कानून का उपयोग निजी दुश्मनी निकालने के लिए नहीं: एमपी हाइकोर्ट ने सरकारी अधिकारी पर दर्ज अश्लीलता की FIR रद्द की

Update: 2026-03-02 09:02 GMT

मध्य प्रदेश हाइकोर्ट ने एक केंद्रीय सरकारी कर्मचारी के खिलाफ दर्ज FIR को निरस्त करते हुए कहा कि आपराधिक कानून का उपयोग निजी रंजिश या तुच्छ विवादों के निपटारे के साधन के रूप में नहीं किया जा सकता।

अदालत ने पाया कि मेडिकल रिपोर्ट और घटनाक्रम की परिस्थितियां आरोपों को संदिग्ध और अविश्वसनीय बनाती हैं।

जस्टिस हिमांशु जोशी ने कहा कि अदालत गंभीर दंडात्मक प्रावधानों को प्रतिशोध के औजार के रूप में उपयोग करने की बढ़ती प्रवृत्ति से आंखें नहीं मूंद सकती।

उन्होंने कहा,

“आपराधिक कानून, विशेषकर महिलाओं की गरिमा और शारीरिक स्वायत्तता की रक्षा के लिए बनाए गए प्रावधान एक गंभीर विधायी विश्वास हैं। इन्हें निजी हिसाब चुकता करन आहत अहं की तुष्टि या दबाव बनाने के लिए हथियार के रूप में प्रयोग नहीं किया जा सकता। गंभीर आरोप यदि बिना ठोस आधार के लगाए जाएं तो निर्दोष व्यक्ति के करियर सामाजिक प्रतिष्ठा और व्यक्तिगत सम्मान को अपूरणीय क्षति हो सकती है।”

मामले में याचिकाकर्ता पर भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 74 (महिला पर आपराधिक बल), धारा 75(1) (अवांछित शारीरिक संपर्क व यौन संकेत) तथा धारा 296 (सार्वजनिक स्थान पर अश्लील कृत्य) के तहत FIR दर्ज की गई।

आरोप है कि 20 फरवरी, 2025 को बस यात्रा के दौरान उसने महिला के पैर छूकर और हाथ पकड़कर दुर्व्यवहार किया।

अदालत ने गौर किया कि घटना भीड़भाड़ वाली सार्वजनिक बस में हुई। ऐसे में यात्रियों के बीच शारीरिक संपर्क को स्वाभाविक संभावना से पूरी तरह अलग नहीं माना जा सकता।

अदालत ने यह भी देखा कि कथित रूप से कंडक्टर ने हस्तक्षेप किया था परंतु उसका बयान दर्ज नहीं किया गया। बस चालक और कंडक्टर जैसे स्वतंत्र व महत्वपूर्ण गवाहों के बयान न लेना अभियोजन की कहानी पर संदेह उत्पन्न करता है।

अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि शिकायतकर्ता ने चूड़ियां टूटने की बात कही किंतु चिकित्सीय परीक्षण में कोई चोट या खरोंच दर्ज नहीं हुई।

अदालत ने कहा कि यदि इतना बल प्रयोग हुआ होता कि चूड़ियां टूट जाएं तो सामान्यतः किसी न किसी प्रकार का शारीरिक संकेत दिखाई देता। मेडिकल समर्थन का पूर्ण अभाव अभियोजन पक्ष को कमजोर करता है।

इन परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए हाइकोर्ट ने कहा कि परिस्थितिजन्य साक्ष्य और चिकित्सीय रिपोर्ट में विरोधाभास आरोपों को संदेहास्पद बनाता है। साथ ही ऐसे मामले को आपराधिक अभियोजन के रूप में जारी रखना उचित नहीं है।

परिणामस्वरूप अदालत ने याचिका स्वीकार करते हुए FIR रद्द की।

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