी न्यायिक सुनवाई (Adjudication) आवश्यक हो। ऐसी स्थिति के अभाव में, उक्त सिद्धांत का सहारा लेना, बिना जांचे-परखे आरोपों के आधार पर किसी उम्मीदवार को दंडित करने जैसा होगा।”

न्यायालय ने फैसला सुनाया कि औपचारिक रूप से आरोप तय किए बिना 'सीलबंद लिफाफा' सिद्धांत को लागू करने की प्रतिवादियों की कार्रवाई कानूनी रूप से अस्थिर और मनमानी थी।

आपराधिक कार्यवाही लंबित होने के कारण नियुक्ति से इनकार करने के व्यापक मुद्दे पर न्यायालय ने दोहराया कि जो उम्मीदवार चयन प्रक्रिया को सफलतापूर्वक पूरा कर लेता है, उसे नियुक्ति की एक वैध अपेक्षा (Legitimate Expectation) प्राप्त हो जाती है। न्यायालय ने माना कि ऐसी अपेक्षा को केवल उन आरोपों के आधार पर समाप्त नहीं किया जा सकता, जिन्हें अभी तक कोई कानूनी अंतिम रूप (Legal Finality) प्राप्त नहीं हुआ।

'जोगिंदर सिंह बनाम केंद्र शासित प्रदेश चंडीगढ़' मामले पर भरोसा करते हुए न्यायालय ने फैसला सुनाया कि किसी आपराधिक मामले में केवल शामिल होना—बिना दोष सिद्ध हुए—अयोग्यता का कारण नहीं बन सकता। न्यायालय ने आगे यह भी टिप्पणी की कि आयोग ने FIR में नामित सभी उम्मीदवारों के साथ बिना किसी व्यक्तिगत मूल्यांकन के एक जैसा व्यवहार करके 'एकसमान दृष्टिकोण' (Blanket Approach) अपनाया था।

न्यायालय ने टिप्पणी की:

“यह अदालत आरोपों की प्रकृति और आर्थिक अपराध इकाई द्वारा बताए गए अपराध की गंभीरता से भी अवगत है। हालांकि, आरोपों की गंभीरता स्थापित कानूनी सिद्धांतों पर हावी नहीं हो सकती। नियोक्ता निश्चित रूप से उन मामलों में उचित दृष्टिकोण अपनाने का हकदार है जहाँ दोष सिद्ध हो चुका हो, या जहाँ उम्मीदवार का आचरण स्पष्ट रूप से ऐसा हो जो उसे सार्वजनिक रोज़गार के लिए अनुपयुक्त बनाता हो। लेकिन ऐसा निष्कर्ष निर्णायक प्रकृति की वस्तुनिष्ठ सामग्री पर आधारित होना चाहिए, न कि केवल कार्यवाही के लंबित होने पर। वर्तमान मामले में प्रतिवादियों की कार्रवाई एक व्यापक दृष्टिकोण को दर्शाती है, जिसके तहत FIR में नामित सभी उम्मीदवारों के साथ उनके भूमिका या आपराधिक कार्यवाही के चरण का कोई व्यक्तिगत मूल्यांकन किए बिना एक जैसा व्यवहार किया गया है। ऐसा दृष्टिकोण सार्वजनिक रोज़गार में निष्पक्षता और औचित्य की आवश्यकता के विपरीत है।”

उपरोक्त को देखते हुए अदालत ने माना कि याचिकाकर्ताओं के परिणाम रोकने की विवादित कार्रवाई को सही नहीं ठहराया जा सकता।

तदनुसार, अदालत ने बिहार लोक सेवा आयोग को एक सीमित सत्यापन करने का निर्देश दिया ताकि यह पता लगाया जा सके कि क्या याचिकाकर्ताओं ने सफलतापूर्वक परीक्षा उत्तीर्ण कर ली है और निर्धारित कट-ऑफ से अधिक अंक प्राप्त किए हैं। यदि वे सफल पाए जाते हैं तो आयोग को निर्देश दिया गया कि वह चार सप्ताह के भीतर उनके परिणाम घोषित करे और नियुक्ति के लिए संबंधित अधिकारियों को सिफारिशें भेजे।

Case Title: Monu Kumar and Ors v. State of Bihar and Ors.

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