एमपी हाईकोर्ट ने तलाक के मामले में पत्नी की मेडिकल जांच की पति की मांग ठुकराई, कहा - बिना ठोस वजह के जांच की इजाज़त नहीं
मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने तलाक की कार्यवाही के दौरान पति के कहने पर पत्नी की मेडिकल जांच कराने का आदेश रद्द किया। कोर्ट ने कहा कि ऐसी शक्ति का इस्तेमाल बिना ठोस वजह के या सिर्फ़ जानकारी जुटाने के मकसद से की जाने वाली जांच (roving or fishing inquiry) की इजाज़त देने के लिए नहीं किया जा सकता, खासकर तब जब मामला अंतिम बहस के चरण में हो। [2026 LiveLaw (MP) 385]
जस्टिस मिलिंद रमेश फड़के की बेंच ने कहा कि अगर कोई खास ज़रूरत न हो तो अंतिम बहस के चरण में मेडिकल जांच की इजाज़त नहीं दी जा सकती।
बेंच ने कहा,
"जब दोनों पक्षों ने अपने सबूत पेश कर दिए हों और मामला अंतिम बहस के चरण में पहुँच गया हो, तो बिना किसी खास ज़रूरत को साबित किए मेडिकल जांच की इजाज़त देने से याचिकाकर्ता को गंभीर नुकसान होगा। इससे प्रतिवादी को ऐसे मामले के समर्थन में अतिरिक्त सबूत जुटाने का मौका मिल जाएगा, जिसकी सुनवाई पहले ही कोर्ट के सामने पेश किए गए बयानों और सबूतों के आधार पर हो चुकी है। यह कोर्ट इस बात को समझती है कि वैवाहिक मामले में, किसी जीवनसाथी की शारीरिक या मानसिक स्थिति से जुड़े मुद्दे को तय करने में मेडिकल सबूत कोर्ट की काफी मदद कर सकते हैं। हालाँकि, ऐसे सबूत हासिल करने की शक्ति का इस्तेमाल बिना ठोस वजह के या सिर्फ़ जानकारी जुटाने के मकसद से की जाने वाली जांच के लिए नहीं किया जा सकता।"
दोनों पक्षों की शादी 28 अप्रैल, 2004 को हुई और वे 15 जुलाई, 2011 तक साथ रहे। इसके बाद पति ने पत्नी पर क्रूरता का आरोप लगाते हुए हिंदू विवाह अधिनियम (HMA) की धारा 13 के तहत तलाक की कार्यवाही शुरू की। पत्नी ने अपने लिखित बयान में आरोपों से इनकार किया और अपने पति के साथ रहने की इच्छा जताई।
दोनों पक्षों द्वारा सबूत पेश करने के बाद मामला अंतिम बहस के लिए तय किया गया। उस चरण में पति ने CPC की धारा 151 के तहत एक अर्ज़ी दाखिल की, जिसमें पत्नी की मेडिकल जांच की मांग की गई। पति का आरोप था कि शादी से पहले पत्नी के तीन बार ऑपरेशन हुए।
पत्नी ने अर्ज़ी का विरोध किया, लेकिन ज़िला अदालत ने 2 जुलाई, 2012 को अर्ज़ी मंज़ूर की। इसके बाद वह हाईकोर्ट पहुंची।
पत्नी के वकील ने तर्क दिया कि मेडिकल जांच की अर्ज़ी तब दाखिल की गई जब दोनों पक्षों की ओर से सबूत पेश किए जा चुके थे। साथ ही पति ऐसी मेडिकल जांच की ज़रूरत साबित करने में नाकाम रहा। पति के वकील ने दलील दी कि उन्होंने साफ़ तौर पर कहा कि पत्नी का ऑपरेशन हुआ था, इसलिए अपनी शारीरिक स्थिति के कारण, उसने सामान्य वैवाहिक संबंध बनाए रखने से इनकार किया।
शारदा बनाम धर्मपाल (2003) मामले का ज़िक्र करते हुए कोर्ट ने फिर से कहा कि वैवाहिक मामलों की सुनवाई करने वाली अदालत के पास उचित मामलों में किसी पक्ष को मेडिकल जांच कराने का निर्देश देने की शक्ति है। हालाँकि, सुप्रीम कोर्ट ने यह भी साफ़ किया कि ऐसी शक्ति का इस्तेमाल अदालत की मर्ज़ी पर निर्भर करता है। इसलिए ऐसा निर्देश जारी करने से पहले याचिकाकर्ता को एक मज़बूत शुरुआती मामला (prima facie case) साबित करना होगा।
मौजूदा मामले की जांच करते हुए कोर्ट ने पाया कि पति ने यह अर्ज़ी तब दी थी जब मामला अंतिम बहस के लिए तय हो चुका था और रिकॉर्ड में ऐसी कोई ज़रूरी बात नहीं मिली, जिससे यह साबित हो कि पहले से तय मुद्दों को सुलझाने के लिए मेडिकल जांच ज़रूरी है।
समर घोष बनाम जया घोष (2007) मामले का हवाला देते हुए कोर्ट ने फिर से कहा कि अनिवार्य मेडिकल जांच का आदेश देने से पहले तथ्यों और सबूतों के आधार को साबित करना ज़रूरी है।
बेंच ने इस बात पर ज़ोर दिया,
"इसलिए जिस आदेश को चुनौती दी गई, उसमें ऐसी विवेकाधीन शक्ति (Discretionary Power) के इस्तेमाल से जुड़े नियमों पर ज़रूरी सोच-विचार नहीं दिखता है। जिस चरण पर अर्ज़ी दाखिल की गई, वह भी काफ़ी अहम है।"
इसलिए कोर्ट ने याचिका मंज़ूर कर ली और ट्रायल कोर्ट का आदेश रद्द किया।
Case Title: S v SKO, WP-4819-2012