व्यभिचार अब अपराध नहीं: झारखंड हाईकोर्ट ने विवाहेतर संबंध के आरोप में कॉन्स्टेबल की बर्खास्तगी रद्द की

Update: 2026-07-06 13:49 GMT

झारखंड हाईकोर्ट ने झारखंड आर्म्ड पुलिस के एक कॉन्स्टेबल की बर्खास्तगी रद्द की। यह बर्खास्तगी विवाहेतर संबंध (Adultery) के आरोप में की गई। कोर्ट ने कहा कि 'जोसेफ शाइन बनाम भारत संघ' मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद व्यभिचार अब कोई आपराधिक अपराध नहीं रह गया। कोर्ट ने यह भी कहा कि अनुशासनात्मक अधिकारी ने कॉन्स्टेबल को ऐसे आधार पर बर्खास्त किया था जो कभी चार्ज-शीट का हिस्सा ही नहीं था, जिससे यह आदेश गैर-कानूनी और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन करने वाला हो गया।

जस्टिस दीपक रोशन की सिंगल जज बेंच उस रिट याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें याचिकाकर्ता की नौकरी से बर्खास्तगी और सजा की पुष्टि करने वाले अपीलीय आदेश को चुनौती दी गई।

याचिकाकर्ता 2007 में कॉन्स्टेबल के तौर पर झारखंड आर्म्ड पुलिस में शामिल हुआ था। बाद में एक महिला ने शिकायत की कि दोनों के शादीशुदा होने और बच्चे होने के बावजूद, याचिकाकर्ता ने उससे शादी की और अक्टूबर 2019 से अप्रैल 2023 के बीच उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए। फिर उसे साथ रखने से इनकार कर दिया। शुरुआती जांच के बाद याचिकाकर्ता के खिलाफ विभागीय कार्यवाही शुरू की गई। इसके अलावा, उसके खिलाफ IPC की धारा 417 और 376(2)(n) के तहत FIR भी दर्ज की गई।

आखिरकार, पुलिस मैनुअल के नियम 824(b) के तहत याचिकाकर्ता को नौकरी से हटा दिया गया। उसकी विभागीय अपील भी खारिज कर दी गई। हाई कोर्ट के सामने याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि बर्खास्तगी का आदेश ऐसे आरोप पर आधारित था जो कभी विभागीय चार्ज-शीट का हिस्सा नहीं था। उसने यह भी तर्क दिया कि जांच रिपोर्ट और अनुशासनात्मक व अपीलीय अधिकारियों द्वारा पारित आदेश 'बिना कारण बताए' (non-speaking) थे, और 'जोसेफ शाइन' मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद व्यभिचार को अब आपराधिक अपराध नहीं माना जा सकता।

रिकॉर्ड की जांच करने पर हाईकोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता के खिलाफ विभागीय आरोप यह था कि शादीशुदा होने के बावजूद उसने एक शादीशुदा महिला के साथ संबंध बनाए, जो अनुशासनहीनता और पुलिस विभाग की बदनामी का कारण बना। हालांकि, कोर्ट ने गौर किया कि बर्खास्तगी का आदेश आखिरकार बिल्कुल अलग आधार पर आधारित था, यानी IPC की धारा 376(2)(n) के तहत FIR दर्ज होना। बेंच ने देखा कि नौकरी से निकालने का आदेश और उसके बाद का आदेश, दोनों ही ऐसे आरोप के आधार पर सज़ा देते हैं, जो याचिकाकर्ता के खिलाफ कभी तय ही नहीं किया गया। इससे याचिकाकर्ता को गंभीर नुकसान हुआ और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन हुआ।

कोर्ट ने कहा:

“सर्विस कानून के तहत यह एक स्थापित नियम है कि सज़ा का आदेश केवल उन खास आरोपों के आधार पर ही दिया जा सकता है, जो दोषी व्यक्ति के खिलाफ तय किए गए हों।”

हाईकोर्ट ने यह भी पाया कि अनुशासनात्मक अथॉरिटी और अपीलीय अथॉरिटी, दोनों ने याचिकाकर्ता के बचाव पर ठीक से विचार किए बिना ही आदेश जारी कर दिए। कोर्ट ने विभागीय जांच में भी बड़ी कमियां पाईं। कोर्ट ने देखा कि शिकायतकर्ता के बयान के अलावा, आरोपों का समर्थन करने वाला कोई दस्तावेज़ी या स्वतंत्र सबूत नहीं था। जांच में खुद यह दर्ज किया गया कि कथित शादी को साबित करने के लिए कोई सबूत पेश नहीं किया गया, होटलों के किसी CCTV फुटेज की जांच नहीं की गई, और ऐसा कोई सबूत नहीं था, जिससे यह पता चले कि याचिकाकर्ता उस किराए के मकान में रहा था, जिसे कथित तौर पर शिकायतकर्ता के साथ शेयर किया गया।

इन कमियों के बावजूद, अनुशासनात्मक अथॉरिटी ने नौकरी से हटाने की सबसे कड़ी सज़ा दी। 'जोसेफ शाइन बनाम भारत संघ' मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का ज़िक्र करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि एडल्ट्री (व्यभिचार) अब कोई आपराधिक अपराध नहीं है।

कोर्ट ने कहा:

“इसके अलावा, यह ध्यान रखना ज़रूरी है कि एडल्ट्री के अपराध को माननीय सुप्रीम कोर्ट ने 'जोसेफ शाइन बनाम भारत संघ' (2019) 3 SCC 39 मामले में रद्द कर दिया, जिसमें यह कहा गया कि एडल्ट्री का अपराध अब कोई अपराध नहीं है। ऐसे प्रावधान को संविधान के अनुच्छेद 15(3) के तहत आने वाला लाभकारी कानून नहीं माना जा सकता।”

कोर्ट ने आगे कहा कि प्रतिवादी इस बात पर विचार करने में विफल रहे कि शिकायत नाराज़ शिकायतकर्ता द्वारा दर्ज कराई गई और आरोप "नैतिक अधमता" (moral turpitude) के दायरे में नहीं आते थे, जिसे बिना न्यायिक सोच-विचार के यांत्रिक रूप से लागू नहीं किया जा सकता।

यह मानते हुए कि की गई कार्रवाई मनमानी, अनुपातहीन और संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 का उल्लंघन करने वाली थी, हाई कोर्ट ने नौकरी से हटाने के आदेश, उसके बाद के आदेश और अपीलीय आदेश रद्द किया।

Case Title: Bharat Pathak @ Bharat Kumar Pathak v. State of Jharkhand and Ors.

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