सिर्फ उग्रवादी की पत्नी होना और मुठभेड़ स्थल पर बच्चे के साथ मौजूद रहना दोष सिद्ध करने के लिए पर्याप्त नहीं: झारखंड हाईकोर्ट
झारखंड हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि सिर्फ किसी उग्रवादी की पत्नी होना और डेढ़ साल की बच्ची के साथ मुठभेड़ स्थल पर मौजूद रहना किसी महिला को दोषी ठहराने के लिए पर्याप्त आधार नहीं हो सकता। अदालत ने कहा कि जब तक अभियोजन यह साबित न करे कि आरोपी ने कोई आपराधिक कृत्य किया या वह किसी उग्रवादी संगठन की सदस्य थी, तब तक उसे दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
यह फैसला जस्टिस अनुभा रावत चौधरी ने प्रमिला देवी की अपील स्वीकार करते हुए सुनाया। अदालत ने निचली अदालत द्वारा सुनाई गई दोषसिद्धि और सजा रद्द करते हुए उन्हें सभी आरोपों से बरी कर दिया।
अभियोजन के अनुसार, जनवरी 2004 में गुमला जिले के एक गांव के पास पुलिस को सूचना मिली कि 15 से 20 उग्रवादी, जिनमें तीन महिलाएं भी शामिल थीं, छिपे हुए हैं। पुलिस के मौके पर पहुंचने पर कथित उग्रवादियों ने गोलीबारी शुरू की, जिसके बाद दोनों ओर से मुठभेड़ हुई। मुठभेड़ समाप्त होने के बाद पुलिस ने दो महिलाओं को गिरफ्तार किया, जिनमें प्रमिला देवी भी शामिल थीं। उस समय उनकी गोद में उनकी डेढ़ साल की बेटी थी। अभियोजन का दावा था कि उन्होंने स्वयं को पीपुल्स वॉर समूह के सब-जोनल कमांडर प्रतुल भुइयां उर्फ रणधीरजी की पत्नी बताया।
ट्रायल कोर्ट ने प्रमिला देवी को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 307, 353 और 412/34, शस्त्र अधिनियम की विभिन्न धाराओं तथा आपराधिक कानून संशोधन अधिनियम की धारा 17 के तहत दोषी ठहराया था। हालांकि, अपील लंबित रहने के दौरान वह अपनी सजा पूरी कर सितंबर 2011 में जेल से रिहा हो चुकी थीं।
हाईकोर्ट ने साक्ष्यों का परीक्षण करते हुए पाया कि घटना स्थल पर मौजूद होने के अलावा अभियोजन प्रमिला देवी के खिलाफ कोई विशिष्ट आपराधिक कृत्य साबित नहीं कर सका।
अदालत ने यह भी पाया कि एक गवाह ने अदालत में यह कहकर अभियोजन के मामले को मजबूत करने की कोशिश की कि महिला के पास से पिस्तौल बरामद हुई। लेकिन इस दावे का समर्थन न तो तत्कालीन अभिलेखों से हुआ और न ही किसी अन्य गवाह के बयान से। अदालत ने इसे "बाद में जोड़ी गई बात" माना।
खंडपीठ ने कहा कि किसी भी गवाह ने यह नहीं बताया कि प्रमिला देवी के पास से कोई हथियार या अन्य आपत्तिजनक सामग्री बरामद हुई। साथ ही ऐसा कोई साक्ष्य भी नहीं था, जिससे यह साबित हो कि वह किसी उग्रवादी संगठन की सदस्य थीं। अदालत ने यह भी नोट किया कि उनके खिलाफ कोई अन्य आपराधिक मामला भी दर्ज नहीं था।
अदालत ने कहा,
"अभियोजन यह साबित करने में असफल रहा है कि अपीलकर्ता ने कोई आपराधिक कृत्य किया। केवल घटना स्थल पर डेढ़ साल की बच्ची के साथ मौजूद होना और किसी उग्रवादी की पत्नी होना उसकी दोषसिद्धि के लिए पर्याप्त नहीं है।"
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि ट्रायल कोर्ट ने बिना किसी ठोस साक्ष्य के यह मान लिया कि प्रमिला देवी उग्रवादी संगठन की सक्रिय सदस्य थीं, जबकि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई प्रमाण मौजूद नहीं था।
इन्हीं परिस्थितियों में हाईकोर्ट ने माना कि अभियोजन न तो किसी हथियार की बरामदगी, न किसी आपराधिक कृत्य और न ही किसी उग्रवादी संगठन की सदस्यता साबित कर सका। इसलिए अदालत ने प्रमिला देवी को सभी आरोपों से बरी करते हुए उनकी दोषसिद्धि और सजा रद्द की, भले ही वह पहले ही पूरी सजा काट चुकी है।