कुछ घटनाओं के आधार पर नहीं टूट सकता विवाह, पूरे वैवाहिक जीवन को देखना होगा: केरल हाईकोर्ट

Update: 2026-07-27 10:02 GMT

केरल हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि मानसिक क्रूरता का आकलन करते समय पूरे वैवाहिक जीवन को समग्र रूप से देखा जाना चाहिए। वर्षों के दौरान हुई कुछ अलग-अलग घटनाओं या सामान्य वैवाहिक विवादों को मानसिक क्रूरता मानकर तलाक नहीं दिया जा सकता।

डॉ. जस्टिस ए. के. जयशंकरन नांबियार और जस्टिस प्रीता ए. के. की खंडपीठ ने यह टिप्पणी पति की अपील खारिज करते हुए की। पति ने फैमिली कोर्ट द्वारा उसकी तलाक याचिका खारिज किए जाने के आदेश को चुनौती दी थी।

हाईकोर्ट ने कहा कि मानसिक क्रूरता की कोई ऐसी निश्चित और व्यापक परिभाषा नहीं हो सकती, जो हर मामले पर समान रूप से लागू हो। यह प्रत्येक व्यक्ति की परवरिश, संवेदनशीलता, शिक्षा, पारिवारिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि, आर्थिक स्थिति, सामाजिक परिवेश, परंपराओं और जीवन मूल्यों के आधार पर अलग-अलग हो सकती है।

अदालत ने कहा,

"रोजमर्रा के जीवन में होने वाली मामूली तकरार, छोटी-मोटी परेशानियां और वैवाहिक जीवन की सामान्य खटास तलाक का आधार नहीं बन सकती। पूरे वैवाहिक जीवन को समग्र रूप से देखना होगा। कई वर्षों के दौरान हुई कुछ अलग-थलग घटनाओं को मानसिक क्रूरता नहीं माना जा सकता।"

मामले में पति ने फैमिली कोर्ट में मानसिक क्रूरता के आधार पर तलाक की मांग की। उसका आरोप था कि विवाह के शुरुआती समय से ही दोनों के बीच मतभेद थे। पत्नी उसके परिवार और मित्रों से मेलजोल नहीं रखती थी। उसने यह भी आरोप लगाया कि पत्नी ने अपनी नौकरी के बारे में गलत जानकारी दी, कुंडली में बदलाव कराया, विदेश में रहने के दौरान उसके फोन नहीं उठाए और शादी के एक सप्ताह के भीतर अपने सभी सोने के आभूषण मायके ले गई।

पति ने यह भी कहा कि पत्नी ने उसके खिलाफ झूठा पुलिस मामला दर्ज कराया, बिना बताए ससुराल छोड़ दिया, वापस आने से इनकार किया और बाद में बच्चे का स्कूल अपने मायके के पास बदल दिया ताकि उसे बच्चे से दूर रखा जा सके।

वहीं, पत्नी ने सभी आरोपों से इनकार करते हुए कहा कि वह वैवाहिक जीवन जारी रखना चाहती थी। उसने बताया कि जब पति विदेश में था, तब वह उसके बीमार पिता और मानसिक रूप से अस्वस्थ मां की देखभाल करती रही। बच्चे के जन्म के लिए वह मायके गई थी और छह महीने बाद वापस ससुराल लौट आई।

पत्नी ने कहा कि उसने विवाह से पहले ही अपनी शैक्षणिक योग्यता की जानकारी दी थी। छोटे बच्चे और सास-ससुर की बीमारी के कारण वह नौकरी नहीं कर सकी। उसने यह भी स्पष्ट किया कि कुंडली पति के पास ही थी और उसमें किसी बदलाव की उसे जानकारी नहीं थी।

आभूषणों के संबंध में पत्नी ने कहा कि उनका उपयोग कर्ज चुकाने के लिए किया गया, लेकिन वह इस संबंध में कोई दावा नहीं करना चाहती क्योंकि वह वैवाहिक संबंध बनाए रखना चाहती थी।

पत्नी का कहना था कि पति ने ही उससे संपर्क करना बंद कर दिया और उसे तथा बच्चे को अपने साथ विदेश नहीं ले गया। बाद में उसे मायके भेज दिया गया और फिर साथ रहने की कोई कोशिश नहीं की। उसने बताया कि पुलिस में शिकायत भी उसने पति के साथ दोबारा रहने की उम्मीद में दर्ज कराई, लेकिन पति ने पुलिस की ओर से सुझाई गई पारिवारिक काउंसिलिंग में शामिल होने से इनकार किया।

बच्चे का स्कूल बदलने के बारे में पत्नी ने कहा कि वह बच्चे के साथ मायके में रहने लगी थी, इसलिए सुविधा के लिए स्कूल बदला गया।

फैमिली कोर्ट ने साक्ष्यों के आधार पर माना कि पति मानसिक क्रूरता के आरोप साबित करने में विफल रहा। अदालत ने यह भी कहा था कि यदि कुछ आरोप सही भी मान लिए जाएं, तब भी वे इतने गंभीर नहीं हैं कि उन्हें मानसिक क्रूरता कहा जा सके। साथ ही, पत्नी द्वारा शैक्षणिक योग्यता से जुड़ी जानकारी और बच्चे का स्कूल बदलने को भी क्रूरता नहीं माना गया।

हाईकोर्ट ने भी सुप्रीम कोर्ट के समर घोष बनाम जया घोष मामले में दिए गए सिद्धांतों का हवाला देते हुए फैमिली कोर्ट के निष्कर्षों से सहमति जताई। अदालत ने कहा कि पति मानसिक क्रूरता के आरोप साबित नहीं कर सका और उपलब्ध तथ्यों के आधार पर तलाक देने का कोई आधार नहीं बनता।

इन्हीं कारणों से हाईकोर्ट ने पति की अपील खारिज की।

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