मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA) के तहत जारी एक व्यक्ति के निरोध आदेश को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने पाया कि अधिकारियों ने रिकॉर्ड की सही जानकारी की जांच किए बिना यांत्रिक तरीके से कार्रवाई की और 11 ऐसे मामलों को लंबित बताया, जिनमें आरोपी पहले ही बरी हो चुका था।

जस्टिस विवेक अग्रवाल और जस्टिस अवनींद्र कुमार सिंह की खंडपीठ ने कहा कि रिकॉर्ड से अधिकारियों की ओर से “दिमाग का इस्तेमाल न करने” (non-application of mind) की स्थिति स्पष्ट होती है।

एक ही दिन में पूरी प्रक्रिया

मामले में जबलपुर के जिला मजिस्ट्रेट ने 6 जनवरी 2026 को NSA की धारा 3(2) के तहत याचिकाकर्ता को तीन महीने के लिए हिरासत में लेने का आदेश दिया था। बाद में हिरासत की अवधि 1 अप्रैल और 6 जुलाई 2026 को बढ़ाई गई।

यह कार्रवाई 4 जनवरी 2026 को हुई एक कथित देशी बम विस्फोट की घटना के बाद की गई थी।

कोर्ट ने रिकॉर्ड पर गौर करते हुए पाया कि पुलिस अधिकारियों की ओर से रिपोर्ट तैयार करने से लेकर उसे जिला मजिस्ट्रेट के पास भेजने और फिर निरोध आदेश पारित करने तक की प्रक्रिया 6 जनवरी को ही पूरी कर दी गई।

खंडपीठ ने कहा कि तीन अलग-अलग पुलिस अधिकारियों द्वारा उसी दिन की गई कार्रवाई और उनके पत्रों की भाषा से non-application of mind सामने आता है।

11 मामलों में पहले ही हो चुका था बरी

कोर्ट ने पाया कि निरोध आदेश में 11 मामलों को लंबित बताया गया था, जबकि याचिकाकर्ता ने रिकॉर्ड के आधार पर दिखाया कि वह उन मामलों में बरी हो चुका था।

पीठ ने कहा कि सक्षम प्राधिकारी के समक्ष सही तथ्य नहीं रखे गए और गलत जानकारी को बिना सत्यापन के आगे भेज दिया गया।

कोर्ट ने विशेष रूप से कहा कि इन तथ्यों का सत्यापन क्राइम एंड क्रिमिनल ट्रैकिंग नेटवर्क एंड सिस्टम (CCTNS) के जरिए बहुत आसानी से किया जा सकता था।

पुलिस रिपोर्ट को बिना जांच आगे बढ़ाया गया

अदालत ने कहा कि संबंधित पुलिस अधिकारी द्वारा उपलब्ध कराए गए गलत आंकड़ों को अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक और पुलिस अधीक्षक ने यांत्रिक तरीके से जिला मजिस्ट्रेट को भेज दिया। जिला मजिस्ट्रेट ने भी इन तथ्यों का स्वतंत्र सत्यापन किए बिना उन पर भरोसा किया।

कोर्ट ने इसे निरोध आदेश को प्रभावित करने वाला गंभीर दोष माना।

CCTV फुटेज में कथित हेरफेर का भी उल्लेख

अदालत ने यह भी नोट किया कि 4 जनवरी 2026 की घटना से संबंधित सीसीटीवी फुटेज में कथित हेरफेर का मामला सामने आया था। इस संबंध में पुलिस अधीक्षक ने 24 जून 2026 को एक सब-इंस्पेक्टर को कारण बताओ नोटिस जारी किया था।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला

हाईकोर्ट ने अमीना बेगम बनाम तेलंगाना राज्य मामले का हवाला देते हुए कहा कि यदि निवारक हिरासत के लिए आवश्यक व्यक्तिपरक संतुष्टि बनाने वाला पर्याप्त आधार मौजूद नहीं है, तो इसका इस्तेमाल जल्दबाजी या लापरवाही से नहीं किया जा सकता।

कोर्ट ने दोहराया कि निवारक हिरासत को संविधान द्वारा संरक्षित व्यक्तिगत स्वतंत्रता की अनदेखी करते हुए “हर छोटी बात पर” लागू नहीं किया जा सकता।

इन परिस्थितियों में हाईकोर्ट ने 6 जनवरी 2026 के निरोध आदेश को रद्द कर दिया और याचिकाओं को मंजूर कर लिया।

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