पति द्वारा जबरदस्ती अप्राकृतिक सेक्स करना IPC की धारा 498A के तहत क्रूरता, मगर वैवाहिक अपवाद के कारण बलात्कार नहीं: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने FIR रद्द करने की मांग वाली पति की याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि पति द्वारा अपनी बालिग पत्नी के साथ जबरन अप्राकृतिक यौन संबंध बनाने को धारा 376 के तहत बलात्कार के रूप में मुकदमा नहीं चलाया जा सकता, लेकिन यह भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498A के तहत क्रूरता माना जाएगा।
जस्टिस राजेश कुमार गुप्ता की बेंच ने कहा,
"हालांकि, इस कोर्ट की भी राय है कि पति द्वारा अपनी पत्नी के साथ जबरन अप्राकृतिक यौन संबंध बनाना IPC की धारा 498A के तहत क्रूरता है। साथ ही IPC की धारा 376 के तहत बलात्कार के रूप में मुकदमा नहीं चलाया जा सकता, क्योंकि धारा 377 (अप्राकृतिक कृत्य) के संदर्भ में, मौजूदा कानून के तहत वैवाहिक बलात्कार की अवधारणा को मान्यता नहीं दी गई, क्योंकि धारा 375 में स्पष्ट वैवाहिक अपवाद है।"
मामले के तथ्यों के अनुसार, दंपति की शादी जून 2022 में हुई थी। शादी के समय पत्नी के माता-पिता ने अपनी मर्जी से 21 लाख रुपये नकद और 15 तोला सोना उपहार में दिया था।
इसके तुरंत बाद दंपति के बीच छोटी-मोटी बातों पर झगड़े होने लगे, जिसके दौरान पति पर पत्नी के साथ शारीरिक दुर्व्यवहार करने का आरोप लगा। एक खास घटना बताई गई, जिसमें पति के मीटिंग में जाने से पहले झगड़ा हुआ था। मीटिंग के बाद पति ने पत्नी को एक मंदिर में पाया और उस पर घर लौटने का दबाव डाला। मना करने पर पति ने कथित तौर पर उस पर हमला किया और उसका सिर फोड़ दिया।
इसके बाद पत्नी अपने माता-पिता के घर लौट आई और महिला थाने में शिकायत की। हालांकि, काउंसलिंग के बाद मामला सुलझ गया और वह वैवाहिक घर लौट आई। पत्नी ने आरोप लगाया कि पति जबरन उसके साथ शारीरिक संबंध बनाता था और उसकी सहमति के बिना उसके साथ अप्राकृतिक यौन संबंध बनाता था।
अगस्त, 2023 में उसने आरोप लगाया कि उसके पति ने फिर से उस पर हमला किया, जिसके बाद भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498A (क्रूरता), धारा 376(2n) (बार-बार बलात्कार), धारा 377 (अप्राकृतिक अपराध), धारा 323 (स्वेच्छा से चोट पहुंचाना) और धारा 294 (अश्लील कृत्य और गाने) के तहत FIR दर्ज की गई। पति ने FIR रद्द करने के लिए कोर्ट में अर्जी दी, जिसे बाद में चार्जशीट की मदद से बेहतर जानकारी के साथ दोबारा फाइल करने की छूट के साथ वापस ले लिया गया। इसके बाद उसने जमानत याचिका दायर की जिसे ट्रायल कोर्ट ने खारिज कर दिया। हालांकि, हाईकोर्ट ने 2 नवंबर, 2023 के आदेश से उसे अग्रिम जमानत दे दी।
पति के वकील ने दलील दी कि FIR पति द्वारा 6 सितंबर, 2023 को फैमिली कोर्ट में दायर तलाक की याचिका का जवाबी हमला था। यह भी तर्क दिया गया कि पति को WhatsApp मैसेज और कॉल रिकॉर्ड मिले थे जिनसे पता चला कि पत्नी दूसरे लोगों के संपर्क में थी। जब उसने पत्नी से इस बारे में पूछा तो उसने कथित तौर पर पति को झूठे केस में फंसाने के लिए यह कार्रवाई शुरू की।
कोर्ट ने कहा कि IPC की धारा 376 और 377 के तहत अपराध IPC की धारा 375 के अपवाद 2 को देखते हुए मान्य नहीं हो सकते, जो पति को अपनी पत्नी के खिलाफ बलात्कार के लिए अभियोजन से छूट देता है।
हालांकि, कोर्ट ने साफ किया कि पति द्वारा अपनी पत्नी के साथ जबरदस्ती किए गए अप्राकृतिक यौन संबंध IPC की धारा 498A के तहत क्रूरता माने जाएंगे। हालांकि ऐसे कृत्य IPC की धारा 376 के तहत दंडनीय बलात्कार नहीं माने जाएंगे।
कोर्ट ने आगे IPC की धारा 375 की संशोधित परिभाषा की जांच की और कहा,
"धारा 375 और धारा 377 के अपराध में दो बातें आम हैं, पहली जिनके बीच अपराध हुआ है यानी पति और पत्नी और दूसरी अपराधी और पीड़ित के बीच सहमति। संशोधित परिभाषा के अनुसार, यदि अपराधी और पीड़ित पति-पत्नी हैं तो सहमति मायने नहीं रखती और धारा 375 के तहत कोई अपराध नहीं बनता है। इस तरह IPC की धारा 376 के तहत कोई सजा नहीं है"।
कोर्ट ने आगे साफ किया "संशोधन द्वारा किए गए निरसन के अनुसार धारा 375 के तहत पति और पत्नी के बीच अपराध नहीं बनता है और ऐसी स्थिति में विरोधाभास है, जब धारा 375 के तहत सब कुछ निरस्त कर दिया गया है तो धारा 377 के तहत अपराध कैसे लागू होगा यदि यह पति और पत्नी के बीच किया गया"।
कोर्ट ने पाया कि हालांकि IPC की धारा 377 के तहत अपराध का आरोप लगाया गया, लेकिन कोई प्रासंगिक मेडिकल सबूत पेश नहीं किया गया और अभियोजन पक्ष ने ट्रायल शुरू होने के बावजूद केवल मौखिक आरोपों पर भरोसा किया। मेडिकल रिपोर्ट में भी कोई चोट या अप्राकृतिक यौन संबंध के संकेत नहीं मिले। जांच करने वाले डॉक्टर ने भी फेलैशियो या बग्गरी के बारे में कोई पक्की राय नहीं दी, क्योंकि कोई चोट नहीं पाई गई।
इसलिए कोर्ट ने IPC की धारा 377 के तहत लगाए गए आरोपों की वैधता पर संदेह जताया, खासकर फैमिली कोर्ट में चल रहे विवाद को देखते हुए।
इस प्रकार कोर्ट ने निर्देश दिया,
"अतः, मामले के सभी तथ्यों और परिस्थितियों पर विचार करते हुए यह याचिका आंशिक रूप से इस हद तक स्वीकार की जाती है कि याचिकाकर्ता के खिलाफ IPC की धारा 376(2)(n) और 377 के तहत अपराध, जो क्राइम नंबर 971/2023 के तहत दर्ज है, उसे रद्द किया जाता है। हालांकि, उसी क्राइम नंबर के तहत धारा 323, 294 और 498-A के तहत अपराध को बरकरार रखा जाता है।"
Case Title: SM v State [MCRC-54650-2023]