मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने BJP नेता कृष्ण पति त्रिपाठी द्वारा दायर चुनावी याचिका खारिज करने से इनकार किया। यह याचिका रीवा की सेमरिया सीट से कांग्रेस के अभय कुमार मिश्रा के चुनाव के खिलाफ दायर की गई, जिसमें उन पर पहली नज़र में नौ आपराधिक मामले छिपाने का आरोप लगाया गया।

जस्टिस विनय सराफ की बेंच ने टिप्पणी की,

"इस तरह की जानकारी छिपाने और दबाने से वोटर एक सोच-समझकर और सही चुनाव करने से वंचित रह जाते हैं। इसके परिणामस्वरूप, यह उम्मीदवार की ओर से मतदाताओं के चुनाव करने के अधिकार में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष हस्तक्षेप या हस्तक्षेप के प्रयास की श्रेणी में आता है।"

त्रिपाठी ने मिश्रा के खिलाफ चुनाव लड़ा था। उन्होंने मिश्रा के चुनाव को इस आधार पर चुनौती दी थी कि उन्होंने अपने खिलाफ दर्ज कई आपराधिक मामलों का खुलासा नहीं किया। इसके अलावा, यह आरोप लगाया गया कि मिश्रा ने ICICI बैंक के 50 लाख रुपये से अधिक के बकाया का खुलासा नहीं किया, जिसके बारे में त्रिपाठी ने तर्क दिया कि चुनावी नियमों के तहत इसका खुलासा करना अनिवार्य था।

BJP उम्मीदवार ने यह भी तर्क दिया कि हालांकि मिश्रा ने निजी कंपनियों से वेतन कमाने का ज़िक्र किया, लेकिन उन्होंने उन कंपनियों के नाम नहीं बताए, जिससे उन्होंने ज़रूरी जानकारी छिपा ली।

त्रिपाठी ने आगे आरोप लगाया कि मिश्रा का एक ऐसी कंपनी से संबंध था, जिसे सरकारी ठेका मिला हुआ था, जिसके कारण नियमों के तहत उनकी अयोग्यता हो सकती थी।

मिश्रा ने तर्क दिया कि उन्हें सभी आपराधिक मामलों में बरी कर दिया गया और नामांकन के समय उनके खिलाफ कोई भी कार्यवाही लंबित नहीं थी। इसके अलावा, ऋण के संबंध में उन्होंने तर्क दिया कि यह एक साझेदारी फर्म द्वारा लिया गया, न कि उन्होंने व्यक्तिगत रूप से लिया था। उन्होंने आगे कहा कि नामांकन पत्र दाखिल करने से पहले ही उन्होंने उन कंपनियों से इस्तीफा दे दिया था।

इसके अतिरिक्त, उन्होंने तर्क दिया कि त्रिपाठी की याचिका तुच्छ और राजनीतिक रूप से प्रेरित थी, जिसमें कोई वास्तविक आधार नहीं था। उन्होंने याचिका को खारिज करने की मांग करते हुए CPC के आदेश 7 नियम 11 के तहत एक आवेदन भी दायर किया।

बेंच ने CPC के आदेश 7 नियम 11 के दायरे की जांच की और टिप्पणी की कि याचिका (Plaint) को खारिज करने के आवेदन पर विचार करते समय केवल याचिका में किए गए दावों की ही जांच की जानी चाहिए। उस चरण में प्रतिवादियों का बचाव (Defence) अप्रासंगिक होता है।

बेंच ने जानकारी छिपाने और खुलासा न करने के संबंध में दोहराया कि मतदाताओं को संसद या विधानसभा की सदस्यता के लिए चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवार के पिछले रिकॉर्ड, जिसमें उसका आपराधिक इतिहास भी शामिल है, उसके बारे में जानने का अधिकार है। बेंच ने इस बात पर ज़ोर दिया कि संशोधित प्रावधानों और सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय किए गए Precedents (मिसालों) के अनुसार, आपराधिक इतिहास और आर्थिक स्थिति का खुलासा करना अनिवार्य है। सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर प्रकाश डाला था कि सबूतों का खुलासा न करना, चुनावी अधिकार के स्वतंत्र इस्तेमाल में बाधा डालता है।

बेंच ने आगे कहा,

"चुनावी याचिका में याचिकाकर्ता को उन मामलों के बारे में बताना ज़रूरी होता है, जिनमें सफल उम्मीदवार शामिल है। यह भी बताना होता है कि हलफनामे में जानकारी का खुलासा कैसे नहीं किया गया। जब यह साबित हो जाता है तो इसे 'भ्रष्ट आचरण' माना जाएगा। चुनावी याचिका में इस बात का फैसला चुनाव ट्रिब्यूनल द्वारा किया जाना होता है। भ्रष्ट आचरण के मामले में चुनाव ट्रिब्यूनल या हाईकोर्ट चुने हुए उम्मीदवार के चुनाव को 'अमान्य और शून्य' घोषित करने के लिए बाध्य होता है।"

इसलिए बेंच ने फैसला दिया कि त्रिपाठी के मामले में पहली नज़र में ही 'Cause of Action' (मुकदमे का आधार) दिखाई देता है। इसलिए यह याचिका सुनवाई योग्य है। नतीजतन, कोर्ट ने मिश्रा की अर्जी खारिज कर दी और उन्हें अपना लिखित बयान दाखिल करने के लिए समय दिया।

अब इस मामले की अगली सुनवाई 18 अप्रैल को होगी।

Case Title: Krishna Pati Tripathi v Abhay Kuamr Mishra [ELECTION PETITION No. 8 of 2024]

Tags: