मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने राज्य में नए राज्यपाल की नियुक्ति के लिए दायर जनहित याचिका खारिज की। कोर्ट ने कहा कि संविधान राज्यपाल के पद पर किसी तरह के संवैधानिक शून्य की स्थिति की कल्पना नहीं करता। मौजूदा राज्यपाल अपने उत्तराधिकारी के पदभार संभालने तक पद पर बने रह सकते हैं।

जस्टिस आनंद पाठक और जस्टिस बीपी शर्मा की खंडपीठ ने याचिका को 'भ्रामक धारणा पर आधारित' बताते हुए खारिज किया। कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 156(3) का हवाला देते हुए कहा कि यह प्रावधान सुनिश्चित करता है कि राज्यपाल तब तक पद पर बने रहें, जब तक उनका उत्तराधिकारी पदभार ग्रहण नहीं कर लेता।

खंडपीठ ने कहा,

“यह प्रावधान सुनिश्चित करता है कि कभी भी संवैधानिक शून्य न हो और राज्यपाल तब तक पद पर बने रहें, जब तक उनका उत्तराधिकारी पद ग्रहण नहीं कर लेता। इसलिए राज्यपाल के पद पर शून्यता की स्थिति संविधान में स्वीकार नहीं की गई है।”

यह जनहित याचिका जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय के रिटायर प्रोफेसर ने दाखिल की। याचिका में संविधान के अनुच्छेद 153 के तहत मध्य प्रदेश के लिए राज्यपाल की नियुक्ति का निर्देश देने की मांग की गई। अनुच्छेद 153 में प्रत्येक राज्य के लिए एक राज्यपाल का प्रावधान है।

याचिकाकर्ता ने कहा था कि राज्यपाल विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति के रूप में भी कार्य करते हैं और मौजूदा राज्यपाल का कार्यकाल 7 जुलाई 2026 को समाप्त हो चुका है। इसलिए संबंधित पक्षों को नए राज्यपाल की नियुक्ति करनी चाहिए।

याचिका में यह भी कहा गया कि पहले ऐसी परंपरा रही है, जिसमें हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस को राज्यपाल नियुक्त किया जाता था। इसी आधार पर याचिकाकर्ता ने मांग की थी कि जब तक नए राज्यपाल की नियुक्ति नहीं हो जाती, तब तक हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस को कार्यवाहक राज्यपाल बनाया जाए।

याचिका में दावा किया गया कि राज्यपाल की नियुक्ति नहीं किए जाने से संवैधानिक प्रावधानों का उद्देश्य विफल हो रहा है। साथ ही इसमें यह भी कहा गया कि केंद्र सरकार और अन्य संबंधित पक्षों को हाईकोर्ट के समक्ष यह बताना चाहिए कि मौजूदा राज्यपाल का कार्यकाल समाप्त होने की जानकारी होने के बावजूद नए राज्यपाल की नियुक्ति के लिए कदम क्यों नहीं उठाए गए।

दूसरी ओर, प्रतिवादियों की ओर से याचिका का विरोध करते हुए कहा गया कि मौजूदा राज्यपाल अपने उत्तराधिकारी की नियुक्ति और उसके पदभार संभालने तक पद पर बने रहेंगे।

हाईकोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 156 का उल्लेख करते हुए कहा कि इस प्रावधान में स्पष्ट रूप से व्यवस्था है कि राज्यपाल अपने उत्तराधिकारी के पदभार ग्रहण करने तक पद पर बने रहेंगे। कोर्ट ने कृष्ण बल्लभ सहाय बनाम जांच आयोग मामले में सुप्रीम कोर्ट के 1969 के फैसले का भी हवाला दिया।

खंडपीठ ने कहा कि अनुच्छेद 156 में मौजूद प्रावधान का उद्देश्य ही यह सुनिश्चित करना है कि राज्यपाल के पद पर कभी संवैधानिक शून्य उत्पन्न न हो। इसी आधार पर कोर्ट ने नए राज्यपाल की नियुक्ति के लिए दायर जनहित याचिका खारिज की।

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