कर्नाटक हाईकोर्ट ने वेश्यावृत्ति संचालित करने के आरोपों को लेकर दो लॉज संचालकों के खिलाफ अनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम, 1956 (ITP Act) के तहत दर्ज FIR और आपराधिक कार्यवाही रद्द कर दी। कोर्ट ने पाया कि छापेमारी के दौरान वैधानिक प्रावधानों के तहत अनिवार्य महिला सदस्य को छापेमारी दल में शामिल नहीं किया गया था। कोर्ट ने यह भी पाया कि मामले की जांच करने वाले अधिकारी को अधिनियम के तहत विशेष पुलिस अधिकारी (Special Police Officer) के रूप में अधिकृत किए जाने का आधार रिकॉर्ड पर नहीं था।

जस्टिस वेंकटेश नाइक टी ने दोनों आरोपियों की आपराधिक याचिका स्वीकार करते हुए कहा कि कानून में निर्धारित अनिवार्य प्रक्रियाओं का पालन किए बिना की गई छापेमारी के आधार पर अभियोजन जारी नहीं रखा जा सकता।

क्या था मामला?

पुलिस को सूचना मिली थी कि एक लॉज का इस्तेमाल वेश्यावृत्ति के लिए किया जा रहा है। इसके बाद 27 जुलाई, 2026 को अथानी पुलिस स्टेशन के एक पुलिस सब-इंस्पेक्टर ने लॉज पर छापेमारी की। इस दौरान मौके का पंचनामा तैयार किया गया, कुछ वस्तुएं जब्त की गईं और शिकायत दर्ज की गई।

इसके आधार पर आरोपियों के खिलाफ ITP Act की धारा 3, 4 और 5 के तहत प्रधान सिविल जज (जूनियर डिवीजन) एवं न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी (JMFC), अथानी के समक्ष आपराधिक कार्यवाही शुरू की गई। इससे व्यथित होकर दोनों आरोपियों ने हाईकोर्ट का रुख किया।

छापेमारी दल में महिला की मौजूदगी अनिवार्य

हाईकोर्ट ने कर्नाटक हाईकोर्ट के पूर्व के फैसलों, विशेष रूप से Mr. Praveen Kumar M.S. v. State of Karnataka, का उल्लेख करते हुए कहा कि ITP Act की धारा 15(2) के तहत छापेमारी दल में एक महिला का होना अनिवार्य है। इसके अतिरिक्त, पंच गवाहों में से एक स्थानीय क्षेत्र का व्यक्ति होना चाहिए।

कोर्ट ने कहा कि इस मामले में जांच अधिकारी छापेमारी के दौरान किसी महिला को साथ नहीं ले गया था। पंचनामे में भी ऐसा कोई उल्लेख नहीं था कि वहां कोई महिला उपलब्ध नहीं थी या स्थानीय क्षेत्र से कोई व्यक्ति उपलब्ध नहीं था।

कोर्ट ने टिप्पणी की कि ऐसी परिस्थितियों में छापेमारी को अभियोजन का आधार नहीं बनाया जा सकता।

जांच विशेष पुलिस अधिकारी ने नहीं की

कोर्ट ने यह भी पाया कि मामले की जांच ITP Act के तहत अधिकृत विशेष पुलिस अधिकारी द्वारा किए जाने का आधार नहीं था।

ITP Act की धारा 2(i) के संदर्भ में कोर्ट ने कहा कि अधिनियम के तहत केवल विशेष पुलिस अधिकारी ही जांच करने के लिए अधिकृत है। राज्य सरकार की ऐसी अधिसूचना रिकॉर्ड पर नहीं थी, जिससे संबंधित पुलिस निरीक्षक को इस अधिनियम के अर्थ में विशेष पुलिस अधिकारी के रूप में अधिकृत किया गया हो।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल पुलिस निरीक्षक होने से किसी अधिकारी को स्वतः ITP Act के तहत विशेष पुलिस अधिकारी का दर्जा प्राप्त नहीं हो जाता।

इन परिस्थितियों में हाईकोर्ट ने माना कि आरोपियों के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही जारी रखना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा। इसी आधार पर कोर्ट ने दोनों आरोपियों की याचिका स्वीकार करते हुए उनके खिलाफ दर्ज FIR और संबंधित आपराधिक कार्यवाही रद्द कर दी।

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