मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने पशु चिकित्सा विभाग के डॉक्टरों को मेडिकल ऑफिसर और डेंटल सर्जन के समान टाइम-स्केल वेतन का लाभ देने के सिंगल जज का आदेश बरकरार रखा। कोर्ट ने कहा कि पशु डॉक्टर ऐसे मरीजों का इलाज करते हैं, जो अपनी तकलीफ बता नहीं सकते, इसलिए उनकी सेवाओं को किसी भी तरह कमतर नहीं आंका जा सकता।

जस्टिस आनंद पाठक और जस्टिस बीपी शर्मा की खंडपीठ ने राज्य सरकार की अपील खारिज करते हुए कहा कि पशु चिकित्सक और मानव चिकित्सा के डॉक्टर अलग-अलग प्रजातियों का इलाज करते हैं, लेकिन दोनों ही समाज के उपचारक हैं। राज्य सरकार एक नियोक्ता के रूप में समान प्रकृति का काम करने वाली सेवाओं के बीच केवल मरीजों के अलग होने के आधार पर भेदभाव नहीं कर सकती।

टाइम-स्केल वेतन ऐसी वेतन व्यवस्था है, जिसमें कर्मचारी को निर्धारित वेतनमान में समय-समय पर वेतन वृद्धि मिलती रहती है और वेतन न्यूनतम स्तर से अधिकतम स्तर तक बढ़ता है।

खंडपीठ ने प्रसिद्ध अमेरिकी हास्यकार और सामाजिक टिप्पणीकार विल रोजर्स के कथन का उल्लेख करते हुए कहा कि दुनिया का सबसे अच्छा डॉक्टर पशु चिकित्सक होता है, क्योंकि वह अपने मरीज से यह नहीं पूछ सकता कि उसे क्या परेशानी है और उसे स्वयं ही बीमारी के संकेत समझने पड़ते हैं।

कोर्ट ने कहा कि मध्य प्रदेश में पशुपालन ने एक व्यापक स्वरूप ले लिया है। डेयरी और बकरी पालन केंद्रों के अलावा विभिन्न पशु टीकाकरण अभियानों और पशु रोगों से निपटने में पशु चिकित्सकों की महत्वपूर्ण भूमिका है। वे बड़ी संख्या में ग्रामीण आबादी के संपर्क में रहते हैं और प्रदेश की अधिकांश ग्रामीण आबादी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से पशुपालन और उससे जुड़े उत्पादों पर निर्भर है। इसलिए उनकी सेवाओं को किसी भी तरह कमतर नहीं आंका जा सकता।

राज्य सरकार की ओर से दलील दी गई कि पशुपालन एवं डेयरी विभाग में कार्यरत योग्य वेटरिनरी असिस्टेंट सर्जन और वेटरिनरी सर्जन अलग सेवा नियमों के तहत काम करते हैं, जबकि स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग के मेडिकल ऑफिसर और डेंटल सर्जन अलग नियमों से शासित होते हैं। इसलिए दोनों सेवाओं के बीच वेतन समानता का दावा नहीं किया जा सकता और सिंगल जज का आदेश रद्द किया जाना चाहिए।

दूसरी ओर, पशु डॉक्टरों की ओर से कहा गया कि 24 जनवरी 2008 की अधिसूचना में विभिन्न विभागों में कार्यरत सरकारी कर्मचारियों के लिए वेतनमान में उन्नयन और टाइम-स्केल वेतन का प्रावधान किया गया। राज्य एक आदर्श नियोक्ता है और अपने कर्मचारियों को समान लाभ देने में भेदभाव नहीं कर सकता।

खंडपीठ ने कहा कि पशु डॉक्टरों का काम कई मायनों में कठिन है, क्योंकि उनके मरीज अपनी बीमारी या लक्षणों के बारे में खुद जानकारी नहीं दे सकते। ऐसे में पशु डॉक्टरों को बीमारी का पता लगाने के लिए विशेष और मजबूत कौशल की आवश्यकता होती है। इसके विपरीत मानव मरीज अपने लक्षण डॉक्टर को स्वयं बता सकता है।

सेवा शर्तों के संबंध में कोर्ट ने कहा कि राज्य सरकार स्वयं कई अन्य सेवा और लाभों के मामले में वेटरिनरी सर्जन को मेडिकल और डेंटल सर्जन के समान मानती है। ऐसे में अधिक वेतनमान का लाभ देने के मामले में दोनों वर्गों के बीच भेदभाव नहीं किया जा सकता।

खंडपीठ ने कहा कि रिकॉर्ड में यह विशेष रूप से बताया गया कि डेंटल सर्जन, मेडिकल ऑफिसर और वेटरिनरी सर्जन की सेवाओं में समान वेतन दिया जाता रहा है और राज्य की ओर से दाखिल जवाब में इस तथ्य का प्रभावी खंडन नहीं किया गया। कोर्ट ने कहा कि तीनों पेशे समाज के उपचारक हैं। एक वर्ग इंसानों का इलाज करता है और दूसरा ऐसे जानवरों का, जो अपनी बात कहने में सक्षम नहीं हैं। इसलिए इस आधार पर कोई भेद नहीं किया जा सकता।

हाईकोर्ट ने कहा कि राज्य एक नियोक्ता के रूप में ऐसी दो सेवाओं के बीच भेदभाव नहीं कर सकता, जिनका काम मूल रूप से एक ही प्रकृति का है और केवल उनके उपचार का लक्ष्य अलग है।

इसी आधार पर खंडपीठ ने सिंगल जज के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें पशु डॉक्टरों को मेडिकल ऑफिसर और डेंटल सर्जन के समान टाइम-स्केल वेतन का लाभ देने का निर्देश दिया गया था। राज्य सरकार की अपील खारिज कर दी गई।

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