दो वकीलों के बीच स्कूल मैनेजमेंट विवाद: झारखंड हाईकोर्ट ने वकील को अग्रिम ज़मानत दी
झारखंड हाईकोर्ट ने एक वकील को अग्रिम ज़मानत दी। उन पर एक स्कूल के मैनेजमेंट में वित्तीय गड़बड़ी और धोखाधड़ी का आरोप है। यह मामला हाईकोर्ट में प्रैक्टिस करने वाले एक साथी वकील ने दर्ज कराया।
जस्टिस संजय कुमार द्विवेदी की सिंगल जज बेंच जगन्नाथपुर पुलिस स्टेशन केस नंबर 314/2017 (IPC की धारा 406, 420, 467, 468, 379 और 120B/34 के तहत दर्ज) से जुड़ी अग्रिम ज़मानत अर्ज़ी पर सुनवाई कर रही थी। कोर्ट ने कहा कि सिर्फ़ चार्जशीट दाखिल होने के आधार पर अग्रिम ज़मानत की अर्ज़ी खारिज नहीं की जा सकती और ऐसी अर्जियों पर उनके गुण-दोष के आधार पर विचार किया जाना चाहिए।
शिकायतकर्ता और आरोपी दोनों झारखंड हाईकोर्ट में प्रैक्टिस करने वाले वकील हैं।
याचिकाकर्ता की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट अजीत कुमार ने कहा कि FIR एक स्कूल के मैनेजमेंट को लेकर लंबे समय से चल रहे विवाद से जुड़ी है, जिसके सेक्रेटरी के तौर पर याचिकाकर्ता 2015 में चुने गए। यह तर्क दिया गया कि स्कूल के इंफ्रास्ट्रक्चर के निर्माण, शिक्षकों की नियुक्ति और स्कूल फंड के मैनेजमेंट से जुड़े आरोप संस्थान पर नियंत्रण को लेकर गुटीय विवादों से प्रेरित थे।
याचिकाकर्ता ने आगे कहा कि उन्होंने जांच में पूरा सहयोग किया और पुलिस ने 31 दिसंबर, 2023 को चार्जशीट दाखिल की। यह भी बताया गया कि इसी तरह के आरोपों वाले एक अन्य आपराधिक मामले में हाईकोर्ट की दूसरी बेंचों ने याचिकाकर्ता और अन्य सह-आरोपियों को पहले ही अग्रिम ज़मानत दी थी। याचिकाकर्ता ने अपनी पत्नी की शिक्षक के तौर पर नियुक्ति से जुड़े आरोपों का खंडन करते हुए कहा कि उनकी नियुक्ति 2009 में हुई और वे 2015 में सेक्रेटरी बने। यह भी कहा गया कि उनके पास ज़रूरी शैक्षणिक योग्यताएं हैं।
खुद पेश हुए शिकायतकर्ता महेश तिवारी ने अर्ज़ी का विरोध किया। उन्होंने कहा कि संज्ञान लिए जाने और समन जारी होने के बावजूद याचिकाकर्ता बार-बार ट्रायल कोर्ट के सामने पेश होने से बचते रहे। शिकायतकर्ता ने आगे आरोप लगाया कि याचिकाकर्ता ने दूसरों के साथ मिलकर स्कूल फंड का गबन किया और धोखाधड़ी वाले लेन-देन के ज़रिए संपत्ति जमा की। अन्य आरोपों के अलावा, उन्होंने दावा किया कि स्कूल की इमारतों के निर्माण में गड़बड़ी की गई, सरकारी रिकॉर्ड में आंकड़ों में हेरफेर किया गया और नोटबंदी के दौरान स्कूल के खातों में बड़ी मात्रा में नकद जमा किया गया। उन्होंने आयकर विभाग द्वारा शुरू की गई कार्यवाही का भी ज़िक्र किया और बताया कि स्कूल पर ₹5.72 करोड़ का जुर्माना लगाया गया।
दोनों पक्षों की दलीलों पर विचार करने के बाद कोर्ट ने पाया कि शिकायतकर्ता द्वारा लगाए गए कई आरोपों की सुनवाई के दौरान जांच की जानी चाहिए। बेंच ने गौर किया कि स्कूल की इमारत पहले ही बन चुकी थी और टेंडर की रकम, रिकॉर्ड में कथित हेरफेर और अन्य वित्तीय लेन-देन से जुड़े विवाद ऐसे मामले थे जिनकी सबूतों के आधार पर जांच की ज़रूरत थी।
कोर्ट ने यह भी देखा कि याचिकाकर्ता की पत्नी की नियुक्ति और योग्यता से जुड़े सवाल पहले से ही सुनवाई के विषय थे।
चार्जशीट दाखिल होने के बाद अग्रिम ज़मानत नहीं दी जा सकती, इस तर्क को खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा:
"चालान या चार्जशीट दाखिल करना अपने आप में अग्रिम ज़मानत देने में कोई बाधा नहीं है। CrPC की धारा 438 (जो भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 482 के बराबर है) के तहत आवेदन को केवल इस आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता। कोर्ट को आवेदन पर उसके गुण-दोष और मामले के तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर विचार करना चाहिए।"
यह मानते हुए कि याचिकाकर्ता ने जांच में सहयोग किया और आरोपों की परख सुनवाई के दौरान होगी, कोर्ट ने उसे अग्रिम ज़मानत दी।
बेंच ने याचिकाकर्ता को तीन हफ़्ते के भीतर ट्रायल कोर्ट के सामने सरेंडर करने का निर्देश दिया। गिरफ्तारी या सरेंडर की स्थिति में, उसे ₹25,000 के बॉन्ड और उतनी ही राशि की दो ज़मानतों (sureties) पर ज़मानत पर रिहा किया जाएगा।
Case Title: Abhay Kumar Mishra v. State of Jharkhand & Anr.