कर्नाटक हाईकोर्ट ने PMLA के तहत प्रॉपर्टी ज़ब्त करने के आदेश को चुनौती देने वाली रिट याचिका पर सुनवाई करने से इनकार किया, जबकि मुख्य अपराध (Predicate Offence) रद्द कर दिया गया।

कोर्ट ने कहा कि चूंकि PMLA एक "पूरा कोड" है, जिसमें अधिकारियों और उपायों की एक व्यवस्था है। हालांकि ज़ब्ती के आदेश के ख़िलाफ़ आर्टिकल 226 के तहत याचिका दायर की जा सकती है, लेकिन उस पर सुनवाई करना कोर्ट की न्यायिक मर्ज़ी पर निर्भर करता है।

हाईकोर्ट हैदराबाद कर्नाटक एजुकेशन (HKE) सोसाइटी के पूर्व अध्यक्ष डॉ. भीमशंकर बिलगुंडी द्वारा दायर रिट याचिका पर सुनवाई कर रहा था। उन पर और अन्य लोगों पर पोस्ट-ग्रेजुएट मेडिकल छात्रों से 81 करोड़ रुपये से ज़्यादा की हेराफेरी करने का आरोप है। भारतीय दंड संहिता (IPC) की कई धाराओं के तहत दर्ज मुख्य अपराध की कार्यवाही हाईकोर्ट ने रद्द की थी। इसके बावजूद, PMLA के तहत एडजुडिकेटिंग अथॉरिटी ने प्रवर्तन निदेशालय (ED) द्वारा उनकी प्रॉपर्टी ज़ब्त करने के आदेश की पुष्टि की।

जस्टिस एम. नागप्रसन्ना ने कहा कि ज़ब्ती के आदेश के ख़िलाफ़ BNSS की धारा 528 के साथ पढ़े जाने वाले आर्टिकल 226 के तहत याचिका दायर की जा सकती है, लेकिन उस पर सुनवाई करना पूरी तरह से न्यायिक मर्ज़ी का मामला है।

हाई कोर्ट ने कहा,

"इसमें कोई शक नहीं कि ज़ब्ती के आदेश के ख़िलाफ़ BNSS की धारा 528 के साथ पढ़े जाने वाले भारत के संविधान के आर्टिकल 226 के तहत याचिका दायर की जा सकती है। हालांकि, उस पर सुनवाई करना पूरी तरह से इस कोर्ट की मर्ज़ी पर निर्भर है।"

इसमें आगे कहा गया,

"सुप्रीम कोर्ट ने साफ़ तौर पर कहा कि यह एक्ट अपने आप में एक पूरा कोड है और किसी भी आरोपी को इस एक्ट के तहत अधिकारियों के पदानुक्रम (Hierarchy) का पालन करना होगा। जो अटैचमेंट ऑर्डर अस्थायी रूप से पास किया गया, उसे अब 11-12-2025 को एडजुडिकेटिंग अथॉरिटी के एक ऑर्डर से कन्फर्म कर दिया गया। एडजुडिकेटिंग अथॉरिटी का ऑर्डर एक्ट की धारा 17 के तहत पास किया गया। याचिकाकर्ता के पास एक्ट की धारा 26 के तहत वैकल्पिक कानूनी उपाय है, जो एक्ट के तहत गठित अपीलेट ट्रिब्यूनल में अपील करने से संबंधित है।"

हाईकोर्ट ने मोहनकुमार के. बनाम भारत संघ (2025) मामले में केरल हाईकोर्ट के फैसले का ज़िक्र किया, जिसमें कहा गया कि हाईकोर्ट को PMLA के तहत एडजुडिकेटिंग अथॉरिटी के ऑर्डर में दखल देने से इनकार कर देना चाहिए, क्योंकि धारा 26 आरोपी को अपीलेट ट्रिब्यूनल के सामने ऑर्डर को चुनौती देने की इजाज़त देती है।

कोर्ट ने कहा,

"केरल हाईकोर्ट का मानना ​​है कि एक्ट की धारा 26 के तहत कानूनी उपाय उपलब्ध होने के बावजूद, कोर्ट को एडजुडिकेटिंग अथॉरिटी द्वारा पास किए गए ऑर्डर में दखल देने से इनकार कर देना चाहिए। केरल हाईकोर्ट का मानना ​​है कि हर गैर-कानूनी ऑर्डर पर इस कोर्ट को संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत अपनी शक्ति का इस्तेमाल करके विचार करने की ज़रूरत नहीं है, खासकर तब जब एक्ट एक पूरा कोड हो और उसमें अपील दायर करने के प्रावधान हों।"

कोर्ट ने आगे कहा,

"कलकत्ता हाईकोर्ट की डिवीज़न बेंच का भी यह मानना ​​है कि जब समाधान के लिए एक व्यापक कानूनी व्यवस्था मौजूद हो तो हर गैर-कानूनी ऑर्डर को हाईकोर्ट के सामने नहीं लाया जा सकता। मैं केरल हाईकोर्ट की राय से पूरी तरह सहमत हूं और कलकत्ता हाईकोर्ट की डिवीज़न बेंच की राय को मानते हुए इस याचिका पर विचार करने से इनकार करता हूं। साथ ही याचिकाकर्ता को यह छूट देता हूं कि वह उन सभी तर्कों को अपीलेट ट्रिब्यूनल के सामने रख सकता है, जो उसने इस कोर्ट के सामने रखे थे, जैसा कि एक्ट की धारा 26 के तहत प्रावधान है।"

इसके अनुसार, हाईकोर्ट ने याचिका का निपटारा करते हुए निर्देश दिया कि यदि याचिकाकर्ता 30 दिनों के भीतर अपील दायर करता है तो अपीलेट ट्रिब्यूनल उस अपील पर उसके गुण-दोष के आधार पर विचार करेगा।

इसमें कहा गया,

"यह बताने की ज़रूरत नहीं है कि अपीलेट ट्रिब्यूनल, याचिकाकर्ता द्वारा उसके सामने लाए गए मामले पर किसी नतीजे पर पहुंचने के लिए 'प्रेडिकेट ऑफ़ेंस' (मूल अपराध) के खत्म होने के असर पर भी विचार करेगा। अगर याचिकाकर्ता इस आदेश के मिलने की तारीख से 30 दिनों के भीतर अपीलेट ट्रिब्यूनल के सामने अपील करता है तो ट्रिब्यूनल देरी पर ध्यान दिए बिना अपील पर उसके गुण-दोष के आधार पर विचार करेगा।"

Case Title : DR.BHIMASHANKAR BILGUNDI VS DEPUTY DIRECTOR DIRECTORATE OF ENFORCEMENT& OTHERS

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